VIDEO: लांगलेंग और तामेंगलेंग ने छह दिन में नॉनस्‍टॉप तय की छह हजार किलोमीटर की दूरी

तामेंगलेंग ने मणिपुर से 19 नवंबर को तो लांगलेंग ने नागालैड से 18 नवंबर को उड़ान भरी थी. ये क्रमश: 24 नवंबर को सोमालिया और 23 नवंबर को कीनिया पहुंच गए.

Sunil Navprabhat | News18 Uttarakhand
Updated: November 29, 2018, 5:29 PM IST
Sunil Navprabhat
Sunil Navprabhat | News18 Uttarakhand
Updated: November 29, 2018, 5:29 PM IST
देश के नार्थ-ईस्ट (नागालैंड और मणिपुर) से 19 नवंबर को उड़े लांगलेंग और तामेंगलेंग नाम के अमूर फॉल्कन पक्षी बंगाल की खाड़ी, अरब सागर को पार कर बिना रुके छह दिन में करीब छह हजार किलोमीटर की यात्रा तय कर सोमालिया पहुंच गए हैं. अमूर फॉल्कन की रोमांच से भरी पल-पल की यात्रा पर भारतीय वैज्ञानिक बारीकी से नजर रख रहे हैं.

अमूर फॉल्कन कबूतर के आकार का बाज प्रजाति का एक प्रवासी पक्षी है, जो मूलत: रूस के साइबेरिया क्षेत्र अमूर का निवासी है. यह हर साल अक्टूबर से नवंबर के बीच लाखों की संख्या में भारत के नागालैंड और मणिपुर में भी देखा जाता है. यहां हजारों की संख्या में ये पक्षी मांस के लिए मार दिए जाते थे. वैश्विक स्तर पर जब अवैध शिकार का ये मामला उठा, तो भारतीय वैज्ञानिकों का ध्यान इस पक्षी की ओर गया.

भारतीय वन्य जीव संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिकों ने 2013 में तीन फॉल्कन पक्षियों पर सैटेलाइट चिप लगाई, ताकि ये पता किया जा सके कि ये पक्षी आते कहां से हैं और जाते कहां हैं. पक्षियों पर चिप लगाने का भारत में यह पहला प्रयोग था. चिप से जो डेटा मिला, वैज्ञानिक उसे देखकर हैरान हैं. अमूर फाल्कन गर्मियां समाप्त होते ही मंगोलिया से उड़कर चीन, भारत होते हुए सोमालिया और सोमालिया से ठंड के लिए साउथ अफ्रीका पहुंचते हैं और फिर यहां कुछ महीने बिताने के बाद गर्मियों के लिए अफगानिस्तान होते हुए वापस मंगोलिया जाते हैं.

सालभर की इस प्रवास यात्रा में फाल्कन करीब बीस हजार किलोमीटर की यात्रा तय करता है. ये जानकारी मिलते ही भारत सरकार ने इनके संरक्षण की पहल शुरू की और 2014 में अमूर फाल्कन के संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट लांच कर भारतीय वन्य जीव संस्थान को इसकी जिम्मेदारी दे दी गई.

लांगलेंग और तामेंगलेंग नाम के जो पक्षी सोमालिया पहुंचे, उनकी कहानी भी दिलचस्प है. लांगलेंग उन पांच पक्षियों में से एक है, जिन पर 2016 में चिप लगाई गई थी, तो तामेंगलेंग पर इसी महीने 9 नवंबर को मणिपुर में चिप लगाई गई. लांगलेंग और तामेंगलेंग उन लाखों फॉल्कनों में से हैं, जो अपनी प्रवास यात्रा के तहत यहां पहुंचे थे.

तामेंगलेंग ने मणिपुर से 19 नवंबर को तो लांगलेंग ने नागालैड से 18 नवंबर को उड़ान भरी. तामेंगलेंग पांच हजार छह सौ किलोमीटर की नॉन स्टॉप यात्रा कर 24 नवंबर को सोमालिया पहुंच गया, जबकि लांगलेंग पांच हजार सात सौ किमी की यात्रा तय कर अपने झुंड के साथ 23 नवंबर को सोमालिया से लगे कीनिया पहुंच चुका है. वैज्ञानिकों को अब इनके साउथ अफ्रीका पहुंचने का इंतजार है.

बहरहाल, अमूर फाल्कन के संरक्षण के भारतीय प्रयास को विश्व स्तर पर सराहा जा रहा है. स्थानीय पादरियों, चर्च के माध्यम से चलाए जा रहे जनजागरण कैंपेन की वजह से मणिपुर, नागालैंड में अमूर फॉल्कन का अवैध शिकार भी बंद होने लगा है. इस अद्भुत प्रवासी पक्षी के बारे में जानकर स्थानीय लोग अब शिकार को छोड़ खुद इसके संरक्षण में जुट गए हैं. साथ ही अमूर फॉल्कन को देखने के लिए पर्यटकों का भी जमावड़ा लगने लगा है.
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First published: November 29, 2018, 11:17 AM IST
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