पहाड़ों में ज़मीन ख़रीद की छूट पर विवादः ‘विकास बढ़ेगा, पलायन रुकेगा’... ‘पहले ज़मीन जाती है, फिर ज़मीर’

भाजपा यह भी दावा कर रही है कि इससे राज्य के विकास की नई राहें खुलेंगी और पलायन रुकेगा. लेकिन दूसरे लोग इससे सहमत नज़र नहीं आ रहे.

News18 Uttarakhand
Updated: June 7, 2019, 3:53 PM IST
पहाड़ों में ज़मीन ख़रीद की छूट पर विवादः ‘विकास बढ़ेगा, पलायन रुकेगा’... ‘पहले ज़मीन जाती है, फिर ज़मीर’
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में अब पर्यटन, स्वास्थ्य, शिक्षा और उद्यान से जुड़े काम के लिए कोई भी जितनी चाहे ज़मीन ख़रीद सकता है. (फ़ाइल फ़ोटो)
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Updated: June 7, 2019, 3:53 PM IST
बुधवार को त्रिवेंद्र कैबिनेट ने पहाड़ में 12.5 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन खरीद को चार उद्योगों के लिए महदूद कर दिया. पहाड़ी क्षेत्रों में 12.5 एकड़ की सीलिंग सरकार पिछले साल अक्टूबर में हुए इन्वेस्टर्स समिट से ठीक पहले ही ख़त्म कर चुकी थी. दरअसल त्रिवेंद्र सरकार की कोशिश थी कि उद्योगपति राज्य में ज़मीन की कमी की वजह से निवेश करने से झिझकें नहीं. भाजपा यह भी दावा कर रही है कि इससे राज्य के विकास की नई राहें खुलेंगी और पलायन रुकेगा. लेकिन दूसरे लोग इससे सहमत नज़र नहीं आ रहे. यहां यह ख़्याल भी रखना चाहे कि पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों के समेत पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में पहाड़ी क्षेत्रों में भूमि ख़रीद पर प्रतिबंध है.

पहले ज़मीन जाती है, फिर ज़मीर

राजधानी गैरसैंण संघर्ष समिति के संयोजक चारु तिवारी कहते हैं कि पहाड़ की ज़मीनों की खरीद की जो खुली छूट दी गई है यह उत्तराखंड के लिए बहुत ख़तरनाक है. दरअसल किसी भी समाज की भाषा, संस्कृति, गीत, संस्कार, परिवेष तब बचेंगे जब उसकी ज़मीन बचेगी. चारु कहते हैं कि जिस भी समाज की ज़मीन चली जाती है उसका ज़मीर भी चला जाता है. ज़मीर को बचाने के लिए, आत्मा को बचाने के लिए ज़मीन का बचना बहुत ज़रूरी है.

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चारू तिवारी कहते हैं कि उत्तराखंड में ज़मीन की लूट अस्सी के दशक के बीतने से पहले ही शुरु हो गई थी. वह कहते हैं कि बीजेपी और कांग्रेस के लोगों अपने दायरे वालों को यहां ज़मीनें खरीदवाईं. पहले वह जगहें खरीदीं गईं जहां से हिमालय दिखता है. जब ऐसी ज़मीन नहीं बची तो इन्होंने घाटियों को खरीदना शुरु किया. रामगढ़, मुक्तेश्वर, भवाली, सल्ट, मानीला, धुमाकोट, प्रतापनगर, धनौल्टी, नरेंद्रनगर और ऋषिकेश से लेकर बदरीनाथ तक पूरी बेल्ट में ज़मीनें बिक चुकी हैं. स्थिति कितनी गंभीर है इसे रानीखेत के पास मझखाली न्याय पंचायत के उदाहरण से समझा जा सकता है. इस न्याय पंचायत के सभी 32 गांव बिक गए हैं. यानि यहां लोगों के पास बस घर रह गए हैं ज़मीनें नहीं हैं.

भटक गया है उत्तराखंड

कांग्रेस नेता और वन अधिकार आंदोलन के संयोजक किशोर कहते हैं कि पड़ोसी राज्य हिमाचल में आप 2 इंच ज़मीन ख़रीदकर दिखा दो. कश्मीर से अरुणाचल तक सिर्फ़ उत्तराखंड ऐसा पहाड़ी राज्य है जो बहुत हॉच-पॉच में है, भटका हुआ है. हमने हर उस चीज़ पर अधिकार खो दिया है जो हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण थी जिसमें जल था, ज़मीन थी और था जंगल. शहरों में ज़मीन तो बची नहीं है इसलिए इन्होंने गांवों को शहरी निकायों में जोड़ा और अब पहाड़ों में ज़मीनों को खुर्द-बुर्द करने की साज़िश रच रहे हैं.
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भाजपा प्रवक्ता देवेंद्र भसीन इन बातों का ज़ोरदार ढंग से विरोध करते हैं. वह कहते हैं कि उद्योगपति यहां भू-माफ़िया की तरह नहीं आ रहे हैं. वह एक उद्योग लगाने के लिए आएंगे और उसके लिए सरकार से अनुमति मांगेगे. दी जाने वाली जगह पर सिर्फ़ वही उद्योग लगाया जाएगा जिसकी अनुमति सरकार देगी. अगर ऐसा नहीं होता तो ज़मीन ज़ब्त हो जाएगी.

