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Politics of Uttarakhand : दलित नेता यशपाल आर्य की 'घर वापसी' के मायने क्या हैं? कांग्रेस को क्या फायदा होगा?

कांग्रेस में लौटे यशपाल आर्य.

कांग्रेस में लौटे यशपाल आर्य.

Uttarakhand Election 2022 : उत्तराखंड की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां एक दूसरे के नेताओं को तोड़ने की हामी दिख रही है. जानिए यशपाल आर्य कैसे कांग्रेस छोड़कर चले गए थे और अब क्यों कांग्रेस में लौटे?

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देहरादून. उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार में ट्रांसपोर्ट मंत्री यशपाल आर्य के कांग्रेस में लौटने के बाद ऊधमसिंह नगर की बाजपुर सीट पर पार्टी का दावा मज़बूत होता है. इस सीट पर दलित सिखों की संख्या काफी है इसलिए विधानसभा चुनाव 2022 के मद्देनज़र आर्य की कांग्रेस में वापसी काफी अहम है. खासकर तब, जबकि पंजाब में पिछले दिनों कांग्रेस ने चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर ‘दलित सीएम’ का दांव खेला है. इसके अलावा, यह भी अपने आप में बड़ी कामयाबी है कि चार साल पहले भाजपा का दामन थाम लेने वाले आर्य करीब चार दशकों के राजनीतिक करियर में कांग्रेस से ही संबद्ध रहे थे, जो पार्टी में लौट आए हैं.

कांग्रेस आर्य की वापसी को महत्वपूर्ण मान ​रही है क्योंकि ऊधमसिंह नगर ज़िले में ‘राय सिखों’ के वोटर खासी संख्या में हैं, जिन्हें सिखों का दलित समुदाय कहा जाता है. पूरे उत्तराखंड में दलितों की संख्या करीब 19 फीसदी है. अपने बेटे और नैनीताल सीट से विधायक संजीव आर्य के साथ कांग्रेस में आने वाले आर्य ने साफ तौर पर कहा, ‘कांग्रेस एक पवित्र मंदिर की तरह है और यहां होना सुखद है.’

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कांग्रेस में लौटने पर यशपाल आर्य का स्वागत राहुल गांधी ने किया.

कैसे बदले हैं समीकरण?
बात चार साल पहले की है, जब 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले का वक्त था, तब सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के खिलाफ एक लहर सी दौड़ी. आर्य समेत कई कांग्रेसी नेताओं ने पार्टी छोड़ दी, जिसका आखिरकार फायदा भाजपा को ही हुआ. भाजपा में 82 फीसदी यानी 57 सीटों पर प्रचंड बहुमत वाली जीत हासिल की. लेकिन, इसके बाद समस्याएं खत्म होने के बजाय नए सिरों से पैदा होने लगीं.

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आर्य, हरक सिंह रावत, सतपाल महाराज, उमेश शर्मा जैसे नेताओं की जो हैसियत कांग्रेस में थी, बताते हैं कि उसके हिसाब से भाजपा में उन्हें ‘उपेक्षा’ मिली. नई पार्टी में जगह बनाने के लिए कुछ नेताओं को कड़ा संघर्ष करना पड़ा. भीतरी जानकार बताते हैं कि कांग्रेस में ‘फ्री स्टाइल राजनीति’ का चलन भाजपा में चला नहीं इसलिए इनके लिए मुश्किल हुई. असंतोष बढ़ा, तो सीएम धामी ने 25 सितंबर को आर्य के साथ नाश्ता भी किया था, लेकिन नतीजा यही निकला कि आर्य का मन बदलने में धामी नाकाम रहे.

और क्या है दलित फैक्टर?
पंजाब में पहली बार किसी दलित नेता के रूप में चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाने के बाद कांग्रेस ने इस इबारत को एजेंडा के तौर पर इस्तेमाल किया. पंजाब में कांग्रेस के प्रभारी और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने साफ कहा कि वह ‘उत्तराखंड में भी किसी दलित नेता को सीएम देखना’ चाहते हैं. माना जा सकता है कि सियासी शतरंज की बिसात पर बीजेपी को शह और मात देने के लिए कांग्रेस ने यह चाल चली.

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