नए अध्यक्ष पर पस्त कांग्रेस को फिर से खड़ा करने की चुनौती
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नए अध्यक्ष पर पस्त कांग्रेस को फिर से खड़ा करने की चुनौती
कांग्रेस हाईकमान ने उत्तराखंडी जनमानस में प्रीत जगाने के लिए प्रीतम सिंह पर दांव लगाया है. बतौर अध्यक्ष उनके सामने पहाड़ और मैदान में पार्टी को नए सिरे से खड़ा करने की बड़ी चुनौती है. पार्टी की टॉप लीडरशिप के बीजेपी में जाने से हुई शून्यता को भरना प्रीतम की अग्निपरीक्षा होगी.

कांग्रेस हाईकमान ने उत्तराखंडी जनमानस में प्रीत जगाने के लिए प्रीतम सिंह पर दांव लगाया है. बतौर अध्यक्ष उनके सामने पहाड़ और मैदान में पार्टी को नए सिरे से खड़ा करने की बड़ी चुनौती है. पार्टी की टॉप लीडरशिप के बीजेपी में जाने से हुई शून्यता को भरना प्रीतम की अग्निपरीक्षा होगी.

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कांग्रेस हाईकमान ने उत्तराखंडी जनमानस में प्रीत जगाने के लिए प्रीतम सिंह पर दांव लगाया है. बतौर अध्यक्ष उनके सामने पहाड़ और मैदान में पार्टी को नए सिरे से खड़ा करने की बड़ी चुनौती है. पार्टी की टॉप लीडरशिप के बीजेपी में जाने से हुई शून्यता को भरना प्रीतम की अग्निपरीक्षा होगी.

चकराता के विधायक प्रीतम सिंह उत्तराखंड कांग्रेस के नए खेवनहार बने हैं पार्टी हाईकमान ने किशोर उपाध्याय को हटाकर उन्हें नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. मोदी लहर में हालिया विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद प्रीतम सिंह के सिर ताज सजा है.

प्रीतम उस हालत में कांग्रेस अध्यक्ष बने हैं, जब गढवाल में कांग्रेस की टाप लीडरशिप बीजेपी में जाकर स्थापित हो गई है. पहले विजय बहुगुणा और हरक सिंह रावत कैंप ने हरीश रावत के खिलाफ बगाबत कर कांग्रेस छोड़ी और फिर ऐन विधानसभा चुनावों से पहले दलित फेस यशपाल आर्य ने भी बीजेपी का दामन थाम लिया था.



जिसका नतीजा ये रहा कि हालिया विधानसभा चुनावों में कांग्रेस घुटनों के बल लेट गई इस सूरतेहाल में सवाल ये है कि क्या प्रीतम सिंह के लिए कांग्रेस को मजबूत करना आसान होगा. लाख टके का सवाल ये भी है कि क्या वो हरीश रावत के पार्टी में सक्रिय रहते फ्रंट फुट पर बैटिंग कर पाएंगे.
वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत का कहना है कि प्रीतम पोटेंशियल लीडर हैं और उनका नाम पहले भी इस

पद और मुख्यमंत्री पद के लिए चलता रहा है. उनका कहना है कि अध्यक्ष को हरीश रावत और किशोर उपाध्याय को साथ लेकर चलना होगा.

प्रीतम अविभाजित उत्तरप्रदेश में एक बार विधायक रहे और 2 बार चुनाव हारे, लेकिन उत्तराखंड गठन के बाद वो लगातार चौथी बार विधानसभा चुनाव जीते हैं. प्रीतम सिंह ना सिर्फ एनडी तिवारी सरकार बल्कि पूर्ववर्ती विजय बहुगुणा एवं हरीश रावत सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे हैं.

अगर 1977 के चुनाव छोड दें तो उनके पिता स्वर्गीय गुलाब सिंह भी 1962 से 84 तक लगातार चकराता के विधायक रहे थे. यही वह पारिवारिक राजनैतिक विरासत है जिसके चलते देशव्यापी मोदी लहर के हल्लाबोल में पार्टी हाईकमान ने प्रीतम सिंह पर भरोसा जताया है.

प्रीतम की सबसे बड़ी ताकत ये है कि वो हमेशा विवादों से दूर रहे और बेहद सौम्य स्वभाव के हैं, लेकिन उनकी कमजोरी ये है कि कद्दावर मंत्री रहने के बावजूद उनकी गतिविधियां उनके चुनावी क्षेत्र चकराता अथवा राजधानी तक सीमित रही हैं.

लेकिन निवर्तमान अध्यक्ष किशोर उपाध्याय को भरोसा है कि प्रीतम सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस मजबूत होगी.

आपको बता दें कि उत्तराखंड गठन के वक्त साल 2000 में हरीश रावत कांग्रेस के पहले अध्यक्ष बने और 2007 तक यानि 7 साल तक पद पर रहे उनके बाद यशपाल आर्य ने भी अगले 7 साल यानि 2014 तक कांग्रेस की बागडोर संभाली फिर किशोर उपाध्याय को उत्तराखंड में कांग्रेस का नेतृत्व करने का मौका मिला.

सीधा सपाट कहें तो बतौर अध्यक्ष प्रीतम को ना सिर्फ कांग्रेस का उजड़ा चमन गुलजार करना है बल्कि पहाड़ मैदान में कार्यकर्ताओं में नया जोश भरना है. ताकि मिशन 2019 यानि लोकसभा चुनाव और आगामी नगर निकाय चुनाव में कांग्रेस खोई जमीन वापस हासिल कर सके.
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