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उत्तराखंड के लिए सबसे ज्यादा राजनीतिक उठापटक वाला वर्ष रहा 2016

उत्तराखंड के लिए सबसे ज्यादा राजनीतिक उठापटक वाला वर्ष रहा 2016

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अस्तित्व में आने के बाद से ही राजनीतिक रूप से अत्यंत सक्रिय रहे उत्तराखंड में साल 2016 सर्वाधिक उठापटक वाला साल रहा.अस्थिरता के लंबे दौर में प्रदेश ने 16 साल में पहली बार सरकार की बर्खास्तगी और राष्ट्रपति शासन देखा.

  • Bhasha
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    अस्तित्व में आने के बाद से ही राजनीतिक रूप से अत्यंत सक्रिय रहे उत्तराखंड में साल 2016 सर्वाधिक उठापटक वाला साल रहा.

    जहां सत्ताधारी कांग्रेस विधायकों के मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ बगावत से शुरू हुए अस्थिरता के लंबे दौर में प्रदेश ने 16 साल में पहली बार सरकार की बर्खास्तगी और राष्ट्रपति शासन देखा.

    फरवरी, 2014 में रावत के लिये मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के समर्थकों को मंत्रिमंडल में जगह न मिलने से और फिर प्रदेश अध्यक्ष पद और राज्यसभा सीट पर भी उनकी दावेदारी नकारे जाने से सत्ताधारी कांग्रेस के इस खेमे में अंदर ही अंदर सुलग रही चिंगारी 18 मार्च को भड़क गई. विधानसभा में बजट प्रस्ताव रखे जाने के दौरान सत्ताधारी दल के नौ विधायकों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया.

    सदन की कार्यवाही के दौरान जैसे ही अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने वित्त मंत्री इंदिरा हृदयेश से विनियोग विधेयक रखने को कहा, वैसे ही मुख्य विपक्षी भाजपा के साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा सहित सभी नौ बागी कांग्रेस विधायकों ने भी विधेयक पर मतदान की मांग का समर्थन कर अपनी ही सरकार को घेरने का प्रयास किया.

    बाद में सदन में हुए अभूतपूर्व हंगामे और अफरातफरी के बीच सदन को स्थगित कर विधेयक पारित होने की घोषणा कर दी गई. हालांकि, इसी दौरान बागी कांग्रेसी विधायक और भाजपा के सदस्यों ने सीधे राजभवन जाकर राज्यपाल कृष्णकांत पाल से मुलाकात की और रावत सरकार के अल्पमत में होने का हवाला देते हुए उसे हटाकर नयी सरकार के गठन का आग्रह किया.

    तत्कालीन परिस्थितियों के मददेनजर राज्यपाल ने मुख्यमंत्री रावत को बुलाया और उनसे सदन में अपना बहुमत सिद्व करने को कहा. होली के अवकाश का सहारा लेते हुए रावत ने त्यौहार के बाद का समय देने का अनुरोध किया जिसे स्वीकार करते हुए राज्यपाल ने उन्हें 28 मार्च को सदन में शक्ति परीक्षण करने को कहा.

    सरकार के अस्तित्व को लेकर बनी अनिश्चितता को समाप्त करने के लिए रावत को 10 दिन का समय देने का राजभवन का फैसला भी विवादों के घेरे में आ गया और उस पर उंगलियां भी उठायी गईं. इसी बीच, विनियोग विधेयक के पारित होने या न होने को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच शब्दबाण चलते रहे. अध्यक्ष कुंजवाल की घोषणा का हवाला देते हुए जहां कांग्रेस ने विनियोग विधेयक के पारित होने का दावा किया, वहीं भाजपा विधेयक पर मतदान की मांग अस्वीकार करने के अध्यक्ष के निर्णय को संवैधानिक रूप से गलत बताते हुए उसके गिर जाने की बात पर अड़ी रही. अध्यक्ष कुंजवाल के सदन में इस आचरण को संविधान विरूद्घ बताते हुए भाजपा ने उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस भी दिया.

    इस बीच, विधानसभा अध्यक्ष कुंजवाल ने बागी कांग्रेस विधायकों को दल बदल कानून के तहत जारी किये गए ‘कारण बताओ’ नोटिस पर कार्यवाही शुरू की जिससे मामला और पेचीदा हो गया. भाजपा और बागी कांग्रेस विधायकों ने अध्यक्ष पर आरोप लगाया कि कुंजवाल पद की गरिमा के विरूद्ध जाकर मुख्यमंत्री के इशारे पर कांग्रेस नेता की तरह काम कर रहे हैं और 28 मार्च को होने वाले शक्तिपरीक्षण में रावत सरकार को बचाने के लिए बागी कांग्रेस विधायकों की सदस्यता समाप्त करना चाहते हैं. बागी विधायकों द्वारा पर्याप्त सुनवाई का समय न दिए जाने के आरोपों के बीच कुंजवाल ने सभी नौ विधायकों की सदस्यता समाप्त भी कर दी.

    इस घमासान में 26 मार्च को एक और नाटकीय मोड़ आया जब एक निजी टीवी चैनल ने मुख्यमंत्री रावत को कथित रूप से अपनी सरकार बचाने के एवज में बागी विधायकों की खरीद-फरोख्त करते दिखाया. स्टिंग ऑपरेशन की यह सीडी बागी विधायकों और बहुगुणा के बेटे साकेत ने 26 मार्च को दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान जारी की.

