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गोरखा लड़ाकों की अमर शौर्य गाथा, अंग्रेजों ने सम्मान में खुद बनवाया था 'खलंगा युद्ध स्मारक'

गोरखा

गोरखा सैनिकों ने खलंगा किले पर मोर्चा संभाला था.

गोरखा सैनिकों के पास अपनी पारंपरिक खुकुरी, तलवार और धनुष-बाण थे.

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    अगर कोई ये कहता है कि वो मौत से नहीं डरता है, तो वह या तो झूठ बोल रहा है या फिर वह गोरखा है, इतना अटूट विश्वास था भारत के सबसे बड़े मिलिट्री कमांडर में से एक, फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का‌ गोरखा रेजीमेंट के सैनिकों पर. अगर गोरखा सैनिकों के दमखम और युद्ध कौशल से आप वाकिफ होना चाहते हैं तो चले आइए देहरादून स्थित खलंगा युद्ध स्मारक पर, जो न केवल गोरखा लड़ाकों के पराक्रम की दास्तां को जगजाहिर करता है बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में गोरखा लड़ाकों के बलिदान को भी दर्शाता है.

    खलंगा युद्ध की कहानी

    देहरादून की खूबसूरत पहाड़ियों मेंं से एक खलंगा पहाड़ी पर 31 अक्टूबर, 1814 को मात्र 600 गोरखा सैनिकों ने खलंगा किले पर मोर्चा संभाला था. उनके सामने थी 3500 सैनिकों की संख्या वाली ब्रिटिश सेना, जिनके पास उस समय की आधुनिक बंदूकें और तोपे थीं. गोरखा सैनिकों के पास अपनी पारंपरिक खुकुरी, तलवार और धनुष-बाण थे. गोरखा सैनिकों ने खुकुरी के दम पर अकेले 1000 अंग्रेज सैनिकों को मार डाला. इस लड़ाई में कई अंग्रेज अफसर भी मारे गए, जिनमें मेजर जनरल रॉबर्ट रोलो जिलेप्सी भी थे. इस युद्ध में गोरखा सेना का नेतृत्व कर रहे बलभद्र कुंंवर भी शहीद हो गए. ब्रिटिश सेना द्वारा कलिंगा किले का पानी रोक दिया गया, जिस वजह से बलभद्र कुंंवर अपने 70 सैनिकों के साथ किले से बाहर आ गए और अंग्रेजों से युद्ध के दौरान वह शहीद हो गए. कुछ लोगों का मानना है कि बलभद्र कुंवर वहां से भाग गए थे और अफगानिस्तान में सैनिक के रूप में 1835 में हुए युद्ध में शहीद हुए.

    अंग्रेजों ने किया बहादुरी का सम्‍मान

    इस युद्ध में गोरखा सैनिकों की बहादुरी को अंग्रेजों ने भी पूरा सम्‍मान दिया. उन्‍होंने 1815 में गोरखा रेजिमेंट की स्‍थापना की. भारत के साथ ही इंग्‍लैंड में भी गोरखा रेजिमेंट का होना गोरखा सैनिकों के महत्‍व को बताता है. इसके साथ ही अंग्रेजों ने देहरादून की सहस्‍त्रधारा रोड पर खलंगा शहीदों की याद में एक स्‍मारक बनवाया.
    हर साल यहां मेला लगता है, जिसमें हजारों लोग जुटते हैं. खलंगा स्मारक ऐतिहासिक धरोहर है. यहां हर साल हजारों की संख्या में पर्यटक आते हैं. इसके साथ ही गोरखाओं की वीरता को याद करने के लिए शहर के गढ़ीकैंट क्षेत्र में मेला भी आयोजित किया जाता है.

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