बाद में बदलवा दिया भू-उपयोग

चारु तिवारी कहते हैं कि ज़मीन हड़पने के लिए कानून बदलना तो पहले भी होता रहा है. नारायण दत्त तिवारी ने भीमताल को इलेक्ट्रॉनिक घाटी बनाने पर विचार किया तो लोगों भी अपनी ज़मीनें ख़ुशी-ख़ुशी दे दीं कि यहां रोज़गार आएगा. वहां इंडस्ट्री लगी भीं लेकिन तीन-चार साल सब्सिडी खाने के बाद उद्योगपतियों ने उन्हें बंद कर दिया. उसके बाद फिर लैंडयूज़ बदला गया और किसी ने कोठी बनाई, किसी ने होटल, किसी ने रिज़ॉर्ट.

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चारु कहते हैं कि सरकारों की मंशा इसी से समझी जा सकती है कि यह 10 साल से एनआईटी के लिए ज़मीन नहीं ढूंढ पा रही है जबकि सुमाड़ी गांव ने अपनी ज़मीन तक इसके लिए दे दी है. इसके विपरीत 18 साल में 17 प्राइवेट यूनिवर्सिटी यहां खुल चुकी हैं. सरकार के अनुसार 376 गांव भूस्खलन का खतरा झेल रहे हैं (गैरसरकारी आंकड़ों के अनुसार यह ज़्यादा है) और इनका पुनर्वास किया जाना है लेकिन सरकार के पास इसके लिए ज़मीन नहीं है. इसके विपरीत रानीखेत के पास मजखाली में जिंदल को 354 नाली ज़मीन दे दी गई. पंतनगर यूनिवर्सिटी के पास 17000 एकड़ ज़मीन थी जिसे टाटा और दूसरी कंपनियों को एक रुपये लीज़ पर दे दिया.

उत्तराखंड विरोधी फ़ैसले

वरिष्ठ पत्रकार दिनेश जुयाल कहते हैं कि अगर उद्यान के नाम पर ज़मीन दे रहे हैं तो पहाड़ के लोगों के लिए यह बड़ा नुक़सान है. हिमाचल ने एक अलग से औद्यानिकी विश्वविद्यालय खोला और अपने लोगों को सबल किया. बजाय इसके कि आप लोगों को औद्यानिकी सिखाएं, आप इसके लिए ज़मीनें बेच रहे हो. यह फ़ैसला लोगों के ख़िलाफ़ है, उत्तराखंड के ख़िलाफ़ है. पर्यटन के लिए ज़मीन दिया जाना भी उत्तराखंड विरोधी फ़ैसला है. पर्यटन को राज्य में कॉटेज इंडस्ट्री के रूप में विकसित किया जाना था. कहां आप रिवर्स माइग्रेशन के दावे करते हैं, होम स्टे जैसी योजनाओं को प्रमोट करने की बात करते हैं और अब पर्यटन के नाम पर सब बेच दे रहे हैं.

 

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जुयाल कहते हैं कि ये त्रिवेंद्र सरकार के ये दोनों फ़ैसले उत्तराखंड विरोधी हैं और पहाड़ इसका विरोध करेगा. विपक्ष कमज़ोर है तो मुख्यमंत्री को घमंड में नहीं आना चाहिए, मनमाने फ़ैसले नहीं करने चाहिएं. उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी जड़ें भी पहाड़ में हैं और अगर वह उत्तराखंड विरोधी फ़ैसला करते हैं तो इसकी कीमत उन्हें 2022 में चुकानी पड़ सकती हैं. बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व उत्तराखंड का अधिकतम दोहन करना चाहता है. अभी त्रिवेंद्र सिंह रावत दिल्ली से यही निर्देश लेकर आए हैं और देश के बड़े औद्योगिक घरानों को यहां ज़मीन बेचने जा रहे हैं.

