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NGT के आदेश ताक पर... 4 महीने बाद भी गंगा में गंदगी गिराने वाले किसी होटल, आश्रम पर एक्शन नहीं

 राज्य में जिस विभाग को गंगा और उसकी सहायक नदियों में गंदगी और सीवर डालने से रोकना था वह अनजाने कारणों से चुपचाप बैठा है और विभागीय मंत्री तक को इसकी भनक नहीं है.

राज्य में जिस विभाग को गंगा और उसकी सहायक नदियों में गंदगी और सीवर डालने से रोकना था वह अनजाने कारणों से चुपचाप बैठा है और विभागीय मंत्री तक को इसकी भनक नहीं है.

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जिस गंगा की सफ़ाई के नाम पर सालों से करोड़ों रुपये बहाए जा रहे हैं, जिसे करोड़ों हिंदू मां का दर्जा देते हैं और जिसके पवित्र जल के आचमन से ही पाप धुल जाने का विश्वास रखते हैं उस महत्वपूर्ण नदी को उसके मायके यानि उत्तराखंड में ही प्रदूषित किया जा रहा है और कोई इसे रोकने के लिए कुछ करने को तैयार नहीं है. राज्य में जिस विभाग को गंगा और उसकी सहायक नदियों में गंदगी और सीवर डालने से रोकना था वह अनजाने कारणों से चुपचाप बैठा है और विभागीय मंत्री तक को इसकी भनक नहीं है.

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उत्तराखंड में सरकारी मशीनरी किस तरह काम करती है, इसका एक उदाहरण स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड है. एनजीटी के निर्देश पर राज्य सरकार ने पिछले साल दिसंबर में गंगा और उसकी सहायक नदियों में सीवर और गंदगी डालने वाले होटलों, आश्रमों और धर्मशालाओं पर पांच हज़ार रुपये प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना लगाने के आदेश किए थे. इसके लिए स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड को नोडल एजेंसी बनाया गया था.

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गंगा में प्रदूषण की संवेदनशीलता को जानने के बावजूद बोर्ड ने इन आदेशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया. स्थिति यह है कि आदेश जारी होने के चार महीने बाद भी बोर्ड के अधिकारियों ने एक होटल तक का निरीक्षण नहीं किया.

प्रदेश में करीब 1573 होटल, धर्मशाला और आश्रम मौजूद हैं. इनमें से कितने प्रतिष्ठान पर्यावरणीय मानकों का पालन कर रहे हैं बोर्ड को इस बात तक की भी जानकारी नहीं है.

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अभी चल रहे बजट सत्र में यमकेश्वर की बीजेपी विधायक ऋतु खंडूड़ी ने जब वन मंत्री से जानना चाहा कि अभी तक गंगा को मैला करने वाले कितने संस्थानों पर कार्यवाही की गई, कितने का जुर्माना वसूला गया तो वन मंत्री हरक सिंह रावत बगले झांकने लगे.

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