    उत्तराखंड में मचे राजनीतिक तूफान पर करीब से नजर रख रही केंद्र सरकार इस स्टिंग सीडी के जारी होने के बाद हरकत में आ गई. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने तत्काल इस सीडी की सत्यता को परखने के लिए उसे चंडीगढ़ स्थित फॉरेंसिक लैब भेजा और वहां से उसके सही होने की रिपोर्ट मिलते ही कैबिनेट ने प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करने की मंजूरी लेते हुए उस पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की भी सहमति ले ली.

    प्रदेश में संवैधानिक व्यवस्था के ठप होने का हवाला देते हुए केंद्र ने राज्यपाल द्वारा रावत को सदन में बहुमत सिद्व करने के लिये दी गई 28 मार्च की तारीख से एक दिन पहले राज्य सरकार को बख्रास्त करते हुए प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया.

    बहरहाल, केंद्र का यह दांव उसे उल्टा पड़ गया और अदालतों में अपने इस कदम को सही ठहराने में विफल रहने के कारण उसे मुंह की खानी पड़ी. राष्ट्रपति शासन लागू करने के केंद्र के इस निर्णय को मनमाना बताते हुए रावत ने उसे उत्तराखंड हाई कोर्ट में चुनौती दी जहां से मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा. पहले उच्च न्यायालय और फिर उच्चतम न्यायालय ने भी रावत सरकार को बहुमत सिद्व करने का मौका दिये जाने से पहले राष्ट्रपति शासन लगाने के निर्णय को गलत ठहराया.

    उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर 10 मई को विधानसभा सचिव की बतौर पर्यवेक्षक मौजदूगी में हरीश रावत ने सदन में विश्वास मत रखा जो बागी विधायकों की अनुपस्थिति में आसानी से पारित हो गया और 61 सदस्यों की प्रभावी क्षमता वाले सदन में रावत के पक्ष में 33 वोट पड़े. रावत के पक्ष में शक्ति परीक्षण का फैसला आने के बाद मायूस केंद्र सरकार ने 11 मई को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह उत्तराखंड से राष्ट्रपति शासन हटाने जा रही है.

    ग्यारह मई को राष्ट्रपति शासन के हटने की अधिसूचना जारी होते ही करीब ढाई महीने बाद रावत सरकार प्रदेश में दोबारा सत्तासीन हो गई. बागी विधायकों की सदस्यता का मुद्दा भी उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा लेकिन उस पर कोई फैसला आने से पहले ही सभी विधायक भाजपा में शामिल हो गए. नौ बागी विधायकों के अलावा सोमेश्वर से कांग्रेस की विधायक रहीं रेखा आर्य भी भाजपा में सम्मिलित हो गईं और कांग्रेस छोड़ने वाले विधायकों की कुल संख्या 10 तक पहुंच गईं. उधर, घनसाली और भीमताल से विधायक रहे भीमलाल आर्य और दानसिंह भंडारी भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आ गए.

    इससे पहले, मार्च में उत्तराखंड पुलिस के घोड़े ‘शक्तिमान’ का मुद्दा भी चर्चा में रहा. मार्च के शुरू में प्रदेश सरकार के खिलाफ भाजपा के प्रदर्शन के दौरान शक्तिमान की टांग टूट गई और इसका आरोप मसूरी से भाजपा विधायक गणेश जोशी पर लगा. लाठी का प्रयोग कर शक्तिमान की टांग तोड़ने के आरोप में पुलिस ने जोशी तथा दो अन्य पार्टी कार्यकर्ताओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया तथा उन्हें गिरफ्तार भी किया.

    उधर, घायल शक्तिमान की टांग का ऑपरेशन किया गया और विदेशी डॉक्टरों तक को बुलाया गया लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका. करीब डेढ़ महीने तक चोट की तकलीफ से जूझने के बाद 20 अप्रैल को उसकी मौत हो गई. शक्तिमान को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच चली सियासत उसकी मौत के बाद भी नहीं थमी. विधानसभा चौक पर उसकी प्रतिमा लगाई गई लेकिन विवाद के बाद उसे हटा दिया गया.

    चुनावी वर्ष में प्रदेश की सियासी फिजा में मुख्यमंत्री रावत पर शराब माफिया, खनन माफिया और भूमाफिया को बढ़ावा देने, केदारनाथ में हेलीकॉप्टर कंपनी घोटाला और आबकारी घोटाला जैसे आरोप लगे. मुख्य विपक्षी भाजपा ने इन आरोपों पर मुख्यमंत्री को सीधे निशाने पर लेते हुए कहा कि वह आगामी विधानसभा चुनावों में इन मुद्दों को लेकर जनता के पास जायेगी.

    रावत सरकार के खिलाफ भाजपा ने प्रदेश में ‘‘परिवर्तन यात्रा’’ निकाली जिसमें राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर जैसे पार्टी दिग्गजों ने जनसभाएं कीं.

    कांग्रेस ने भी भाजपा की कथित ‘‘अलोकतांत्रिक नीतियों’’ के खिलाफ सरकार की ‘‘सतत विकास संकल्प यात्रा’’ निकाली जिसमें मुख्यमंत्री रावत, प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय के अलावा कई शीर्ष नेताओं ने हिस्सा लेकर जनता को यह बताने का प्रयास किया कि किस तरह केंद्र राज्य सरकार को योजनाओं के लिए पर्याप्त धन न उपलब्ध कराकर उसका विकास बाधित कर रही है.

    Tags: Harish rawat

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