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हमलावर रही बीजेपी, बचाव की मुद्रा में कांग्रेस.... फिर भी 3 सीटों पर कांटे की टक्कर

हमलावर रही बीजेपी, बचाव की मुद्रा में कांग्रेस.... फिर भी 3 सीटों पर कांटे की टक्कर

बीजेपी के लिए खुद प्रधानंत्री नरेंद्र मोदी ने दो बार जनसभा की.

बीजेपी के लिए खुद प्रधानंत्री नरेंद्र मोदी ने दो बार जनसभा की.

2014 के चुनाव में हवा का रुख साफ़ पता चल रहा था कि पांचों सीटों से कांग्रेसी विकेट उखड़ जाएगी और हुआ भी ऐसा ही लेकिन, इस बार भाजपा के लिए राह आसान नहीं है.

    उत्तराखण्ड की पांच सीटों पर नतीजों के लिए लगभग डेढ़ महीने इंतज़ार करना होगा. तब तक इसकी समीक्षा चलती रहेगी कि किस पार्टी ने कैसा चुनाव लड़ा और कौन सी सीट किसकी झोली में जा सकती है. न्यूज़ 18 भी कांग्रेस और भाजपा के चुनाव लड़ने की शैली और नतीजों की समीक्षा कर रहा है. यह उन संवाददाताओं के फीडबैक पर आधारित है जिन्होंने सुबह से शाम तक चुनावी अभियान को देखा है. समीक्षा से नतीजा ये निकला है कि भले ही भाजपा की प्रचार शैली बेहद आक्रामक और नई है फिर भी उसका 2014 का प्रदर्शन दोहरा पाने में कांग्रेस बाधाएं खड़ी कर रही है.

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    चुनाव प्रचार की सरगर्मी से बहुत हद तक इस बात का पता चल जाता है कि हवा किस ओर बह रही है. इस बार हवा का अंदाज़ा लगाना तो मुश्किल रहा है लेकिन, भाजपा की आक्रामक चुनावी शैली ने पत्रकारों से लेकर बुध्दीजीवियों और जनता को भी चौंका दिया है. इस चुनाव वोटरों को कनेक्ट करने के लिए भाजपा ने वो काम किए जो अब से पहले किसी राजनीतिक दल ने नहीं किए थे. हथियार बना सोशल मीडिया और फोन. इसके अलावा बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं को जोड़कर भाजपा ने गांव गांव में अपने सैनिक खड़े कर दिए.

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    उत्तराखंड में भाजपा को कवर करने वाले न्यूज़ 18 के देहरादून संवाददाता किशोर रावत बताते हैं कि पार्टी ने अलग-अलग एज-ग्रुप के वोटरों को जोड़ने के लिए इतने कार्यक्रम चलाए जितना किसी पार्टी ने नहीं किए. मसलन प्रबुद्ध सम्मेलन, युवाओं से कॉलेजों में संवाद, मेरा परिवार-भाजपा परिवार, रैलियां, स्कूटर रैली इसका हिस्सा रहे. इसके अतिरिक्त अलग-अलग क्षेत्रों की जनता से सोशल मीडिया पर भी विशेष संपर्क रखा गया.

    modi, doon rally 2
    देहरादून में बीजेपी रैली


    भाजपा की दिल्ली में बैठी टीम सब-कुछ नियंत्रित कर रही थी. हर बूथ पर भाजपा ने 3 बाइक सवारों और पांच स्मार्ट फ़ोन वाले कार्यकर्ताओं की टीम बनाई थी. स्मार्ट फ़ोन वाले कार्यकर्ताओं को सीधे दिल्ली मुख्यालय से निर्देश मिलते रहे और उनसे फीडबैक भी लिया जाता रहा.

    भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख अनिल बलूनी ने बताया कि इसके पीछे नेतृत्व की बड़ी मेहनत लगी है. इसके अलावा नरेन्द्र मोदी के ऊपर लोगों का भरोसा भी भाजपा से जुड़ने में सहयोग करता है. उन्होंने लोगों को जोड़ने के लिए दो साल पहले शुरु किए गए मिस्ड कॉल की प्रक्रिया को भी बहुत सहयोगी माना. हालांकि उन्होंने ये नहीं बताया कि दिल्ली में कितने प्रोफेशनल्स इस काम में लगे हैं.

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    राज्य के अलग अलग इलाकों में होने वाली रैलियों को भी बहुत तरीके से प्लान किया गया था. किस नेता की कब रैली होने वाली है यह मीडिया को कई दिन पहले ही बता दिया जाता था. गढ़वाल से लेकर कुमाऊं तक भाजपा ने सुनियोजित तरीके से चुनाव लड़ा है.

    rahul gandhi, manish khanduri dehradun
    राहुल गांधी के अलावा सचिन पायलट और शर्मिष्ठा मुखर्जी ही राज्य में रैली करने वाले कांग्रेस के स्टार प्रचारक रहे.


    दूसरी तरफ कांग्रेस खड़ी है. शायद सबसे पुरानी पार्टी होने के कारण ही कांग्रेस अपने आप को बदले परिवेश में नहीं ढाल पा रही है. ऊपर से नेताओं की कमी अलग से कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ाती दिखी. प्रदेश के दो अहम नेता हरीश रावत और प्रीतम सिंह खुद चुनाव मैदान में होने से दूसरी सीटों पर कोई सरगर्मी पैदा नहीं कर पाए. और तो और नेताओं के बीच की आपसी खाई भी इतने अहम चुनाव में पाटी नहीं जा सकी.

