सरकारी बागान को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी... सुबोध उनियाल का दावा, पहले की तरह नहीं होंगे फेल
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सरकारी बागान को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी... सुबोध उनियाल का दावा, पहले की तरह नहीं होंगे फेल
कृषि मंत्री सुबोध उनियाल का कहना है कि पिछली सरकार में भाई-भतीजावाद के तहत उद्यानों को लीज पर दे दिया गया था. इस बार निविदा के आधार पर आवंटन होगा.

नारायण दत्त तिवारी सरकार में भी इसी तरह 108 उद्यान निजी हाथों में सौंप दिए गए थे लेकिन यह प्रयोग सफल नहीं हो पाया.

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देहरादून. उत्तराखंड में 93 राजकीय उद्यान हैं लेकिन ये सबके सब खस्ताहाल हैं. राज्य बनने से लेकर आज तक इन उद्यानों से कोई आऊटपुट नहीं मिल पाया उलटे इन पर बजट खर्च होता रहा है. उद्यान विभाग अब इन उद्यानों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर रहा है. इसके लिए विभाग ने तीन कैटागरी बनाई हैं ए, बी और सी. ए कैटगरी के 32 उद्यानों को विभाग अपने पास रखेगा, शेष बी और सी कैटगरी के 61 उद्यानों को निजी हाथों में सौंप दिया जाएगा. इसमें भी बी कैटगरी के उद्यानों के लिए अगर किसी विभाग की ओर से प्रस्ताव आता है तो उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी. उद्यान मंत्री सुबोध उनियाल का कहना है कि यह प्रस्ताव शीघ्र ही कैबिनेट में लाया जाएगा.

पहले फेल रहा था प्रयोग

उत्तराखंड में पहले भी इसी तरह उद्यानों को प्राइवेट पार्टियों को सौंपा जा चुका है. नारायण दत्त तिवारी सरकार में भी इसी तरह 108 उद्यान निजी हाथों में सौंप दिए गए थे लेकिन यह प्रयोग सफल नहीं हो पाया. इन्फ्रांस्ट्रक्चर और तमाम खामियों के अभाव में उद्यान घाटे का सौदा साबित होते रहे. बाद के सालों में या तो विभाग को लीज़ वापस लेनी पड़ी या लोगों ने खुद ही सरेंडर कर दी. वर्तमान में माणाघेर, घिमतोली, सूपी, बटवाल कौडिया फार्म मात्र पांच उद्यान ही प्राइवेट हाथों में हैं.



उद्यान के क्षेत्र में काम कर रहे जेपी मैठाणी का कहना है कि राजकीय उद्यान कुबेर का खजाना हैं. अगर इनका ठीक से रख-रखाव किया जाता तो ये राज्य में बागवानी के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हो सकते थे लेकिन पहले उद्यान विभाग ने इनकी दुर्दशा की और फिर प्राइवेट हाथों में सौंपे जाने से इनकी स्थिति बद से बदतर हो गई.
बिना इन्फ्रास्ट्रक्चर के इनकी दशा को नहीं सुधारा जा सकता है. उद्यानों में कहीं पानी की व्यवस्था नहीं है तो कहीं घेर बाड़ नहीं है. स्थानीय जलवायु के अनुकूल पौधों का चयन भी नहीं है. यही कारण रहा कि ये उद्यान घाटे का सौदा बनकर रह गए. अच्छा होता कि सरकार प्राथमिकता के आधार पर खुद इनका संचालन करती.

नहीं होगा भाई-भतीजावाद 

मूल रूप से चमोली निवासी जेपी मैठाणी उन युवा उद्यानपतियों में से एक हैं जो 2011 में न्यूजीलैंड से कीवी के नौ पौधे खरीदकर लाए थे. चमोली के पीपलकोटी तक पहुंचते-पहुंचते छह ही पौधे बचे लेकिन उनकी लगन से आज वे कीवी की खेती कर रहे हैं. बीते साल मैठाणी ने कीवी की 280 पौध बेचीं तो 85 किलो कीवी भी बेचे. मैठाणी बागवानी के क्षेत्र में और भी कई काम कर रहे हैं.

कृषि मंत्री सुबोध उनियाल का कहना है कि पिछली सरकार में भाई-भतीजावाद के तहत उद्यानों को लीज पर दे दिया गया था. इस बार निविदा के आधार पर आवंटन होगा और उसमें भी टेक्निकल बिड को आधार बनाया जाएगा. देखा जाएगा कि संबंधित व्यक्ति के पास इसका अनुभव है भी या नहीं. इसके अलावा उद्यान के तीस फीसदी हिस्से में अनिवार्य रूप से पौध भी उगानी होगी ताकि आम काश्तकारों तक इसका फायदा पहुंचाया जा सके.
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