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पहाड़ को नहीं मिलेगा मुख्यमंत्री स्वरोज़गार योजना का फ़ायदा! राज्य आंदोलनकारियों को है यह आशंका

उत्तराखंड में विभिन्न प्रदेशों से करीब 4 लाख लोग वापस लौटे हैं और बड़ी संख्या में अब यहीं रहकर कुछ काम करना चाहते हैं.

उत्तराखंड में विभिन्न प्रदेशों से करीब 4 लाख लोग वापस लौटे हैं और बड़ी संख्या में अब यहीं रहकर कुछ काम करना चाहते हैं.

यूकेडी का कहना है कि जब तक पहाड़ों में इसके बारे में पता चलेगा यह खत्म हो जाएगी.

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देहरादून. स्वरोज़गार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से त्रिवेंद्र कैबिनेट ने आज दो बड़े फ़ैसले किए हैं. कैबिनेट मोटरसाइकिल टैक्सी और डेयरी, ठेली, फेरी के लिए सस्ता लोन देने का ऐलान किया है. ये लोन मुख्यमंत्री स्वरोज़गार योजना के तहत दिए जाएंगे जिसका ऐलान कुछ दिन पहले ही पलायन रोकने के उद्देश्य से किया गया था. राज्य सरकार के अनुसार ये लोन स्थानीय निवासियों को ही मिलेगा. लेकिन राज्य निर्माण आंदोलन से जुड़े लोग इसे लेकर आशंकाएं जता रहे हैं. उनका कहना है कि इसमें मूल निवासी की शर्त न होने की वजह से उत्तराखंड के मूल निवासियों को इसका फ़ायदा नहीं मिल पाएगा.

मुख्यमंत्री स्वरोज़गार योजना

कोरोना संकट काल में 4 लाख के आसपास प्रवासी दूसरे राज्यों से उत्तराखंड लौटे हैं. इनमें बहुत से अब यहीं रहना चाहते हैं, काम करना चाहते हैं. इन सबको देना तो संभव नहीं है इसलिए सरकार ने स्वरोज़गार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना लॉन्च की है जिसके तहत 10 से 25 लाख तक के लोन सब्सिडी के साथ मिलेंगे.

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत खुद इस प्रोजेक्ट की मॉनिटरिंग कर रहे हैं. बुधवार को इसके लिए सभी जिलों के डीएम को कुल 110 करोड़ रुपये जारी कर दिए गए हैं ताकि काम तुरंत शुरु हो क्योंकि लोगों को ज़रूरत अभी है. इसी योजना के तहत गुरुवार को कैबिनेट ने सहकारिता विभाग के माध्यम से 20,000 से अधिक नागरिकों को मोटरसाइकिल टैक्सी योजना में 60,000 रुपये तक का लोन और 50,000 नागरिकों को डेरी, ठेली, फल व्यवसाय के लिए देने का फ़ैसला किया है.

आरक्षण नहीं तो फ़ायदा नहीं

लेकिन कैबिनेट के इस फ़ैसले को लेकर आशंकाएं भी पैदा हो गई हैं. राज्य आंदोलनकारी मंच के देहरादून ज़िलाध्यक्ष प्रदीप कुकरती कहते हैं कि पहाड़ के निवासियों को इससे कोई फ़ायदा नहीं होगा. लाखों की संख्या में जो प्रवासी प्रदेश में लौटे हैं उनके पास अभी खुद को स्थाई निवासी दिखाने का प्रमाण पत्र ही नहीं होगा. उनके पास उन राज्यों के राशन कार्ड, आधार कार्ड होंगे जहां से वह मजबूरन लौटे हैं.

कुकरेती कहते हैं कि जब तक वह सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काटकर यह बनवाएंगे तब तक तो सारा फ़ायदा हरिद्वार, देहरादून, नैनीताल, ऊधम सिंह नगर के मैदानी क्षेत्रों के लोग उठा लेंगे और पहाड़ी फिर हाथ मलते रह जाएंगे. कुकरेती कहते हैं कि ऐसी किसी योजना से पलायन रोकने में मदद नहीं मिलेगी जिसमें मूल निवासियों के लिए आरक्षण न हो.

पहाड़ के लिए नहीं बनतीं देहरादून से योजनाएं

उत्तराखंड क्रांति दल के केंद्रीय प्रवक्ता पीसी थपलियाल कहते हैं कि मोटरसाइकिल टैक्सी योजना पहाड़ के युवाओं के लिए बहुत कारगर सिद्ध हो सकती थी और पर्यटकों के लिए भी क्योंकि वहां न टैक्सी हैं, न रिक्शा. लेकिन जब तक पहाड़ों में इसके बारे में पता चलेगा यह खत्म हो जाएगी.

थपलियाल कहते हैं कि दरअसल देहरादून में बैठकर जो योजनाएं बनती हैं वह पहाड़ चढ़ ही नहीं पातीं क्योंकि वह यहीं के लिए बनती हैं. देहरादून में राजधानी बनना पहाड़ के साथ बड़ा धोखा रहा है, यहां से बनने वाली सारी योजनाएं पहाड़ विरोधी होती हैं.

यूकेडी प्रवक्ता कहते हैं कि देहरादून के 6 नंबर पुलिया पर नगर निगम ने जो वेंडिंग ज़ोन बनाया यूकेडी ने उसका विरोध भी किया था क्योंकि वहां दुकानें-ठेलियां सब बाहर वालों को दे दी गई हैं. मुख्यमंत्री स्वरोज़गार योजना के साथ भी ऐसा ही होने का डर है.

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