राजनीति में आने से पहले वकालत करते थे अजय भट्ट, संघर्षों में बीता है बचपन

Manish Kumar | News18 Uttarakhand
Updated: May 9, 2019, 7:11 PM IST
राजनीति में आने से पहले वकालत करते थे अजय भट्ट, संघर्षों में बीता है बचपन
अजय भट्ट (फ़ाइल फ़ोटो)

1996 में अविभाजित यूपी में पहली बार रानीखेत से विधायक चुने गए भट्ट 2002 और 2012 में भी वह विधायक बने.

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उत्तराखंड की राजनीति में अजय भट्ट एक बड़ा नाम हैं. वह भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हैं और पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं. राजनीति में आने से पहले वह वकील के रूप में प्रैक्टिस करते थे. तर्क करने की इस क्षमता का राजनीति में उन्हें बेशक फ़ायदा मिला लेकिन उनका परिवार वकालत से आज भी जुड़ा हुआ है. अजय भट्ट की पत्नी भी वकील ही हैं. वे न सिर्फ़ राज्य में एडिश्नल एडवोकेट जनरल हैं बल्कि केन्द्र सरकार की स्टैण्डिंग काउन्सिल भी हैं. चार बच्चों में से दो माता पिता की वकालत की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. अजय भट्ट की एक बेटी दिल्ली हाईकोर्ट में तो उनका एकलौता बेटा देहरादून में प्रैक्टिस करता है.

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अजय भट्ट का शुरुआती जीवन भी काफी संघर्षों भरा रहा. छोटी उम्र में ही पिताजी के गुजर जाने से पढ़ाई तो बाधित हुई, जो बड़े भाई की छत्रछाया में पूरी हुई. साथ में उनका हाथ भी बंटाते रहे. कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल से एलएलबी करने के बाद अजय भट्ट की मुश्किलें कम होनी शुरु हुईं. लॉ की पढ़ाई पूरी करने के बाद अजय भट्ट अल्मोड़ा चले गए और कचहरी में वकालत शुरु कर दी. साल 1984 से लेकर 1996 तक उन्होंने वकालत की. इसी दरम्यान उनकी मुलाकात पुष्पा भट्ट से हुई जो खुद भी वकालत करती थीं. शादी तो अरेंज मैरेज जैसी हुई लेकिन, शादी से पहले एक दूसरे को अच्छे से जानते थे.

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1996 में अजय भट्ट पूरी तरह राजनीति में आ गए. 1996 में अविभाजित यूपी में वह पहली बार रानीखेत से भाजपा के टिकट पर विधायक चुने गए. राज्य गठन  के बाद 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में और फिर 2012 में भी वह विधायक बने. 2017 में अजय भट्ट विधानसभा का चुनाव रानीखेत से हार गए. उस समय तमाम विरोध के बावजूद पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने अजय भट्ट पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष दोनों बनाए रखा था. माना जाता है कि अगर वह यह चुनाव जीत जाते तो उनका मुख्यमंत्री बनना तय था. लेकिन चुनाव हारने के बाद सब बदल गया.

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अजय भट्ट (फ़ाइल फ़ोटो)


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लेकिन अजय भट्ट के साथ यह पहली विडंबना नहीं थी. इस बाद नैनीताल संसदीय सीट से भाजपा  उम्मीदवार अजय भट्ट का चुनाव रिकॉर्ड बताता है कि उनकी जीत-हार से सरकार के बन पाने या न बन पाने का विरोधाभासी रिश्ता है. अजय भट्ट के साथ यह दुर्भाग्य जुड़ा है कि जब वह चुनाव जीतते हैं तो सरकार भाजपा की नहीं बनती लेकिन जब वे अपनी सीट हार जाते हैं तो भाजपा की सरकार शर्तिया तौर पर बन जाती है. एक-एक करके इसके उदाहरण देखते हैं.

