...तो फिर मरते या मारते ही रहेंगे हाथी

साल 2017 की हाथी गणना के अनुसार देश के 23 राज्यों में करीब 27 हजार हाथी मौजूद हैं जो 2012 में हुई गणना से तीन हज़ार कम थे.

Sunil Navprabhat | News18 Uttarakhand
Updated: November 26, 2018, 7:36 PM IST
...तो फिर मरते या मारते ही रहेंगे हाथी
रामनगर के पास मोहान में टस्कर हाथी ने राष्ट्रीय राजमार्ग 121 में इस हाथी ने एक ऑल्टो कार को पलटा दिया. (फ़ाइल फ़ोटो)
Sunil Navprabhat
Sunil Navprabhat | News18 Uttarakhand
Updated: November 26, 2018, 7:36 PM IST
हरिद्वार में हाथियों का आतंक तो कहीं हाथियों के रेलवे ट्रेक पर मौत की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बढ़ते शहरीकरण के बीच आखिर धरती का यह विशालकाय जानवर जाए तो जाए कहां. आबादी क्षेत्र में घुसकर या तो वह खुद मारा जाएगा या फिर किसी को मार डालेगा. इसीलिए हाथियों के लिए सुरक्षित गलियारा यानि कि एलिफेंट कॉरिडोर बनाए जाने की बात एक बार फिर होने लगी है.

इस पर और बात करने से पहले जानते हैं कि एलिफेंट कॉरिडोर कहते किसे हैं. एलिफेंट कॉरिडोर यानि एक ऐसा गलियारा या रास्ता जहां बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के हाथी एक जगह से दूसरी जगह स्वच्छंद रूप से विचरण कर सकें. बढ़ता शहरीकरण, फैलता सड़कों का जाल और सिकुड़ते जंगलों के कारण वर्तमान में सबसे बड़ा संकट वन्य जीवों के स्वच्छंद विचरण पर आ खड़ा हुआ है, इसीलिए ऐलिफ़ेंट कॉरिडोर बनाने की योजना सामने आई थी.

1100 हाथियों की संख्या वाले कार्बेट नेशनल पार्क और 360 हाथियों वाले राजाजी टाइगर रिजर्व जैसे संरक्षित क्षेत्रों वाले उत्तराखंड में ऐसे 11 हाथी कॉरिडोर चिन्हित किए गए थे. ये हैं:


  • राजाजी टाइगर रिज़र्व में कांसरो-बड़कोट, चीला-मोतीचूर, मोतीचूर-गोहरी तीन कॉरिडोर प्रस्तावित हैं.

  • लैंसडौन और बिजनौर वन प्रभाग के बीच रवासन-सोना नदी हॉथी कॉरिडोर.

  • दक्षिण पतली दून-चिलकिया कॉरिडोर, जो कार्बेट टाइगर रिजर्व और रामनगर वन प्रभाग के बीच पड़ता है.

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  • चिलकिया-कोटा और कोट-मैलामी कॉरिडोर, जो रामनगर वन प्रभाग का हिस्सा हैं.

  • फतेहपुर-गदगरिया, गौला रौखड़-गौराई टांडा, किलपुरा-खटीमा-सुरई हाथी कॉरिडोर. ये रामनगर वन प्रभाग और तराई सेंट्रल, तराई ईस्ट वन प्रभाग में प्रस्तावित हैं.

  • लेकिन सालों बाद भी बात चिह्नीकरण से आगे नहीं बढ़ पाई. नतीजा हरिद्वार में हाथी के भेलकर्मी को मार देने जैसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं. हालत ये है कि सबसे संवेदनशील चीला-मोतीचूर कॉरिडोर सालों बाद भी अधूरा पड़ा. यहां हाइवे के साथ-साथ रेलवे क्रांसिग भी है.

  • इस कॉरिडोर के लिए करीब तीन साल पूर्व खांड गांव को भी विस्थापित कर दिया गया, लेकिन मोतीचूर में देहरादून-हरिद्वार हाईवे पर 750 मीटर लंबे प्लाईओवर का निर्माण कार्य सालों से लंबित पड़ा होने के कारण कॉरिडोर अस्तित्व में नहीं आ पाया.


इस लेटलतीफ़ी की वजह से सड़क या रेलवे ट्रैक पार करने के प्रयास में जंगली जानवर बेमौत मारे जा रहे हैं. एक नज़र ऐसे मामलों पर...

  • कॉरिडोर न बन पाने के कारण मोतीचूर, रामगढ़, श्यामपुर, कांसरो रेंज में 1996 से 2011 के बीच पांच गुलदार ट्रेन से कटकर मारे गए, तो नौ गुलदार कार एक्सीडेंट का शिकार हो गए.

  • इसी तरह राजाजी की मोतीचूर, कांसरों और हरिद्वार रेंज में 1987 से अभी तक 27 हाथी केवल ट्रेन की चपेट में आकर जान गंवा चुके हैं.


यह परेशानी सिर्फ उत्तराखंड की ही नहीं है. साल 2017 की हाथी गणना के अनुसार देश के 23 राज्यों में करीब 27 हजार हाथी मौजूद हैं जो 2012 में हुई गणना से तीन हज़ार कम थे. इसीलिए कॉरिडोर के एक मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूरी संजीदगी के साथ कहा कि हाथियों को हम नहीं कह सकते कि उन्हें कहां जाना चाहिए और कहां नहीं. इसलिए कॉरिडोर बनने ही चाहिएं.

लेकिन आंकड़े और ज़मीनी हकीकत बताती है कि सरकारों को छोटी-छोटी चीज़ों की चिंता ज़्यादा है धरती के सबसे बड़े प्राणी की कम.

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First published: November 26, 2018, 6:54 PM IST
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