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इसलिए जलते हैं जंगलः ‘फ़ायर लाइन साफ़ ही नहीं की जाती, न जाने कहां जाते हैं अरबों रुपये’
Dehradun News in Hindi

Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: May 18, 2019, 5:05 PM IST
इसलिए जलते हैं जंगलः ‘फ़ायर लाइन साफ़ ही नहीं की जाती, न जाने कहां जाते हैं अरबों रुपये’
उत्तराखंड में जंगलों की आग को नियंत्रित करने में वन विभाग असहाय दिख रहा है और शीर्ष अधिकारी विदेश घूम रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार दिनेश जुयाल पूछते हैं कोई भी अफ़सर कैसे काम कर सकता है जब तक कि सरकार का बैकअप न हो.

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उत्तराखंड की वन संपदा धू-धू कर जल रही है और वन विभाग में घमासान छिड़ा हुआ है. प्रमुख वन संरक्षक समेत विभाग के 4 अधिकारी विदेश यात्रा पर हैं और कमाल की बात यह है कि विभाग प्रमुख ने वन मंत्री से इसकी अनुमति तक नहीं मांगी थी. उन्हें सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय से विदेश यात्रा की इजाज़त मिल गई थी. वन मंत्री हरक सिंह रावत इससे इतने नाराज़ हैं कि परोक्ष रूप से इस्तीफ़े की धमकी तक दे डाली है. उधर फ़ायर सीज़न पीक पर है और हालत यह है कि बारिश हो रही है तो आग नियंत्रित हो रही है वरना जंगल जले जा रहे हैं. क्या उत्तराखंड की यही नियति है?

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वन विभाग में 2009 से 2017 ऑनरेरी वाइल्ड लाइफ़ वॉर्डन रहे राजीव मेहता कहते हैं कि जंगल को जंगल की आग, शिकार, पेड़ों की अवैध कटाई जैसे कई खतरों का सामना करना पड़ता है लेकिन वनाग्नि या जंगल की आग सबसे बड़ा ख़तरा है जो वनस्पति और जानवरों को भी भारी नुक़सान करती है. मेहता कहते हैं लेकिन यह विडंबना है कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जहां चीड़ के जंगल हैं वहां विभाग के पास आग बुझाने के संसाधन ही नहीं हैं.



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इसके अलावा समस्या यह भी है पहले ग्रामीण आग बुझाने में मदद किया करते थे लेकिन वन विभाग की नीतियों ने उन्हें विभाग का दुश्मन बना लिया है. वह कहते हैं कि उनका अनुभव रहा है कि आग लगने पर प्रधान को बस सूचना देनी होती थी वह 30-40 लोगों को इकट्ठा कर लेते थे और मिलकर घंटे-डेढ़ घंटे में आग बुझा देते थे. अब ग्रामीण कहते हैं कि खुद ही आग बुझा लो. दूसरी दिक्कत यह है कि जो फ़ायर लाइन बनी भी हुई हैं उनकी कोई सफ़ाई नहीं करता. प्रोटेक्टेड एरिया में तो फ़ायर लाइन साफ़ हो भी रही है या नहीं यह कोई देखता तक नहीं क्योंकि वहां जाने की इजाज़त भी किसी को नहीं है.

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मेहता कहते हैं कि 2016-17 में राजाजी के अंदर कोई भी फ़ायर लाइन साफ़ नहीं होती थी. इसी का नतीजा था कि 2016 में आधा राजाजी जल गया था. अगर फ़ायर लाइन साफ़ रहे तो मतलब ही नहीं कि आग फैल जाए. मेहता दावा करते हैं कि फ़ायर लाइन बनाने और मेनटेन करने के लिए अरबों रुपये आते हैं लेकिन उनका सही इस्तेमाल नहीं होता. वह मांग करते हैं कि फ़ायर लाइन होने वाले खर्च का ऑडिट किसी बाहरी संस्था से करवाया जाना चाहिए ताकि पता चल सके कि पैसे का सही इस्तेमाल हो भी रहा है या नहीं.

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वन विभाग के पास न इच्छाशक्ति ही दिख रही है और न ही संसाधन हैं.


जब फ़ायर सीज़न चरम पर हो तब प्रमुख वन संरक्षक (HOFF) समेत राज्य के चार आला अधिकारियों के जाने से क्या ज़मीन पर काम करने वाले कर्मचारियों को यह संदेश नहीं मिलता कि इस नुक़सान की किसी को कोई परवाह नहीं?

मेहता कहते हैं कि अधिकारी कहीं भी हों अगर वह यह व्यवस्था बनाकर रखते हैं कि उनके रहे बिना भी काम हो जाएगा तो कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. लेकिन काम होता नहीं दिख रहा. जंगलों की आग रोकने के लिए ज़िम्मेदार अधिकारी पीके सिंह ने तीन दिन पहले न्यूज़ 18 से बातचीत में माना था कि दो दिन बारिश हो गई तो आग पर नियंत्रण हो गया वरना यह बहुत मुश्किल साबित हो रहा है.

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इस पर कोढ़ में खाज यह भी है कि प्रमुख वन संरक्षक (HOFF) जयराज ने विदेश दौरे पर जाने के लिए वन मंत्री हरक सिंह रावत से अनुमति लेना तक ज़रूरन नहीं समझा. फ़ायर सीज़न में जिस विभाग में वनकर्मियों की छुट्टियों पर प्रतिबंध है उसमें तीन आला अधिकारियों के साथ वह भी विदेश निकल गए और इसके लिए उन्होंने विभागीय मंत्री को बाइपास कर सीधे सीएम कार्यालय से अनुमति ले ली.

इस स्थिति पर वरिष्ठ पत्रकार दिनेश जुयाल सवाल उठाते हैं कि गवर्नेंस कहां है. कोई अधिकारी सचिव का चहेता है या किसी पर सीएम की कृपा है तो वह कहीं भी घूमे, फिरे, ऐश करे उसे पूछने वाला कोई नहीं है. अजीब ढंग से काम हो रहा है इस प्रदेश में. पहले आप एक सड़क को स्वीकृति देते हैं फिर वह वापस ले लेते हैं. अफ़सरों का जो मन चाहता है वह करते हैं.

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दिनेश जुयाल कहते हैं कि वन मंत्री हरक सिंह रावत की राजनीति को लेकर आप सहमत हों, न हों उनकी यह बात बिल्कुल ठीक है कि अगर मंत्री को बाईपास करके विभागीय मामलों में मुख्यमंत्री कार्यालय ही फ़ैसले लेगा तो मंत्री पद देने का अर्थ ही क्या है? कोई भी सरकार के बैकअप के बिना काम कैसे कर सकता है? सत्ता का विकेंद्रीकरण लोकतंत्र के लिए स्वस्थ परंपरा नहीं है.

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First published: May 18, 2019, 4:19 PM IST
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