फ़ुटबॉल में नाम रोशन कर रहे हैं राज्य के कई खिलाड़ी, खेल रहे दूसरे राज्यों से

खेल मंत्री अरविंद पांडे इस बात से इनकार नहीं करते कि फुटबॉल में बहुत कुछ करना बाकी है.

Robin Singh Chauhan | News18 Uttarakhand
Updated: September 6, 2018, 7:04 PM IST
फ़ुटबॉल में नाम रोशन कर रहे हैं राज्य के कई खिलाड़ी, खेल रहे दूसरे राज्यों से
अंतराष्ट्रीय फुटबॉल खिलाड़ी सीवी थापा कहते हैं कि सरकार की बेरुखी और एसोसिएशन की उदासीनता ने प्रदेश में फुटबॉल का बड़ा नुक़सान किया है.
Robin Singh Chauhan | News18 Uttarakhand
Updated: September 6, 2018, 7:04 PM IST
राज्य में क्रिकेट संघों के एका और बीसीसीआई की मान्यता मिलने के बाद उत्तराखंड का खेल विभाग गदगद है लेकिन राज्य खेल फुटबॉल के दिन कब बहुरेंगे यह सवाल बार-बार खड़ा हो रहा है. 18 साल में  खेल विभाग और स्टेट एसोसिएशन के पास फुटबॉल के खेल में उपलब्धियों के नाम पर एक बड़ा सिफ़र ही है. यह सब इसके बावजूद है कि जुलाई में फुटबॉल के ऑल इण्डिया फुटबॉल एसोसिएशन ने जिस खिलाड़ी, अनिरुद्ध थापा, को ‘इमरजिंग प्लेयर ऑफ द ईयर’ का खिताब दिया है, वह देहरादून के ही रहने वाले हैं.

खेल विभाग की हालत यह है कि अनिरुद्ध भारतीय टीम के लिए खेल रहे हैं- यह बात न खेल विभाग को पता है और न ही उन्हें सम्मानित किए जाने की जानकारी एसोसिएशन को मिली है. ऐसा भी नहीं है कि अनिरुद्ध थापा अकेले ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने यह मुकाम हासिल किया है. ऐसे कई और खिलाड़ी हैं जो उत्तराखण्ड मूल के हैं और फुटबॉल के खेल में शीर्ष पर हैं. लेकिन विडंबना यह भी है कि इनमें से एक भी प्रदेश की टीम से नहीं खेल रहा है. अल्मोड़ा जिले के जीतेंद्र सिंह कोलकाता से खेलकर भारतीय टीम में चुने गए हैं और बागेशवर के रोहित दानू दिल्ली से खेलकर अण्डर 17 फीफा वर्ल्ड कप में खेले हैं.

राज्य के इन खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए दूसरे प्रदेशों का रुख करना पड़ा तो इसका बडा कारण यह है कि प्रदेश बनने के बाद से लेकर अब तक एक भी स्टेट लीग नहीं हुई है. अंतराष्ट्रीय फुटबॉल खिलाड़ी सीवी थापा कहते हैं कि सरकार की बेरुखी और एसोसिएशन की उदासीनता ने प्रदेश में फुटबॉल का बड़ा नुक़सान किया है.

भले ही प्रदेश में  फुटबॉल को राज्य खेल घोषित किया गया हो लेकिन प्रदेश में इस खेल और खिलाड़ियों दोनों के हाल बुरे हैं और इसके लिए बड़ी जिम्मेदारी एसोसिएशन की है जो महज़ खाना पूर्ति के लिए चलाई जा रही है. कई ज़िलों में इसकी इकाई ही नहीं है और यही वजह है राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए टीम आनन-फ़ानन में चुन ली जाती है.

आलम यह है पिछले 18 साल में प्रदेश के पास अपने राज्य खेल फुटबॉल में बताने की कोई भी बड़ी उपल्बधि नहीं है. हाल ही में अंबाला में हुई सब जूनियर नेशनल चैंपियनशिप में टीम चंडीगढ़ से 18 -0  से हार गई. वरिष्ठ खेल पत्रकार राजू गुसाईं के अनुसार इसके लिए फुटबॉल फ़ेडरेशन ऑफ इण्डिया भी जिम्मेदार है जिसके पास फुटबॉल संघों की मॉनिटरिंग का कोई मेकेनिज़्म ही नहीं है और वह अपनी मनमानी करती आई है.

खेल मंत्री अरविंद पांडे इस बात से इनकार नहीं करते कि फुटबॉल में बहुत कुछ करना बाकी है. वह यह भी मानते हैं कि दो एसोसिएशनों की वर्चस्व की लड़ाई में नुकसान खिलाड़ियों का हो रहा है लेकिन उनके पास भी उत्तराखण्ड में फुटबॉल का स्वर्णिम इतिहास वापस लाने की कोई ठोस योजना नहीं है.

राज्य खेल के हाल बेहाल हैं और हाल फिलहाल किसी कमाल की उम्मीद कम है. सरकार की उदासीनता और एसोसिएशनों की मनमानी ने इस खेल को इतना पीछे धकेला है कि इसके पुराने दिन वापस लाने में अभी समय लगेगा. लेकिन प्रदेश के कुछ खिलाड़ी इसकी उम्मीद तो जगाए रखे हैं.

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