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Lal Bahadur Shastri Jayanti: 'हार्ट ऑफ सिटी' है देहरादून का घंटाघर, लाल बहादुर शास्त्री ने किया था उद्घाटन

देहरादून में बलबीर क्लॉक टावर बनने के बाद 23 अक्टूबर, 1953 की शाम को तत्कालीन रेलमंत्री और देश के पूर्व प्रधानमंत्री ला ...अधिक पढ़ें

    हिना आज़मी/देहरादून. उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के बीचोंबीच घंटाघर स्थित है, जिसे ‘हार्ट ऑफ सिटी’ कहा जाता है. इसका अलग ही इतिहास है. पिता बलबीर सिंह की याद में यह घंटाघर आनंद सिंह ने बनवाया था और तत्कालीन रेलवे व यातायात मंत्री लाल बहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri Jayanti) ने इसका उद्घाटन किया. आज (2 अक्टूबर, 2022) शास्त्री जी की जयंती है. उनका जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को उत्तर प्रदेश केमुगलसराय में हुआ था. उनके पिता स्कूल शिक्षक थे. वह 9 जून, 1964 से 11 जनवरी, 1966 तक देश के प्रधानमंत्री रहे थे.

    देहरादून का घंटाघर शहर की पहचान है. यह राजधानी में आकर्षण का केंद्र भी है क्योंकि यह विशेष तरीके से बनवाया गया है. भारत में यह बिना घंटानाद का सबसे बड़ा घंटाघर है. इसी के साथ ही इसके शीर्ष पर 6 घड़ियां होने से यह एशिया में अपनी तरह का दुर्लभ घंटाघर बताया जाता है. देहरादून के न्यायाधीश और रईस बलबीर सिंह की मौत 22 सितंबर, 1936 को हुई थी और उनकी याद में उनके बेटे आनंद सिंह ने यह बलबीर क्लॉक टावर बनवाया था. आनंद स्वरूप गर्ग उस वक़्त सिटी बोर्ड के अध्यक्ष थे, जिन्होंने बलबीर क्लॉक टावर निर्माण का प्रस्ताव सिटी बोर्ड को दिया था.

    आसान नहीं था क्लॉक टावर बनाना
    क्लॉक टावर बनाना इतना आसान नहीं था. क्योंकि आपसी प्रतिद्वंद्विता के चलते शहर के बाकी रईस नहीं चाहते थे कि इस क्लॉक टावर का निर्माण हो. इसी के साथ ही निर्माण में भूमि के स्वामित्व और ठेकेदार की कोटेशन, तांगा चालकों का विवाद निर्माण में रुकावट बना. सिटी बोर्ड अध्यक्ष आनंद स्वरूप गर्ग बलबीर क्लॉक टावर के निर्माण के पक्षधर थे ताकि शहर को सुंदर बनाया जा सके. उन्होंने बलबीर सिंह के बेटे आनंद सिंह को सुझाव दिया कि अगर घंटाघर के निर्माण के शिलान्यास के लिए उत्तर प्रदेश की तत्कालीन गवर्नर सरोजिनी नायडू तैयार हो जाती हैं, तो सभी विवाद खुद ही खत्म हो जाएंगे. आनंद सिंह ने ऐसा ही किया. जिसके बाद गवर्नर सरोजिनी नायडू ने 24 जुलाई, 1948 को बलबीर क्लॉक टावर का शिलान्यास किया, जिसके ठेकेदार नरेंद्र देव सिंघल, ईश्वर प्रसाद चौधरी, नत्थूलाल और वास्तुकार हरिराम मित्तल व रामलाल थे.

    अन्य घंटाघर की तरह इसका डिजाइन भी चौकोर था लेकिन बाद में इसे षट्कोणीय किया गया, जिसकी लागत में तब करीब 900 रुपये की बढ़ोतरी हुई थी. घंटाघर के शीर्ष पर 6 घड़ियां लगाई गई हैं, जो उस दौर में स्विट्जरलैंड से भारी भरकम मशीनों के साथ मंगवाई गई थीं. देश में बनाए गए इस अनोखे किस्म के करीब 80 फीट ऊंचे घंटाघर को बलबीर क्लॉक टॉवर नाम दिया गया. आनंद सिंह के परिवार ने 25 हजार रुपये दान देकर घंटाघर के निर्माण में योगदान दिया.

    Tags: Dehradun news, Uttarakhand news

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