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इस वजह से 20 साल बाद स्वतः स्फूर्त आंदोलन 'मैती' को संगठन का रूप दिया कल्याण सिंह रावत ने
Dehradun News in Hindi

Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: February 5, 2020, 1:47 PM IST
इस वजह से 20 साल बाद स्वतः स्फूर्त आंदोलन 'मैती' को संगठन का रूप दिया कल्याण सिंह रावत ने
कल्याण सिंह रावत को इस साल पद्मश्री सम्मान देने का ऐलान किया गया है.

पर्यावरण सरंक्षण और संवर्द्धन के इस अनूठे अभियान 'मैती' का अध्ययन भारत ही नहीं कई देशों के विश्वविद्यालय में किया गया है.

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देहरादून. मैती आंदोलन उत्तराखंड में और बाहर भी किसी परिचय का मोहताज नहीं है. इसके प्रवर्तक कल्याण सिंह रावत को इस साल पद्मश्री सम्मान देने का ऐलान किया गया तो एक बार फिर मैती
और कल्याण सिंह रावत सुर्खियों में आ गए. कुछ लोग कह रहे हैं कि कल्याण सिंह रावत को यह सम्मान बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था, हालांकि रावत कहते हैं कि वह कभी पुरस्कारों के पीछे नहीं भागे. ऐसा कहते तो कई लोग हैं लेकिन सिर्फ़ भारत में ही 5 लाख से ज़्यादा पेड़ लगाने वाले मैती आंदोलन के प्रणेता जब यह कहते हैं कि तो इस बात पर विश्वास होता है.

मैती आंदोलन

इस आंदोलन की शुरुआत हुई थी 1995 में चमोली गोपेश्वर से. छात्र जीवन में चिपको आंदोलन में शामिल रह चुके कल्याण सिंह रावत तब ग्वालदम इंटर कॉलेज में जीव विज्ञान के शिक्षक थे. उन्होंने अपने विचार को कॉलेज के छात्र-छात्राओं के साथ साझा किया तो उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली. इसके बाद विदाई के समय दुल्हन और दूल्हे के हाथ बांज का पेड़ लगाकर इस आंदोलन की शुरुआत की गई.

शुरुआत में कॉलेज के छात्र-छात्राओं के माध्यम से ही यह अभियान गांव-गांव पहुंचा और उसके बाद धीरे-धीरे राज्य के अन्य क्षेत्रों में. कल्याण सिंह रावत बताते हैं कि आज यह आंदोलन 15 से अधिक राज्यों में और कनाडा, ब्रिटेन, इंडोनेशिया समेत कई देशों तक पहुंच गया है. कई विदेशी छात्र-छात्राओं ने इस अनूठे आंदोलन पर शोध किया है.

भावनात्मक संबंध

मैती आंदोलन की सफलता इसका भावनात्मक पक्ष है. उत्तराखंड में मायके को ‘मैत’ कहते हैं. किसी भी लड़की के अपने मायके से संबंध को ध्यान में रखते हुए कल्याण सिंह रावत यह अभिनव प्रयोग किया. वह कहते हैं कि जब बेटी मायके में कोई पौधा लगाकर ससुराल जाती है तो मां कभी भी उसे सूखने नहीं देती. वह पेड़ मां और बेटी के प्रेम और भावनात्मक संबंधों का प्रतीक होता है और इसलिए अभिसिंचित होता रहता है.मायके में पौधा लगाने से शुरु हुआ यह अभियान बाद में ससुराल में भी पहुंचा और गांव या कस्बे के जल स्रोत की पूजा करने के बाद एक पौधा लगाते हैं. उस पौधे की देखभाल और सुरक्षा की ज़िम्मेदारी नवदंपत्ति की होती है.

maiti ngo, कल्याण सिंह रावत और उनके साथियों ने 2016 में मैती संस्था का रजिस्ट्रेशन करवाया.
कल्याण सिंह रावत और उनके साथियों ने 2016 में मैती संस्था का रजिस्ट्रेशन करवाया.


रजिस्ट्रेशन की ज़रूरत

करीब 21 साल तक मैती अभियान को सामाजिक, पर्यावरणीय आंदोलन की तरह चलाने के बाद 2016 में कल्याण सिंह रावत और उनके साथियों ने मैती संस्था को एक संगठन का रूप दिया और इसका रजिस्ट्रेशन करवाया. लेकिन इतने सालों बाद इसकी ज़रूरत क्या पड़ी?

कल्याण सिंह रावत को गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) के काम करने का तरीका पसंद नहीं था. मैती आंदोलन का विचार आने से पहले वह देख चुके थे कि क्या सरकारी, क्या गैर सरकारी संगठन सभी पर्यावरण संरक्षण के लिए काम खानापूर्ति की तरह करते हैं.

इसीलिए उन्होंने इतने लंबे समय तक इसका रजिस्ट्रेशन नहीं करवाया और कोशिश की यह स्वतः स्फूर्त आंदोलन बने. यह बना भी और लोग इसके बारे में जानकर खुद ही सामने आने लगे और शादियों में यादगार स्वरूप पौधे लगाए जाने लगे. लेकिन इस बीच कुछ स्वार्थी लोगों ने इस नाम का दुरुपयोग करना शुरु कर दिया. यह बात जब कल्याण सिंह रावत तक पहुंची तो उन्होंने 2016 में मैती संस्था का रजिस्ट्रेशन करवाया.

maiti card, मैती आंदोलन के चलते सालों से शादी के कार्डों में मैती वृक्षारोपण कार्यक्रम को जगह दी जा रही है.
मैती आंदोलन के चलते सालों से शादी के कार्डों में मैती वृक्षारोपण कार्यक्रम को जगह दी जा रही है.


सम्मान

देश और दुनिया भर में करोड़ों लोग मैती आंदोलन की वजह से कल्याण सिंह रावत को जानते हैं. पर्यावरण सरंक्षण और संवर्द्धन के इस अनूठे अभियान का अध्ययन भारत ही नहीं कई देशों के विश्वविद्यालय में किया गया है. ऐसे में यह नहीं लगता कि उन्हें पद्मश्री सम्मान दिए जाने में देर हो गई?

कल्याण सिंह रावत कहते हैं कि वह कभी पुरस्कार के पीछे नहीं भागे, कभी कोशिश ही नहीं की तो देर-जल्दी का सवाल पैदा ही नहीं होता. रावत बताते हैं कि जब फ़ोन पर उन्हें यह सम्मान दिए जाने की सूचना मिली तो वह अपनी पत्नी के साथ टहल रहे थे. पहले पहल उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ लेकिन फिर यह बात माननी पड़ी.

कल्याण सिंह रावत कहते हैं किसी भी प्रशस्ति पत्र से बड़ा सम्मान शादी के कार्डों में छपा मैती वृक्षारोपण कार्यक्रम रहा है. मैती आंदोलन शुरु होने के बाद लोगों ने शादी के कार्डों में ‘मैती वृक्षारोपण कार्यक्रम’ को भी जगह देनी शुरु की. इससे उन लोगों को भी इसके बारे में पता चलता, जो इसे नहीं जानते. उनमें उत्सुकता और रुचि जागृत होती और फिर उनमें से कई मैती आंदोलन से जुड़ते.

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First published: February 5, 2020, 1:34 PM IST
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