निवेश की ज़रूरत है

देवेंद्र भसीन कहते हैं कि विरोध करने वालों ने उत्तराखंड के विकास के लिए कभी गंभीर चिंतन नहीं किया और वह चाहते हैं कि उत्तराखंड के युवा, उत्तराखंड पिछड़ा रहे और बाद में देशविरोधी शक्तियों को मौका मिल जाए काम करने के लिए. हमारा सीमांत क्षेत्र है. सीमांत क्षेत्र मजबूत होगा तो देश मजबूत होगा. भसीन कहते हैं कि आज की सबसे बड़ी ज़रूरत निवेशक को लाना है. हमारे पास पैसा नहीं हैं, नौकरी भी नहीं है, बाहर के आदमी को हम आने नहीं देना चाहते. तो हम चाहते क्या हैं? मान लें कि होटल इंडस्ट्री आती है. टॉप मैनेजमेंट को छोड़ दें तो बाकी नौकरियां तो यहीं के लोगों को मिलेंगी और बड़ी इंडस्ट्री से जुड़े सहायक काम भी कई लोगों को रोज़गार देंगे.

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किशोर उपाध्याय कहते हैं, “भारत और बाहर बहुत से ऐसे लोग हैं जो पूरे का पूरा राज्य खरीद सकते हैं. इनवेस्टमेंट के लिए अगर आपको उत्तराखंड को बेचना है, और बेच ही दिया है, तो किसी सेठ को बेच दो पूरे राज्य को वह चला लेगा.”

देवेंद्र भसीन कहते हैं कि कांग्रेसियों के पास कोई सोच ही नहीं है विकास की. यह लोग नेगेटिव पॉलिटिक्स कर रहे हैं. यह चाहते हैं कि पहाड़ का आदमी छोटे-छोटे काम के लिए पहाड़ छोड़कर जाता रहे. लेकिन अगर मुझे अपने घर पर नौकरी मिल जाएगी, सुविधाएं मिल जाएंगी तो मैं पहाड़ छोड़कर क्यों जाऊंगा? स्वास्थय, शिक्षा सारी सुविधाएं अब पहाड़ों पर मिलने वाली हैं. इसलिए यह कदम पलायन को रोकने के लिए भी बड़ा कदम साबित होगा.

थाईलैंड मत बनने देना

जुयाल कहते हैं सुंदरलाल बहुगुणा कहते थे कि उत्तराखंड को थाईलैंड मत बनने देना. आप जो करने जा रहे हो आप उत्तराखंड को थाईलैंड बनाने जा रहे हो. अगर कोई दिल्ली का, पंजाब का, गुजरात का उद्यमी यहां आकर होटल, टूरिस्ट स्पॉट खोल रहा है तो वह यहां अय्याशी के अड्डे बनाएगा. हिमालय है, साफ़ पानी, साफ़ हवा, ख़ूबसूरत नज़ारे तो यहां हैं ही. इसे और मनोरंजक बनाने के लिए वह जो एलिमेंट्स डालेगा वह यहां की संस्कृति पर हमला होंगे. उसे पता है कि यहां मैनपावर बहुत सस्ती मिल जाएगी, पहाड़ों में गरीबी है, नौकरी के लिए लोग परेशान हैं. उत्तराखंड के कमज़ोर युवकों, युवतियों पर आपकी नज़र है और आप यह बहुत अमानवीय सोच रहे हैं. यह ख़तरनाक स्थितियां हैं. यह वह उत्तराखंड कतई नहीं बना रहे जिसके लिए लोगों ने जान दी हैं.

जिसे ज़मीन बेची, उसी के यहां नौकर

चारु तिवारी कहते हैं कि हिमाचल निर्माता माने जाने वाले और प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री डॉक्टर यशवंत सिंह परमार सरकार को यह समझने में एक साल ही लगा कि अगर बाहरी लोगों की अंधाधुंथ ज़मीन ख़रीद पर रोक नहीं लगाई गई तो हिमाचली लोग सड़क पर आ जाएंगे.

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1971 में पूर्ण राज्य बनने के बाद 1972 में ही हिमाचल प्रदेश टेनेंसी एंड लैंड रिफॉर्म्स एक्ट 1972 में विशेष प्रावधान किया गया. एक्ट के 11वें चैप्टर ‘कंट्रोल ऑन ट्रांसफर ऑफ लैंड’ में धारा-118 के तहत ‘गैर-कृषकों को जमीन बेचने पर रोक लगा दी गई. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि डॉक्टर परमार ने देखा कि हिमाचली लोगों ने जिन्हें अपनी ज़मीन बेची थी वह उसी के यहां बतौर नौकर काम कर रहे थे. चारु तिवारी कहते हैं कि उत्तराखंड में भी यही करने की साज़िश है.

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First published: June 5, 2019, 6:25 PM IST
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