हां रोकी जा सकती है जंगलों में लगने वाली आग... लेकिन करना होगा यह सब

पिछली बार जंगलों की आग इतनी भड़क गई थी कि वन विभाग ने इसे बुझाने की कोशिश से भी इनकार कर दिया था और कहा था कि बारिश ही इस बुझा सकती है.

Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: May 15, 2019, 3:09 PM IST
हां रोकी जा सकती है जंगलों में लगने वाली आग... लेकिन करना होगा यह सब
उत्तराखंड के जंगलों में इस साल लगी आग ने पिछले साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है.
Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: May 15, 2019, 3:09 PM IST
अपनी कुल ज़मीन के 71 फ़ीसदी वन क्षेत्र वाला उत्तराखंड अपनी वन संपदा के लिए केंद्र से ग्रीन बोनस की मांग करता रहा है. लेकिन हर साल यहां के जंगलों में लगने वाली आग न सिर्फ़ वन संपदा का नुक़सान कर रही बल्कि पर्यावरण को भी नुक़सान पहुंचा रही है. 2018 में लगी आग ने पिछले कई सालों के रिकॉर्ड तोड़ दिए थे लेकिन इस बार अभी तक ही वनाग्नि पिछले साल से ज़्यादा नुक़सान कर चुकी है. हर साल उत्तराखंड की बेशकीमती संपदा जल जाती है और सबसे ज़्यादा लाव-लश्कर वाला विभाग बस बारिश का इंतज़ार करता रहता है. सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड की वन संपदा को यूं ही राफ़ होने से बचाया जा सकता है?

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साल 2018 में उत्तराखंड के जंगलों में लगी भीषण आग ने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे. तब आग लगने की करीब 2000 घटनाओं में 4000 से ज़्यादा हेक्टेयर क्षेत्रफल में जंगल प्रभावित हुए थे. इस साल अभी तक की घटनाओं ने पिछले साल के भी रिकार्ड तोड़ दिए हैं जबकि राज्य में रुक-रुककर बारिश होती रही है. पिछले साल 15 मई तक जंगलों में आग की कुल 508 घटनाएं हुईं जिससे 1018 हेक्टेयर क्षेत्रफल आग की चपेट में आया था. इस साल 13  मई तक ही वनाग्नि की 813 घटनाओं में 1037 हेक्टेयर क्षेत्रफल आग की भेंट चढ़ चुका है.

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उत्तराखंड के जंगलों में आग को रोकने की ज़िम्मेदारी इस बार प्रमुख वन संरक्षक, अग्नि, पीके सिंह पर है. वनाग्नि रोकने में वन विभाग के नाकाम रहने के सवाल पर पीके सिंह सफ़ाई देते हैं कि वह विभाग से आठ साल तक बाहर रहे हैं और इसी साल उन्हें वनाग्नि रोकने की ज़िम्मेदारी मिली है. इसलिए ग्राउंड लेवल पर क्या दिक्कत हो रही है, गांववाले मदद कर रहे हैं या नहीं इसकी जानकारी नहीं है.

सिंह कहते हैं कि एक फॉरेस्ट गार्ड को 2-3 हज़ार हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करना पड़ता है. जब आग एक से ज़्यादा जगह लगती है तो उसके लिए मुश्किल हो जाता है. लेकिन क्या इतने बड़े क्षेत्र में आग पर नियंत्रण के लिए एक फॉरेस्ट गार्ड पर्याप्त है?

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उत्तराखंड में सुलगते जंगल (फ़ाइल फ़ोटो) 
पीके सिंह कहते हैं कि फॉरेस्ट गार्ड हमेशा से गांववालों की मदद से ही आग बुझाने का काम करते रहे हैं, इसके लिए स्टाफ़ ज़्यादा नहीं चाहिए होता था. गांववाले आग बुझाने के लिए आ जाते थे और वन विभाग के साथ मिलकर आग बुझा देते थे. इसके एवज में उन्हें हक-हकूक के रूप में लकड़ी दी जाती थी. सिंह कहते हैं कि अब क्या हो रहा है यह परंपरा अब भी जारी है या नहीं फ़ायर सीज़न के बाद ही पूछा जा सकेगा.

