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उत्तराखंड के ‘रीजनल एस्पिरेशन्स’ को कौन देगा आवाज़, सिर्फ़ 0.21 वोट पाने वाली UKD तो नहीं

उत्तराखंड के ‘रीजनल एस्पिरेशन्स’ को कौन देगा आवाज़, सिर्फ़ 0.21 वोट पाने वाली UKD तो नहीं

उत्तराखंड क्रांति दल का देहरादून ऑफ़िस पार्टी की हालत बताने के लिए काफ़ी है.

उत्तराखंड क्रांति दल का देहरादून ऑफ़िस पार्टी की हालत बताने के लिए काफ़ी है.

1979 में यूकेडी की स्थापना के चंद महीने बाद ही 1980 में विधानसभा चुनाव हो गए थे, जिसमें यूकेडी के जसवंत सिंह बिष्ट रानीखेत से विधायक बनने में कामयाब रहे थे.

देश भर में ऐतिहासिक जीत हासिल करने के बाद एनडीए के सांसदों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नया नारा दिया है और यह है – National Ambition, Regional Aspiration. प्रधानमंत्री ने कहा कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं को पूरा करके ही से ही राष्‍ट्रीय महत्वाकांक्षा पूरी होगी. लेकिन उत्तराखंड की क्षेत्रीय आकांक्षाओं की प्रतीक राज्य के एकमात्र क्षेत्रीय दल के रूप में पहचाना जाता रहा उत्तराखंड क्रांति दल अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. ऐसे में सवाल यह है कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं को आवाज़ कौन देगा?

क्षेत्रीय आकांक्षाओं की पार्टी

उत्तराखंड क्रांति दल राज्य के संघर्ष से उपजा था. अलग राज्य के संघर्ष के दौरान, राज्य की ज़रूरतों, आकांक्षाओं के लिए संघर्ष का नेतृत्व उत्तराखंड क्रांति दल ने किया था. 1979 में यूकेडी की स्थापना के चंद महीने बाद ही 1980 में विधानसभा-लोकसभा के चुनाव हो गए थे और उसमें यूकेडी के जसवंत सिंह बिष्ट रानीखेत से विधायक बनने में कामयाब रहे थे. ज़ाहिर है वह उत्तराखंड राज्य के नाम पर चुनाव जीते थे.

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इसके बाद 1985 में हुए चुनाव में काशी सिंह ऐरी यूकेडी के विधायक बने. लेखक और पत्रकार चारु तिवारी बताते हैं कि 1989 के विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड में पड़ने वाली उत्तर प्रदेश की 19 सीटों में से 11 में यूकेडी ने तगड़ी टक्कर दी थी. इनमें से डीडीहाट और रानीखेत सीट जीतने में वह कामयाब भी रहे थे. लोकसभा चुनाव में टिहरी से इंद्रमणि बडोनी मात्र 7000 वोट से हारे थे और अल्मोड़ा से काशी सिंह ऐरी मात्र 11000 वोट के अंतर से हारे थे. लेकिन यूकेडी इस जनसमर्थन को संभाल नहीं पाई. आज की तारीख में स्थिति यह पहुंच गई है कि इस बार के लोकसभा चुनाव पार्टी जिन चार सीटों पर लड़ी उनमें कुल 0.21 फ़ीसदी वोट इसे मिल पाए और कोई भी प्रत्याशी ज़मानत तक नहीं बचा पाया.

आखिर ऐसा क्यों हुआ 

ukd dharchula agitation
उत्तराखंड राज्य के संघर्ष को धार देे के लिए हुआ था उत्तराखंड क्रांति दल का जन्म.


 

तिवारी कहते हैं कि दरअसल यूकेडी से सबसे बड़ी ग़लती 1996 के चुनाव में हुई. पार्टी ने ‘राज्य नहीं तो चुनाव नहीं’ का नारा देकर चुनाव का बहिष्कार कर दिया. इसका फ़ायदा बीजेपी ने उठाया और वह 19 में से 17 सीटें जीत गई. 2000 में राज्य बना तो तमाम जनसंघर्षों, तमाम कुर्बानियों (उत्तराखंड आंदोलन में 42 लोगों की जान गई थी) को दरकिनार कर भाजपा यह बताने में कामयाब हो गई कि उत्तरांचल (बीजेपी ने राज्य का नाम उत्तराखंड से बदलकर उत्तरांचल कर दिया था) को वाजपेयी जी ने बनाया है.

