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ग्राम गंगा अभियान से प्रवासी उत्तराखंडियों को जड़ों से जोड़ रहे हैं मैती आंदोलन वाले कल्याण सिंह रावत
Dehradun News in Hindi

Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: February 6, 2020, 8:01 PM IST
ग्राम गंगा अभियान से प्रवासी उत्तराखंडियों को जड़ों से जोड़ रहे हैं मैती आंदोलन वाले कल्याण सिंह रावत
2014 में यह अनूठा अभियान शुरु किया गया है जिससे अपने गांवों से दूर रहने वाले उत्तराखंडियों का एक बार फिर अपने गांव से जुड़ाव बन रहा है.

2014 में यह अनूठा अभियान शुरु किया गया है जिससे अपने गांवों से दूर रहने वाले उत्तराखंडियों का एक बार फिर अपने गांव से जुड़ाव बन रहा है.

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देहरादून. मां-बेटी के रिश्ते को आधार बनाकर मैती आंदोलन की नींव रखने वाले कल्याण सिंह रावत को इस साल का पद्मश्री सम्मान मिला है. लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि कल्याण सिंह रावत पर्यावरण संरक्षण के लिए एक और अभियान में जुटे हुए हैं. बीते 5 साल से वह ग्राम गंगा अभियान पर काम कर रहे हैं जो भावनात्मक रूप से लोगों को अपने गांवों, अपनी जड़ों से जोड़ने का अभियान है. जीव विज्ञान के शिक्षक रहे कल्याण सिंह रावत ने 2014 में रिटायर होने के बाद यह अनूठा अभियान शुरु किया है जिससे अपने गांवों से दूर रहने वाले उत्तराखंडियों का एक बार फिर अपने गांव से जुड़ाव बन रहा है.

एक रुपया रोज़

मैती आंदोलन की तरह ही कल्याण सिंह रावत ने प्रवासी उत्तराखंडियों को अपने गांवों से भावनात्मक रूप से जोड़ने के लिए ग्राम गंगा अभियान शुरु किया. रावत बताते हैं कि इस अभियान के तहत सभी प्रवासी उत्तराखंड रोज़ कम से कम एक रुपये गांव के नाम पर एक गुल्लक में जमा करते हैं. 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर यह पैसा गांव वालों को दे दिया जाता है.

गांव वाले इस पैसे से एक पेड़ खरीदते हैं और उसे प्रवासी उत्तराखंडी के नाम पर गांव में लगा देते हैं. बाकी जो पैसा बचता है उसमें से कुछ गांव के किसी बच्चे को दिया जाता है ताकि वह उस पेड़ की देखभाल करे, उसकी सुरक्षा करे. इस तरह से प्रवासी उत्तराखंडियों के नाम के पेड़ गांव में लगते जाते हैं और गांव के ही बच्चे उन्हें बचाते हैं.

जुड़ाव

यह बच्चा आपके साथ संपर्क में भी रहता है और पेड़ की वृद्धि की जानकारी आपको फ़ोटो, सेल्फ़ी के साथ भेजता रहता है. इससे आपको पता चलता रहता है कि आपका पेड़ कितना बड़ा हो रहा है. इससे आपका उस पेड़ से, अपने गांव से, अपने लोगों से भावनात्मक रिश्ता बनता है, मजबूत होता है.

इससे यह भी होता है कि अपने गांव के जिस बच्चे से आपकी बात हो रही होती है आपका उससे भी एक भावनात्मक रिश्ता बनता है. आप उससे बात करते हैं उसके बारे में भी. फिर आप उसे गाइड करते हैं और कई बार मदद भी करते हैं.
kalyan singh rawat, मां-बेटी के रिश्ते को आधार बनाकर मैती आंदोलन की नींव रखने वाले कल्याण सिंह रावत को इस साल का पद्मश्री सम्मान मिला है.
मां-बेटी के रिश्ते को आधार बनाकर मैती आंदोलन की नींव रखने वाले कल्याण सिंह रावत को इस साल का पद्मश्री सम्मान मिला है.


गाड़-गदेरे होंगे तो रहेगी गंगा

कल्याण सिंह रावत कहते हैं कि इस अभियान में गंगा इसलिए जोड़ा गया है क्योंकि पेड़ से पानी के स्रोत रीचार्ज होते हैं और इस अभियान में जल संचयन भी शामिल है. मान लें कि आपने 5 जून को गांव में 500 रुपये भेजे. इसमें से 100 रुपये का पेड़ आ गया और 200 रुपये बच्चे को दे दिए गए देखभाल करने के लिए.

अब जो 200 रुपये बचे हैं उनका इस्तेमाल किया जाएगा गांव के धारे की सफ़ाई के लिए, गांव में पर्यावरण के और काम करने के लिए. अगर गांव के 50 लोग इस अभियान से जुड़ते हैं तो हर साल गांव में 50 पेड़ लगेंगे. इससे गांव में हरियाली आएगी और हर पेड़ दो-चार बूंद पानी तो ज़मीन को देगा ही. यह पानी गाड़ गदेरों से होता हुआ गंगा (नदी) तक जाएगा ही तो गंगा पोषित होगी.

तो हम गंगा को बचाने के लिए अपने गांव में एक पेड़ लगा रहे हैं. अगर ऐसा हर गांव में होता है तो फिर एक पूरी बेल्ट बन जाएगी. इससे हिमालय सुरक्षित होगा, गंगा में पानी होगा. यह भी सोचना होगा कि गंगोत्री से निकलने वाली गंगा में अगर गाड़-गदेरे न मिलें तो वह क्या देवप्रयाग तक पहुंच पाएगी? नहीं वह उत्तरकाशी में ही विलीन हो जाएगी. तो पेड़ लगाकर हम गाड़-गदेरों में पानी पहुंचा रहे हैं और यह गंगा को सींच रहे हैं.

उच्यणा का पैसा   

कल्याण सिंह रावत कहते हैं कि जैसे सरकारी योजनाओं में पैसे की बंदरबांट होती है, औपचारिकताएं निभाई जाती हैं ऐसा ग्राम गंगा अभियान के पैसे के साथ नहीं होता. रावत खुद अपनी ग्राम-गंगा गुल्लक मंदिर में रखते हैं. शाम को जब वह पूजा करने बैठते हैं तो उसके बाद इसमें कुछ पैसे डाल देते हैं.

वह कहते हैं कि गांव वाले भी जानते हैं कि यह उच्यणा का पैसा है. उच्यणा का अर्थ है कि यह पैसा देवता से किसी मनौती को पूरा करने के लिए निकाला गया है. यह पैसा मंदिर में अपने पित्रों के लिए, अपने कुल या गांव देवता के नाम का है. इसलिए जब यह पैसा गांव में दिया जाएगा तो इसे उसी काम में लगाया जाएगा जिसके लिए यह दिया गया है.

चमोली में यह अभियान धीरे-धीरे ज़ोर पकड़ रहा है और कल्याण सिंह रावत को आशा है कि यह देवभूमि के दूसरे स्थानों में भी विस्तार पाएगा.

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First published: February 6, 2020, 7:13 PM IST
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