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2017: अजय भट्ट अल्मोड़ा की रानीखेत सीट से विधानसभा का चुनाव हारे लेकिन राज्य में भाजपा की सरकार बनी. वह जीतते तो शायद मंत्री बनते, चुनाव से पहले सीएम की रेस में भी उनका नाम था. हैरत तो यह जानकर होती है कि रानीखेत से इस बार अजय भट्ट सबसे बड़े अंतर से हारे और राज्य में सबसे ज्यादा विधायकों के साथ भाजपा की सरकार बनी.

2012: अजय भट्ट रानीखेत से चुनाव जीते लेकिन भाजपा प्रदेश में एक सीट के अंतर के चलते सरकार नहीं बना सकी. भाजपा को 31 जबकि कांग्रेस को 32 सीटें मिलीं. कांग्रेस ने सरकार बनाई और अजय भट्ट नेता प्रतिपक्ष बने.

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2007: इस चुनाव में भी ऐसा ही इत्तेफाक हुआ. अजय भट्ट मात्र 205 वोटों से कांग्रेस के करण माहरा से चुनाव हार गए और भाजपा 34 सीटों के साथ बहुमत में आ गई. सत्तारूढ़ पार्टी का विधायक होने का गौरव फिर से अजय भट्ट को नहीं मिल पाया.

2002: अलग उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद विधानसभा का यह पहला चुनाव था. बड़ी शान के साथ अजय भट्ट ने रानीखेत की सीट जीती. पहली विधानसभा में वे पहुंच तो गए लेकिन राज्य में भाजपा की सरकार नहीं बनी. अंतरिम सरकार भाजपा की ही थी लेकिन चुनावों में उसे कांग्रेस से हार मिली. भट्ट फिर से विरोधी दल के विधायक बने.



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1996: यह अजय भट्ट का पहला विधानसभा चुनाव था. रानीखेत से उन्होंने बड़ी जीत दर्ज की. दुर्भाग्य देखिए कि अविभाजित यूपी की विधानसभा में किसी को भी बहुमत नहीं मिला. आखिरकार राष्ट्रपति शासन लग गया. अजय भट्ट याद करते हैं कि 6 माह तक विधायकों का शपथग्रहण नहीं हो पाया था. भाजपा और बसपा ने मिलकर सरकार बनाई लेकिन पूरे पांच साल मुख्यमंत्री और सरकारें बदलती रहीं. 1996 की विधानसभा अजय भट्ट के राजनीतिक कैरियर में एकलौती ऐसी है जब वह खुद को सत्तारूढ़ दल के विधायक कह पाए.

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अजय भट्ट के साथ ये इत्तेफाक और भी पुराना है. बहुत कम लोग जानते हैं कि अजय भट्ट ने पहला चुनाव 1989 में द्वाराहाट सीट से नगर पालिका अध्यक्ष का लड़ा था. उस समय भी किस्मत ने उन्हें दगा दे दिया था. अध्यक्ष पद पर अजय भट्ट और प्यारे लाल शाह के बीच मैच टाई हो गया. लॉटरी से फैसला हुआ जिसमें अजय भट्ट हार गए.

इनके इसी इतिहास को देखते हुए पूरे उत्तराखण्ड में यह बात लोगों के बीच चल रही है कि क्या इस बार अजय भट्ट के साथ जुड़ा यह दुर्भाग्य खत्म हो पाएगा? कुछ लोगों का यह भी कहना है कि ज़रूरी नहीं कि जो विधानसभा के चुनाव में हुआ हो वैसा ही लोकसभा के चुनाव में भी हो.

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खुद अजय भट्ट ने कहा, “यह महज़ इत्तेफाक हो सकता है. कुछ लोगों ने ये बातें प्रदेश में उड़ाई हैं.”

उन्होंने दावा किया कि वह न सिर्फ नैनीताल से जीतेंगे बल्कि केन्द्र में भी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनेगी. ऐसे में 23 मई का दिन न सिर्फ भाजपा के लिए ही नहीं अजय भट्ट के लिए भी बेहद अहम होगा. देखना होगा कि वे सत्तारूढ़ दल के सांसद कहे जाएंगे या फिर नहीं.

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First published: May 9, 2019, 7:11 PM IST
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