सूख गए हैं आधे से ज़्यादा जलस्रोत... पर्यावरण के प्रति लापरवाही पड़ने लगी है इंसान पर भारी
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सूख गए हैं आधे से ज़्यादा जलस्रोत... पर्यावरण के प्रति लापरवाही पड़ने लगी है इंसान पर भारी
जलवायु परिवर्तन और कटते पेड़ पौधों ने ग्रामीण क्षेत्रों के पारंपरिक जल स्रोतों पर असर डालना शुरू कर दिया है. आधे से ज्यादा जल स्रोत सूख गए हैं.

पहाड़ों पर चीड़ वनों के प्रसार पर रोक लगा कर पारम्परिक बांज, बुरांस वनों को बढ़ाना होगा तभी पानी का चक्र सही ढंग से चल पाएगा.

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ऋषिकेश. कहते हैं कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा. पानी की कमी सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही इसका असर पहाड़ी प्रदेश में पारम्परिक जल स्रोतों पर साफ़ देखा जा सकता, जो सूखने लगे हैं. जलवायु परिवर्तन और कटते पेड़ पौधों ने ग्रामीण क्षेत्रों के पारंपरिक जल स्रोतों पर असर डालना शुरू कर दिया है. आधे से ज्यादा जल स्रोत सूख गए हैं और कुछ कम मात्रा में पानी दे रहे हैं जिससे पेयजल की किल्लत बढ़ती जा रही है. यह तब है कि जब एक बड़ी आबादी के लिए इन्हीं पेयजल स्रोतों से पानी की सप्लाई की जाती है.

पानी के लिए जद्दोजहद 

देखरेख और पर्यावरण से छेड़छाड़ इंसान की सबसे बड़ी ज़रूरतों में से एक, पानी, पर असर डाल रही है. जल संरक्षणके लिए ज़िम्मेदार ग्राम पंचायतें, जल संस्थान और कई एनजीओ पारंपरिक तरीकों को भूलकर सिर्फ कागजों पर काम कर रहे हैं. इसका नतीजा मई और जून के महीने में पहाड़ों पर पानी के लिए आम आदमी की जद्दोजहद के रूप में सामने आने लगा है.



पर्यावरणविद डॉक्टर गोविन्द सिंह रजवार कहते हैं कि उत्तराखंड में लगातार भूजल स्तर नीचे जाता जा रहा है जो भविष्य के लिए खतरा बढ़ा रहा है. अनियोजित विकास और प्रकृति का दोहन इस आग में घी डालने का काम कर रहा है. साथ ही हिमालयी क्षेत्र में लगातार चीड़ वनों का प्रसार यहां के ज स्तर को सबसे ज्यादा नुक़सान पहुंचा रहा है.



चीड़ पर रोक लगानी होगी 

पर्यावरणविद प्रोफेसर आरडी गौड मानते हैं कि पहाड़ों पर चीड़ वनों के प्रसार पर रोक लगा कर पारम्परिक बांज और बुरांस वनों को बढ़ावा देना होगा तभी पानी का चक्र सही ढंग से चल पाएगा.

उत्तराखंड के ज्यादातर हिस्सों में पेयजल के लिए पारंपरिक जल स्रोत चाल-खाल पर गढ़वाल जल संस्थान की पेयजल योजनाएं चल रही हैं. जलसंस्थान इस समस्या से निपटने के लिए योजना में जुट गया है. उत्तराखंड जल संस्थान के अधिकारी नमित रमोला का कहना है कि हमने अपने पारम्परिक जल स्रोतों को बचाने के लिए चाल-खाल निर्माण, बांज-बुरांस जैसे पौधों का प्लांटेशन और वर्षा जल सरंक्षण की योजनाएं बनाकर उन पर अमल करना शुरु कर दिया है.

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First published: June 5, 2020, 12:45 PM IST
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