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अजब इत्तेफाक: चुनाव जीते तो सत्ता से दूर, हारे तो बनती है सरकार!

अजब इत्तेफाक: चुनाव जीते तो सत्ता से दूर, हारे तो बनती है सरकार!

सियासत से जुडे हर शख्स के लिए सत्ता अहमियत रखती है, लेकिन कुछेक नेताओं का इत्तेफाकन या फिर कहें कि बदकिस्मती से सत्ता से बैर रहा है. दरअसल ये महानुभाव जब विधानसभा चुनाव जीते तो उनकी पार्टी को सत्ता नसीब नहीं हुई और जब उनकी पार्टी ने सरकार बनाई तो वे चुनाव हार गए.

सियासत से जुडे हर शख्स के लिए सत्ता अहमियत रखती है, लेकिन कुछेक नेताओं का इत्तेफाकन या फिर कहें कि बदकिस्मती से सत्ता से बैर रहा है. दरअसल ये महानुभाव जब विधानसभा चुनाव जीते तो उनकी पार्टी को सत्ता नसीब नहीं हुई और जब उनकी पार्टी ने सरकार बनाई तो वे चुनाव हार गए.

वैसे तो सियासत से जुडे हर शख्स के लिए सत्ता अहमियत रखती है, लेकिन कुछेक नेताओं का इत्तेफाकन या फिर कहें कि बदकिस्मती से सत्ता से बैर रहा है. दरअसल ये महानुभाव जब विधानसभा चुनाव जीते तो उनकी पार्टी को सत्ता नसीब नहीं हुई और जब उनकी पार्टी ने सरकार बनाई तो वे चुनाव हार गए.

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    वैसे तो सियासत से जुडे हर शख्स के लिए सत्ता अहमियत रखती है, लेकिन कुछेक नेताओं का इत्तेफाकन या फिर कहें कि बदकिस्मती से सत्ता से बैर रहा है. दरअसल ये महानुभाव जब विधानसभा चुनाव जीते तो उनकी पार्टी को सत्ता नसीब नहीं हुई और जब उनकी पार्टी ने सरकार बनाई तो वे चुनाव हार गए.

    भले ही आपको ये बात सुनने में थोडी अटपटी लग रही हो, लेकिन उत्तराखंड में कुछेक नेताओं को सत्ता से बैर रहा है. सबसे पहले बात करते हैं भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भटट की. जो उत्तराखंड गठन के बाद हुए 2002 में हुए पहले आम चुनावों में रानीखेत सीट पर खुद तो जीत गए, लेकिन उनकी पार्टी चारों खाने चित्त हो गई और सरकार कांग्रेस की बन गई.

    उसके बाद 2007 में दूसरे आम चुनावों के बाद बीजेपी ने सत्ता में वापसी हुई. लेकिन भट्ट रानीखेत में बेहद करीबी मुकाबले में चुनाव हार गए थे. इसी तरह 2012 में हुए तीसरे आम चुनाव में अजय भट्ट चुनाव तो जीत गए, लेकिन उत्तराखंड में सरकार कांग्रेस की बन गई थी. अब एक बार फिर भट्ट मौजूदा यानि चौथे चुनाव में अपनी पारंपरिक रानीखेत सीट से चुनावी मैदान में हैं. अजय भटट का कहना है कि ये सच है कि राज्य गठन के बाद ये इत्तेफाक उनसे जुड़ा है, लेकिन इस बार ये सिलसिला टूट जाऐगा.

    आईए अब बीजेपी से इतर बात करते हैं कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय की. मौजूदा विधानसभा यानि 2012 में हुए तीसरे आम चुनाव के बाद उनकी पार्टी की सरकार कायम हुई, लेकिन खुद टिहरी सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी दिनेश धनै से मामूली अंतर से चुनाव हार गए थे.

    इसके पहले किशोर साल 2007 में हुए दूसरे विधानसभा चुनाव में टिहरी से विधायक तो निर्वाचित हुए थे, लेकिन उत्तराखंड में सरकार भारतीय जनता पार्टी की बनी थी. खास बात ये है कि राज्य गठन के बाद हुए 2002 में हुए पहले आम चुनावों में किशोर टिहरी सीट से पहली बार विधायक बने और तत्कालीन नारायण दत्त तिवारी सरकार में राज्य मंत्री भी बन गए, लेकिन मंत्रीमंडल का आकार सीमित करने लिए बने कानून के तहत हुई छटनी में उन्हें मंत्रालय से हाथ धोना पड़ा था.

    इस बार किशोर उपाध्याय पारंपरिक टिहरी सीट छोडकर सहसपुर से चुनाव लड रहे हैं. पार्टी प्रवक्ता मथुरा दत्त जोशी का दावा है कि किशोर ना सिर्फ ये चुनाव जीतेंगे बल्कि कांग्रेस सरकार का हिस्सा भी बनेंगे.

    ये तो रही अजय भटट और किशोर उपाध्याय की सत्ता से बैर की कहानी. लेकिन नारायण दत्त तिवारी से दूसरा इत्तेफाक जुडा है. तिवारी साल 2002 में उत्तराखंड की पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री बने, जिसके बाद 2007 में आम चुनाव हुआ, लेकिन कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा. ठीक यही सिलसिला उत्तरप्रदेश में रहा था क्योंकि तिवारी के सीएम रहते कांग्रेस चुनाव हारी थी.

    Tags: Uttarakhand news

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