उत्तराखंड में कहां और कितने हैं स्नो लैपर्ड, अब पता चलेगा... उच्च हिमालयी क्षेत्रों में लगेंगे सोलर कैमरा ट्रैप
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उत्तराखंड में कहां और कितने हैं स्नो लैपर्ड, अब पता चलेगा... उच्च हिमालयी क्षेत्रों में लगेंगे सोलर कैमरा ट्रैप
करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई तक पाया जाने वाला स्नो लेपर्ड एक दुर्लभ प्राणी है. IUCN ने इसे संकटग्रस्त प्राणियों की सूची में रखा है.

अक्टूबर से मार्च के बीच जब इन उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ़ की सफेद चादर पसरी होगी तब कैमरा ट्रैप अपना काम कर रहे होंगे.

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देहरादून. उत्तराखंड फॉरेस्ट डिपार्टमेंट पहली बार स्नो लैपर्ड की गणना करने जा रहा है. इसके लिए उत्तराखंड के नीति मलारी से लेकर नेलांग घाटी, पिंडारी, सुन्दरढूंगा ग्लेशियर समेत उन तमाम उच्च हिमालयी क्षेत्रों में सोलर कैमरा ट्रैप लगाने की तैयारी शुरू हो गई है जहां-जहां इसके पाए जाने की संभावना हो सकती है. दरअसल बर्फीले क्षेत्रों में करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई तक पाया जाने वाला स्नो लेपर्ड एक दुर्लभ प्राणी है. IUCN ने इसे संकटग्रस्त प्राणियों की सूची में रखा है.

24 घंटे काम करेंगे सोलर कैमरा ट्रैप 

पिछले कुछ सालों में उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में वन विभाग द्वारा लगाए गए कैमरा ट्रैप, बॉर्डर पर तैनात सेना, आईटीबीपी के जवानों को स्नो लेपर्ड देखने को मिले हैं. इस अनुमान के मुताबिक उत्तराखंड में मौजूदा समय में 86 स्नो लैपर्ड मौजूद हैं हालांकि बर्फीले क्षेत्रों में पाए जाने के कारण स्नो लेपर्ड की आज तक काउंटिंग नहीं हो पाई है.



अब उत्तराखंड वन विभाग भारतीय वन्य जीव संस्थान के सहयोग से पहली बार स्नो लेपर्ड की कॉउंटिंग करने जा रहा है. उत्तराखंड के चीफ़ वाइल्ड लाइफ वार्डन जीएस सुहाग का कहना है कि इसमें बॉर्डर एरिया में आईटीबीपी और सेना की मदद भी ली जा रही है. इन क्षेत्रों में सोलर कैमरा ट्रैप लगाए जा रहे हैं दोरे चौबीसों घंटे काम कर सकेंगे.
पहली बार सामने आएंगे वैज्ञानिक आंकड़े

उत्तराखंड में नेलांग वैली से लेकर बागेश्वर में सुन्दरढूंगा ग्लेशियर तक बीते सालों में स्नो लेपर्ड देखे गए हैं. बागेश्वर में पहली बार 2015 में स्नो लैपर्ड एक रिसर्चर विपुल मौर्या के कैमरा ट्रैप में कैद हुए था. इसके बाद विपुल ने उत्तराखंड के अन्य क्षेत्रों में भी स्नो लेपर्ड को कैप्चर किया. विपुल का मानना है कि उत्तराखंड में स्नो लैपर्ड अच्छी खासी संख्या में हो सकते हैं

वन विभाग के अनुसार ये कैमरा ट्रैप सितंबर तक लगा दिए जाएंगे. अक्टूबर से मार्च के बीच जब इन उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ़ की सफेद चादर पसरी होगी तब कैमरा ट्रैप अपना काम कर रहे होंगे. यदि यह प्रयोग सफल रहा तो पहली बार स्नो लेपर्ड की संख्या के वैज्ञानिक आंकड़े सामने आ सकेंगे. वन विभाग के मुख्यालय में मुख्य वन सरंक्षक पराग मधुकर धकाते का कहना है कि इस तरह के साइंटिफिक डॉक्यूमेंटेशन से स्नो लेपर्ड कंजर्वेशन में मदद मिलेगी.
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