 

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लेकिन यह सच है कि स्थानीय लोगों का जंगलों से संबंध ख़त्म हो गया है. ICFRE (Indian Council of Forestry Research and Education) में वैज्ञानिक डॉक्टर डीएम डिमरी बताते हैं कि 1000 मीटर से ऊपर तो जंगलों में कटान पर पाबंदी है. इसके अलावा पातन चक्र जो पहले दो-तीन साल में था उसे बढ़ाकर अब 10 साल कर दिया गया है. पातन चक्र में स्थानीय निवासियों को पेड़ की टहनियां तोड़ने, घास, पिरुल इकट्ठे करने की इजाज़त मिलती थी. इससे जंगलों की छंटाई और उनका प्रबंधन करना आसान रहता था. इसकी अवधि बढ़ाने की वजह से अब ग्रामीण जंगलों से कट गए हैं. गैस पहुंच गए हैं, मकान लेंटर के बन रहे हैं तो लकड़ी की ज़रूरत भी कम हो गई है.

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डॉक्टर डिमरी के अनुसार इसकी एक वजह पालतू पशुओं का कम होना भी है. एक तो पलयान की वजह से लोग ही कम हैं, दूसरे जो हैं भी उन्होंने दुधारू पशु रखना कम कर दिया है. इसकी वजह से जानवर भी जंगल में नहीं जा रहे और फालतू झाड़-झंखाड़ ज़्यादा हो रहा है. इससे भी जंगल की सेहत ख़राब हो रही है. इस सबका नतीजा है आग लगना और इस पर नियंत्रण इसलिए नहीं होता क्योंकि लोग अब वनकर्मियों का सहयोग भी नहीं करते.

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आग पर नियंत्रण पाने की कोशिशें अभी तक नाकाम ही रही हैं.


तो क्या उत्तराखंड में जंगल की आग पर काबू पाना संभव ही नहीं है?

बिल्कुल संभव है, कहते हैं पूर्व मुख्य वन संरक्षक अधिकारी श्रीकांत चंदोला. वह कहते हैं कि वन विभाग बनाया ही इसलिए गया था कि सरकारी वनों का संरक्षण और सुरक्षा की जाए और जंगलों का मुख्य दुश्मन है आग. फ़ायर सीज़न में विभाग के पास एक ही काम होता है और वह है आग पर नियंत्रण करना. अगर यह भी नहीं कर सकते तो विभाग किस काम का?

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पूर्व मुख्य वन संरक्षक अधिकारी बताते हैं हर जगह जंगल का फ़ायर मैप बनाया जाता है. इसमें उन इलाकों को हाईलाइट किया जाता है जहां अक्सर आग लगती है. कई सालों के मैप के आधार पर आग लगने की संभावित जगहों को चिन्हित किया जाता है और वहां पर क्रू स्टेशन एस्टेबलिश किया जाता है. उसमें लोगों को नौकरी पर रखा जाता है. जहां आग लग जाती है वहां दो-तीन क्रू स्टेशन से लोगों को बुलाकर आग पर काबू पाया जाता है.

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फ़ायर लाइन पुराने सभी फ़ायर डिवीजन में बनी ही हुई हैं. बस इसकी जानकारी होनी चाहिए. चंदोला कहते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि आग को नियंत्रित किया जा सकता है. आग लगते ही उसे कंट्रोल कर लेना चाहिए. वह भड़क जाती है तो मुश्किल होती है, हालांकि तब भी उस पर कंट्रोल किया जा सकता है लेकिन सूझबूझ चाहिए.

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उत्तराखंड वन विभाग के अधिकारियों में सूझ-बूझ के साथ ही जंगलों के नुक़सान को रोकने के लिए इच्छाशक्ति का भी अभाव है. तभी फ़ायर सीज़न के चरम पर होते हुए भी 6 आलाधिकारी किसी न किसी बहाने से विदेश चले गए हैं, जिनमें मुख्य वन संरक्षक अधिकारी जयराज भी शामिल हैं. ऐसे में यह जानकर अचरज नहीं होना चाहिए कि पिछली बार जंगलों की आग इतनी भड़क गई थी कि वन विभाग ने इसे बुझाने की कोशिश से भी इनकार कर दिया था और कहा था कि बारिश ही इस बुझा सकती है. उत्तराखंड के जंगल कई दिनों तक धू-धू कर जलते रहे थे और अंततः बारिश के बाद उनका धधकना बंद हुआ था.

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