यहां जानिए बीजेपी सरकार और अजय भट्ट की जीत-हार का क्या है विरोधाभासी रिश्ता...

अजय भट्ट ने दावा किया कि वह न सिर्फ नैनीताल से जीतेंगे बल्कि केन्द्र में भी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनेगी.

News18 Uttarakhand
Updated: April 15, 2019, 6:24 PM IST
यहां जानिए बीजेपी सरकार और अजय भट्ट की जीत-हार का क्या है विरोधाभासी रिश्ता...
बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट
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Updated: April 15, 2019, 6:24 PM IST
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट से एक अजीब इत्तेफ़ाक जुड़ा है. उत्तराखंड की राजनीति में अजय भट्ट एक बड़ा नाम हैं. वह भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हैं और पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं. नैनीताल सीट से भाजपा के उम्मीदवार चुनाव अजय भट्ट का रिकॉर्ड यह बताता है कि उनकी जीत-हार से ही सरकार के बन पाने या न बन पाने का विरोधाभासी रिश्ता है.

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अजय भट्ट के साथ यह दुर्भाग्य जुड़ा है कि जब वह चुनाव जीतते हैं तो सरकार भाजपा की नहीं बनती लेकिन जब वे अपनी सीट हार जाते हैं तो भाजपा की सरकार शर्तिया तौर पर बन जाती है. एक-एक करके इसके उदाहरण देखते हैं.

2017: अजय भट्ट अल्मोड़ा की रानीखेत सीट से विधानसभा का चुनाव हारे लेकिन राज्य में भाजपा की सरकार बनी. वह जीतते तो शायद मंत्री बनते, चुनाव से पहले सीएम की रेस में भी उनका नाम था. हैरत तो यह जानकर होती है कि रानीखेत से इस बार अजय भट्ट सबसे बड़े अंतर से हारे और राज्य में सबसे ज्यादा विधायकों के साथ भाजपा की सरकार बनी.

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2012: अजय भट्ट रानीखेत से चुनाव जीते लेकिन भाजपा प्रदेश में एक सीट के अंतर के चलते सरकार नहीं बना सकी. भाजपा को 31 जबकि कांग्रेस को 32 सीटें मिलीं. कांग्रेस ने सरकार बनाई और अजय भट्ट नेता प्रतिपक्ष बने.
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2007: इस चुनाव में भी ऐसा ही इत्तेफाक हुआ. अजय भट्ट मात्र 205 वोटों से कांग्रेस के करण माहरा से चुनाव हार गए और भाजपा 34 सीटों के साथ बहुमत में आ गई. सत्तारूढ़ पार्टी का विधायक होने का गौरव फिर से अजय भट्ट को नहीं मिल पाया.

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2002: अलग उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद विधानसभा का यह पहला चुनाव था. बड़ी शान के साथ अजय भट्ट ने रानीखेत की सीट जीती. पहली विधानसभा में वे पहुंच तो गए लेकिन राज्य में भाजपा की सरकार नहीं बनी. अंतरिम सरकार भाजपा की ही थी लेकिन चुनावों में उसे कांग्रेस से हार मिली. भट्ट फिर से विरोधी दल के विधायक बने.

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1996: यह अजय भट्ट का पहला विधानसभा चुनाव था. रानीखेत से उन्होंने बड़ी जीत दर्ज की. दुर्भाग्य देखिए कि अविभाजित यूपी की विधानसभा में किसी को भी बहुमत नहीं मिला. आखिरकार राष्ट्रपति शासन लग गया. अजय भट्ट याद करते हैं कि 6 माह तक विधायकों का शपथग्रहण नहीं हो पाया था. भाजपा और बसपा ने मिलकर सरकार बनाई लेकिन पूरे पांच साल मुख्यमंत्री और सरकारें बदलती रहीं. 1996 की विधानसभा अजय भट्ट के राजनीतिक कैरियर में एकलौती ऐसी है जब वह खुद को सत्तारूढ़ दल के विधायक कह पाए.

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अजय भट्ट के साथ ये इत्तेफाक और भी पुराना है. बहुत कम लोग जानते हैं कि अजय भट्ट ने पहला चुनाव 1989 में द्वाराहाट सीट से नगर पालिका अध्यक्ष का लड़ा था. उस समय भी किस्मत ने उन्हें दगा दे दिया था. अध्यक्ष पद पर अजय भट्ट और प्यारे लाल शाह के बीच मैच टाई हो गया. लॉटरी से फैसला हुआ जिसमें अजय भट्ट हार गए.

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इनके इसी इतिहास को देखते हुए पूरे उत्तराखण्ड में यह बात लोगों के बीच चल रही है कि क्या इस बार अजय भट्ट के साथ जुड़ा यह दुर्भाग्य खत्म हो पाएगा? कुछ लोगों का यह भी कहना है कि ज़रूरी नहीं कि जो विधानसभा के चुनाव में हुआ हो वैसा ही लोकसभा के चुनाव में भी हो.

खुद अजय भट्ट ने कहा, “यह महज़ इत्तेफाक हो सकता है. कुछ लोगों ने ये बातें प्रदेश में उड़ाई हैं.”

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उन्होंने दावा किया कि वह न सिर्फ नैनीताल से जीतेंगे बल्कि केन्द्र में भी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनेगी. ऐसे में 23 मई का दिन न सिर्फ भाजपा के लिए ही नहीं अजय भट्ट के लिए भी बेहद अहम होगा. देखना होगा कि वे सत्तारूढ़ दल के सांसद कहे जाएंगे या फिर नहीं.

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