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    कुमाऊं में तैनात न्यूज़ 18 के संवाददाता शैलेन्द्र नेगी ने बताया कि कुमाऊं में कांग्रेस के नेता तो भरपूर हैं लेकिन, हरीश रावत के नैनीताल से लड़ने के कारण मामला खराब सा होता गया. अंदरखाने खफा रहने वाली इन्दिरा हृदयेश ने हलद्वानी में कोई बड़ी सभा नहीं की. हालांकि हरीश रावत खेमे के अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ के कांग्रेसी नेताओं ने उनका साथ दिया लेकिन, इससे अल्मोड़ा में प्रदीप टम्टा की लड़ाई कमज़ोर पड़ती दिखी.

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     हैरत की बात तो यह है कि प्रदेश के बाहर के दूसरे बड़े नेताओं की रैलियां भी कांग्रेस नहीं करा पाई. कांग्रेस को कवर करने वाले न्यूज़ 18 संवाददाता दीपांकर भट्ट ने बताया कि राज्य के ज़िम्मेदार नेता हरीश रावत और प्रीतम सिंह खुद के चुनाव में व्यस्त हो गए. ऐसे में चुनाव संचालन की पूरी जिम्मेदारी प्रभारी अनुग्रह नारायण और सह प्रभारी राजेश धर्माणी पर थी लेकिन, दोनों ही नेता राज्य के निवासी नहीं है. ऐसे में न तो वे खुद ज्यादा सक्रिय रह पाए और न ही बड़े नेताओं को बुलाकर कांग्रेस के प्रचार को धार दे पाए.

    pritam singh campaign
    चकराता में प्रचार करते प्रीतम सिंह


    दीपांकर बताते हैं कि कांग्रेस ने चुनाव की पूरी लड़ाई छोटी-छोटी बैठकों के सहारे लड़ी. प्रीतम सिंह ने तो एक दिन 44 बैठकें कीं. ऐसा ही दूसरे उम्मीद्वारों ने भी किया. भाजपा की तरफ से नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, पीयूष गोयल, शाहनवाज हुसैन, मनोज तिवारी, योगी आदित्यनाथ ने उत्तराखण्ड में प्रचार किया लेकिन कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी के अलावा सचिन पायलट और शर्मिष्ठा मुखर्जी ही रैली करने आ पाए.

    हरीश रावत ने भाजपा के इस नए अवतार को रेजिमेण्टल पार्टी का नाम दिया है. उन्होंने माना कि भाजपा का संगठनात्मक ढांचा कांग्रेस की तुलना में बेहतर है. रावत ने कहा कि भाजपा एक ऑर्गनाइज्ड़ पार्टी है. इसीलिए उनका ढांचा हमेशा बेहतर रहता है. हालांकि बचाव करते हुए रावत ने कहा कि कांग्रेस एक विचारधारा है जहां एक मुद्दे को लेकर सभी जमा होते हैं और फिर अपने आप अलग-अलग हो जाते हैं.

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    लेकिन, चौंकाने वाली बात तो ये है कि तमाम बेहतर रणनीतिक कौशल से लैस होने के बावजूद कांग्रेस गेम से बाहर नहीं है. 2014 के चुनाव में हवा का रुख साफ़ पता चल रहा था कि पांचों सीटों से कांग्रेसी विकेट उखड़ जाएगी और हुआ भी ऐसा ही लेकिन, इस बार भाजपा के लिए राह आसान नहीं है. राज्य की पांच सीटों में से तीन सीटों पर उसे कांग्रेस से जबरदस्त चुनौती मिल रही है. ये सीटें हैं टिहरी, नैनीताल और अल्मोड़ा.

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    हरीश रावत, अनुग्रह नारायण सिंह और इंदिरा हृदयेश हल्द्रानी में एक कार्यक्रम में.


    टिहरी सीट पर कांग्रेस के प्रीतम सिंह ने भाजपा की राज्यलक्ष्मी शाह को अच्छी टक्कर दी है. जौनसार भाबरर और उत्तरकाशी की कई विधानसभाओं से प्रीतम सिंह को भरपूर सपोर्ट मिलने की खबरें आई हैं. नैनीताल सीट पर भी पेंच फंसा है. हरीश रावत जैसे धुरंधर खिलाड़ी से पार पाना आसान नहीं है वह भी तब रावत तीन बार बगल की ही अल्मोड़ा सीट से सांसद रह चुके हैं.

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    एक और बात, कांग्रेस के मौजूदा सभी बड़े नेता कुमाऊं से ही आते हैं. ऐसे में उनका प्रभाव न सिर्फ नैनीताल सीट पर बल्कि अल्मोड़ा सीट पर भी देखने को मिल रहा है. यहां से कांग्रेस के प्रदीप टम्टा और भाजपा के अजय टम्टा आमने सामने हैं. बता दें कि 2014 के मोदी लहर में अल्मोड़ा ऐसी एकलौती सीट थी जहां भाजपा के जीत का अंतर एक लाख से कम था. ऐसे में अजय टम्टा के लिए ये सीट जीतना आसान नहीं है.

    ज़ाहिर है चुनावी तैयारी जीत के लिए बहुत ज़रूरी है लेकिन, इसके साथ साथ जनता का भरोसा और विश्वास भी उतना ही ज़रूरी है.

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