प्रदेश18 विशेष : होलस्टि‍न फ्रीजियन की जगह लेगी ऑर्गेनिक दूध देने वाली पहाड़ों की बद्री गाय
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देशभर में दूध उत्पादन के क्षेत्र में हॉलैंड की होलिस्टन फ्रीजन गाय सबसे ज्यादा पसंद की जाती हैं. भारत में कई नस्ल की गाय होने के बावजूद इन गायों को डेयरी उद्योग में सबसे बेहतर समझा जाता है.

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दुनियाभर में दूध उत्पादन के क्षेत्र में हॉलैंड की होलिस्टन फ्रीजियन गाय सबसे ज्यादा पसंद की जाती हैं. भारत में भी कई नस्ल की गाय होने के बावजूद इन गायों को डेयरी उद्योग में सबसे बेहतर समझा जाता है, लेकिन उत्तराखंड की बद्री गाय अब फ्रीजन गायों को टक्कर देने की तैयारी कर रही हैं.

पशुपालन विभाग उत्तराखंड के डॉक्टरों की ओर से बद्री गाय की दूध क्षमता बढ़ाने और शुद्ध ऑर्गेनिक दूध प्राप्त करने की कोशिशें की जा रही हैं. आखिर कैसे बद्री गायों को तैयार किया जा रहा है, आइए जानते हैं.

एनबीएजीआर की सूची में शामिल हुई बद्री गाय
भारत में गायों की कई नस्लें पाई जाती हैं, जिनमें साहीवाल, सिधी और जर्सी प्रमुख हैं, लेकिन डेयरी उद्योग में होलिस्टन फ्रीजियन गाय ज्यादा पसंद की जाती हैं, क्योंकि इन गायों में दूध देने की क्षमता 35 से 40 लीटर प्रतिदिन होती है, गाढ़ा दूध होने के चलते बाजार में इनका दूध भी ज्यादा पसंद किया जाता है, लेकिन इन गायों को टक्कर देने के लिए उत्तराखंड के पहाड़ों की बद्री गाय तैयार की जा रही है.
Photo Courtesy- ETV
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उत्तराखंड पशुपालन विभाग के निदेशक डॉ. एस एस बिष्ट ने बताया है कि बद्री गायों को हाल ही में भारत की प्रमुख गायों के नस्लों में शामिल किया गया है.

डॉ. बिष्ट के मुताबिक एनबीएजीआर यानी नेशनल ब्यूरो ऑफ जेनेटिक्स रिसोर्सेज ने बद्री गायों को भारत की प्रमुख गाय की नस्लों में शामिल कर लिया है. जिसके बाद पहाड़ की बद्री गायों की विश्व पटल पर अलग पहचान होगी. भारत में दुधारू पशुओं की 160 से ज्यादा नस्लें हैं, जिनमें 40 नस्ल गायों की हैं.

आखिर कैसे पहाड़ों पर आसान होगा होलिस्टन फ्रीजन के मुकाबले बद्री गाय को पालना?

प्रदेश में पहाड़ी जनपदों में करीब 12 लाख से ज्यादा बद्री गायों के पशुपालन विभाग की ओर से आकलन किया गया है. पशुपालकों के मुताबिक होलस्टीन फ्रीजियन गायों को कमर्शियल तौर पर प्रयोग किया जाता है, लेकिन इनका पालन-पोषण काफी मंहगा है.

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साथ ही पहाड़ों में इनके लिए वातानुकूलित गौशालाएं बनानी होती हैं, जिस कारण आम किसान के लिए ये काफी मंहगी है. वहीं, बद्री गाय पहाड़ के किसानों के लिए सबसे सस्ती और उपयोगी हैं.

पशुपालकों के मुताबिक इनके कृत्रिम गर्भाधान के लिए पशुपालन विभाग को पहाड़ी नस्लों के ही बेहतर सांडों के सीमन प्रयोग करने होंगे, जिनसे बेहतर परिणाम सामने आएंगे.

ऑर्गेनिक दूध है बद्री गाय की पहचान

विश्व में केवल बद्री गाय ही एक मात्र गाय है, जिनका दूध ऑर्गेनिक होता है. बद्री गायों को लेकर पशुपालन विभाग ने अपना शोध शुरू कर दिया है.

चम्पावत जिले के नरियाल गांव में अभी करीब 300 गायों के साथ पशुपालन विभाग ने बद्री गायों की नस्ल बेहतर करने और दूध क्षमता बढ़ाने पर कार्य किया जा रहा है, जिससे बद्री गायों के दूध को 20 से 25 लीटर प्रतिदिन तक बढ़ाया जा सके.

साथ ही प्रदेश के पहाड़ी जनपदों में किसान कम खर्चे पर इन गायों से ज्यादा उत्पादन प्राप्त कर सकें.

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बीमारियों से दूर रहती हैं बद्री गाय
वैज्ञानिकों के मुताबिक पहाड़ की बद्री गायों में वातावरण के बेहतर तालमेल के चलते रोग प्रतिरोधक क्षमता अन्य गायों से काफी ज्यादा होती है, जिस कारण आम तौर पर गायों को होने वाले रोग खुर पका और मुह पका बिमारियां बद्री गायों में औसतन ना के बराबर होती हैं.

साथ ही इन बद्री गायों के गोमूत्र और गोबर से ऑर्गेनिक खाद बनती है, जिसकी मांग पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय जैसे बढ़े संस्थानों में सबसे ज्यादा है.

प्रदेश में डेयरी इंडस्ट्री को बद्री गायों से मिलेगा बढ़ावा
जहां तक देश के कुल दूध उत्पादन में योगदान की बात है. उत्तर प्रदेश 17 प्रतिशत योगदान के साथ सबसे ऊपर है. इसके बाद राजस्थान 11 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश 9 प्रतिशत, पंजाब 8 प्रतिशत और गुजरात का योगदान 8 प्रतिशत रहा है.

पशुपालन के बेहतर परिणामों के लिए फ्रीजन गायों पर निर्भर रहने के बजाए पहाड़ी और देशी नस्लों की गायों पर ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है. बद्री गायों के दूध में किसी भी तरह के कैमिकल नहीं पाए जाते हैं. ऑर्गेनिक दूध को बढ़ावा देने के लिए इन गायों की नस्लों को और ज्यादा विकसित करना जरूरी है.
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