गंगा-यमुना की धरती पर पानी के लिए तरसते लोग, गर्मियां आते ही मच जाता है हाहाकार

जल संस्थान के अधिकारी योजनाओं को गिनाने के अलावा वैकल्पिक व्यवस्थाओं के बारे में बात कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि जल्द ही दिक्कतों को दूर किया जाएगा.

News18 Uttarakhand
Updated: April 15, 2019, 2:02 PM IST
गंगा-यमुना की धरती पर पानी के लिए तरसते लोग, गर्मियां आते ही मच जाता है हाहाकार
गर्मियां आते ही उत्तराखंड में जल संकट गहरा जाता है. (फ़ाइल फ़ोटो)
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Updated: April 15, 2019, 2:02 PM IST
उत्तराखंड की बड़ी त्रासदी यह मानी जाती है कि यहां का पानी और यहां की जवानी यहीं के काम नहीं आते. राज्य और केंद्र में सत्ता रही बीजेपी और कांग्रेस दोनों दावे करते रही है कि यह स्थिति बदलेगी, लेकिन एक हज़ार से ज़्यादा छोटी-बड़ी नदियों वाले इस पहाड़ी राज्य में गर्मियां आते ही लोगों को पानी के लिए भटकना पड़ता है. हालत यह है कि प्रशासनिक लापरवाही और दीर्घकालिक योजनाओं के अभाव में गर्मियां आते ही उत्तराखंड में पानी के लिए हाहाकार मच जाता है. हर साल तस्वीर एक जैसी ही होती है और इस बार भी कोई हालत में कोई बदलाव आता नहीं दिख रहा है.

PHOTOS: गंगा-यमुना के मायके उत्तराखंड में जलस्रोतों में 60% पानी घटा, 510 सूखे

प्रदेश के इलाकों में देखें तो तस्वीर कुछ इस तरह की निकलकर आती है...


  • नौलों की नगरी कहे जाने वाले अल्मोड़ा मुख्यालय में लगभग सभी इलाकों में पानी की किल्लत है. इसकी वजह यह है कि पिछले 30 साल से पुरानी पाइप लाइनों को बदला नहीं गया है.

  • ​टिहरी झील से सटे झाकणीधार इलाके में पानी का ज़बरदस्त संकट है और इसकी बड़ी वजह प्राकृतिक जलस्त्रोतों का सूखना है.

  • कोटद्वार में भी दर्जनभर इलाकों में लोगों को पानी मयस्सर नहीं है. इसकी वजह यह है कि 20 साल से पुरानी पाइप लाइनों को बदला नहीं गया है. इससे 50 हज़ार आबादी का बोझ 5 हज़ार क्षमता की पाइप लाइन झेल रही हैं.

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  • पर्यटन नगरी मसूरी में पानी कि किल्लत हमेशा बनी रहती है. कारण यह है कि 14 एमएलडी ज़रूरत के विपरीत शहर को 7.67 एमएलडी पानी ही शहर को मिलता है.

  • बाहरी हल्द्वानी के 10 इलाकों में पिछले कई दिनों से पानी का संकट बना हुआ है.


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प्रदेश में पानी के लिए हाय-तौबा मची है लेकिन जल संस्थान के अधिकारी योजनाओं को गिनाने के अलावा वैकल्पिक व्यवस्थाओं के बारे में बात कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि जल्द ही दिक्कतों को दूर किया जाएगा.

इस गांव के लोगों को 2 किमी दूर से ढोना पड़ता है पानी

 

लेकिन ये दावे और उत्तराखंड में पानी की दिक्कतें राज्य बनने के बाद से बढ़ी ही हैं. इसकी बड़ी वजह यह भी है कि राज्य बनने के बाद से तेज और अनियोजित निर्माण योजनाओं की वजह से पहाड़ के प्राकृतिक जल स्रोतों को बड़ा नुक़सान हुआ है. इसके अलावा घर तक नल से पानी मिलने की वजह से स्थानीय निवासी भी प्राकृतिक जल स्रोतों के सरंक्षण के प्रति लापरवाह हुए हैं. ऐसे में पानी के गहराते संकट की वजह से आबादी का बोझ मैदानी इलाकों पर बढ़ रहा है और वहां भी जलसंकट बढ़ रहा है.

(अल्मोड़ा से किशन जोशी के साथ देहरादून से सबिहा की रिपोर्ट)

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