 

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वरिष्ठ पत्रकार दिनेश जुयाल भी कहते हैं उत्तराखंड अलग राज्य के लिए संघर्ष के लिए जब उत्तराखंड क्रांति दल नाम का एक संगठन अस्तित्व में आया उसमें पहाड़ के बहुत प्रबुद्ध लोग शामिल हुए थे और उनके साथ छात्र भी जुड़े थे. डॉक्टर डीडी पंत जैसे वैज्ञानिक, यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर रहे व्यक्ति इसमें आए. शेखर पाठक, राजीव लोचन शाह जैसे लोग यूकेडी से जुड़े.

जुयाल कहते हैं लेकिन इसके साथ ही पार्टी से जो युवा छात्र नेता जुड़े उनके सामने असम गण परिषद के प्रफुल्ल महंत का उदाहरण था और वह शुरुआत से ही मुख्यमंत्री बनने के सपने देखने लगे थे. इसकी वजह से आंदोलन की धार तो शुरू में ही कुंद हो गई थी लेकिन क्षेत्रीय आकांक्षाओं की वजह से लोगों ने पार्टी को वोट दिया. फिर पार्टी के नेता क्षेत्र नहीं अपनी आकांक्षाओं के लिए काम करने लगे तो लोगों का पूरी तरह मोहभंग हो गया.

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यूकेडी को अभी चुनाव राजनीति से दूर रहना चाहिए?

दिनेश जुयाल कहते हैं कि यह सन्यांस क्या लेंगे, ये लोग तो मूर्छा में हैं. जो चुनाव लड़े भी हैं वह तो पार्टी के दूसरी-तीसरी पंक्ति के नेता भी नहीं हैं. यूकेडी के पास न लीडरशिप रह गई है और न ही कैडर है. अब यूकेडी जैसे क्षेत्रीय दल कैडर बनाएंगे भी कैसे. उत्तराखंड की 1.1 करोड़ की आबादी में से पहाड़ी क्षेत्रों में सिर्फ़ 35 लाख लोग रह गए हैं.

ukd meeting
उत्तराखंड क्रांति दल को इन चुनावों में ढंग के उम्मीदवार तक नहीं मिल पाए थे.


चारु तिवारी कहते हैं कि यूकेडी को तो 2007 में ही चुनावी राजनीति से दूर हो जाना चाहिए था क्योंकि उसके बाद से यूकेडी नेताओं ने दलबदलू राजनीति शुरु कर दी थी. जिस रास्ते पर आपको जाना था वह आपने छोड़ दिया था. कोई भी राजनीतिक दल जब तक संगठनात्मक रूप से मजबूत नहीं है और हर चीज़ को राजनीति के चश्मे से नहीं देखते तब तक वह सफल नहीं हो सकती.

यूकेडी के लिए पुनर्जीवन का कोई मौका नहीं बचा है?

दिनेश जुयाल साफ़ शब्दों में कहते हैं कि यूकेडी क्या उत्तराखंड में किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए कोई संभावना नहीं है. इसकी एक बड़ी वजह तो यह भी है कि यह आपसी टांग-खिंचाई में इतने लगे हुए हैं कि दस आदमी भी एक साथ खड़े नहीं रह सकते.

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चारु तिवारी गैरसैंण राजधानी संघर्ष समिति के संयोजक भी हैं. वह कहते हैं कि यूकेडी से जुड़े लोगों ने उत्तराखंड में किसी नए विकल्प के रास्ते भी बंद कर दिए हैं क्योंकि कोई और अब ऐसा करना चाहेगा तो लोग उस पर विश्वास नहीं करेंगे. लेकिन इसके बावजूद चारु तिवारी ज़ोर देकर कहते हैं कि उत्तराखंड में क्षेत्रीय ताकत के उभरने की सभी संभावनाएं मौजूद हैं क्योंकि आज भी वह सारे सवाल खड़े हैं जो राज्य बनने के पहले थे, उनमें कोई तब्दीली नहीं है. आज पहाड़ के सामने समस्याएं पहले से भी बड़ी हैं.

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Tags: Dehradun news, Lok Sabha Election Result 2019, Uttarakhand Lok Sabha Elections 2019, Uttarakhand news

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