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NTCA के निर्देशों को ताक पर रख हो रहा है राजाजी में बाघों का ट्रांस्लोकेशन!

मोतीचूर में मौजूद दूसरी बाघिन टी-टू के फोटोग्राफ़ लगातार कैमरा ट्रैप में आ रहे हैं लेकिन, टी-1 गायब है.
मोतीचूर में मौजूद दूसरी बाघिन टी-टू के फोटोग्राफ़ लगातार कैमरा ट्रैप में आ रहे हैं लेकिन, टी-1 गायब है.

मोतीचूर रेंज से सितंबर से गायब बाघिन टी-1 का अभी तक पता नहीं चल पाया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 14, 2020, 5:37 PM IST
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देहरादून. राजाजी टाइगर रिज़र्व की मोतीचूर रेंज से सितंबर से गायब बाघिन टी-1 का अभी तक पता नहीं चल पाया है. बाघिन के गायब होने की सूचना मिलने पर पिछले डेढ़ महीने से पूरे पार्क क्षेत्र को छानने में लगे राजाजी टाइगर रिज़र्व प्रशासन को अभी तक उसका कोई ठोस सुराग हाथ नहीं लगा है. इसके बावजूद इन बाघिनों के लिए बाघों के ट्रांस्लोकेशन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है और इसके लिए एनटीसीए के दिशानिर्देशों को भी ताक पर रख दिया गया है. आगे पढ़िए क्या है यह पूरा मामला.

जिसके लिए लाए जा रहे बाघ, वही गायब 

बता दें कि मोतीचूर के इस हिस्से में सालों से दो बाघिन रहती हैं, जिन्हें टी-1 और टी-2 नाम दिया गया है. ये दोनों बाघिन सालों से अकेली हैं. इनके सर्वावल के लिए यहां पांच टाइगर लाए जाने की कवायद लंबे समय से चल रही है. इसी हफ़्ते कार्बेट पार्क से पहले फेज में दो टाइगर लाए जा रहे हैं जिसके लिएडब्लूआईआई और फॉरेस्ट डिपार्टमेंट की टीम कार्बेट पार्क में डेरा डाली हुई हैं.



सवाल यह उठता है कि जिन बाघिन के सर्वावल के लिए टाइगर्स के ट्रांस्लोकेशन की योजना बनी थी, उनमें से एक कहां गायब हो गई. मोतीचूर में मौजूद दूसरी बाघिन टी-टू के फोटोग्राफ़ लगातार कैमरा ट्रैप में आ रहे हैं लेकिन, टी-1 गायब है. पार्क प्रशासन ने तीन हाथियों के साथ कई वनकर्मियों को तो बाघिन को ढूंढने में लगाया ही है 80 से अधिक ट्रैप कैमरे पार्क की मोतीचूर, कांसरों और धौलखंड रेंज में लगाए हैं. लेकिन टी-1 बाघिन के बारे में कोई ठोस प्रमाणिक जानकारी हाथ नहीं लग पाई है.
WII ने किए हाथ खड़े

इस बीच पार्क प्रशासन ने स्कैट के करीब छह नमूने भारतीय वन्य जीव संस्थान (WII) की फॉरेंसिक लैब में भेजे थे. बताया जा रहा है कि इनमें से दो नमूने टाइगर के स्कैट के निकले हैं लेकिन क्या ये स्कैट टी-1 के ही हैं, इसका पता कई दिन बाद भी WII को नहीं चल पाया है. सूत्रों की मानें तो एक तरह से WII ने भी हाथ खडे कर दिए हैं.

सवाल उठता है कि यदि बाघिन टी-1 प्राकृतिक मौत नहीं मरी है या फिर उसका शिकार नहीं हुआ है,  मतलब कि वह ज़िंदा है तो पिछले सितंबर के बाद से कैमरा ट्रेप में उसके फोटोग्राफ क्यों नहीं कैप्चर हो पा रहे. उत्तराखंड के वन विभाग का पूरा महकमा इस संबंध में मीडिया से बातचीत में कतरा रहा है. अलग-अलग स्तर से अलग-अलग भ्रमित करने वाली जानकारियां मीडिया को क्यों दी जा रही हैं.

एनटीसीए की गाइडलाइन्स की परवाह नहीं 

एक सवाल और डिपार्टमेंट को आखिर टाइगर ट्रांसलोकेशन की इतनी जल्दी क्यों है? जब आप दो प्लैगशिप बाघिन की सुरक्षा नहीं कर पाए तो फिर कार्बेट से लाकर यहां पटक दिए जाने वाले बाघ-बाघिनों की सुरक्षा कैसे होगी?

न्यूज़ 18 के पास मौजूद दस्तावेज़ बताते हैं कि 2018 में भी जब बाघों के ट्रांस्लोकेशन का प्रोग्राम बना था तो डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल ऑफ फॉंरेस्ट, नई दिल्ली और एनटीसीए ने सबसे पहले मोतीचूर की दोनों बाघिन को कॉलर करने के आदेश दिए थे. उद्देश्य यह था कि जो नए टाइगर लाए जाएं उनकी लोकेशन और पार्क में पहले से मौजूद दोनों टाइग्रेस की लोकेशन का पता लगता रहे.

लेकिन इस बार इन गाइड लाइन्स को ताक पर रख दिया गया है. और इसकी वजह यह है कि वन विभाग के अफ़सरों में टाइगर ट्रांस्लोकेशन का श्रेय लेने की होड़ मची है. इसी कारण एनटीसीए की इस गाइड लाइन्स को भी अनदेखा कर टाइगर ट्रांस्लोकेशन की प्रकिया को अंजाम दिया जा रहा है. वह भी तब, जबकि एक बाघिन टी-1, करीब ढाई महीने से गायब है.
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