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जीत के पीछे हार है... पंचायत चुनावों में पहाड़ों में बीजेपी तो मैदान में कांग्रेस की चूलें हिलीं

Sunil Navprabhat | News18 Uttarakhand
Updated: November 11, 2019, 5:58 PM IST
जीत के पीछे हार है... पंचायत चुनावों में पहाड़ों में बीजेपी तो मैदान में कांग्रेस की चूलें हिलीं
पंचायत चुनाव परिणाम की व्याख्या बीजेपी और कांग्रेस अपने-अपने ढंग से कर रहे हैं. (फ़ाइल फ़ोटो)

दोनों ही पार्टियों ने गांव और शहरों में अपने मतदाता आधार (Voters base) को खोया है. इसलिए दावों से इतर दोनों दल अंदरखाने चिंतित हैं.

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देहरादून. पंचायत चुनाव परिणाम (Panchayat Election Results) की व्याख्या बीजेपी और कांग्रेस (BJP and Congress) अपने-अपने ढंग से कर रहे हैं. भले ही प्रदेश के दोनों प्रमुख राजनीतिक दल बीजेपी और कांग्रेस नतीजों को अपने पक्ष में बता रहे हैं लेकिन हकीकत यह है कि इन नतीजों ने दोनों पार्टियों की पेशानी पर बल डाल दिए हैं. इसकी वजह भी है. दोनों ही पार्टियों ने गांव और शहरों में अपने मतदाता आधार (Voters base) को खोया है. इसलिए दावों से इतर दोनों दल अंदरखाने चिंतित हैं.

कांग्रेस के लिए बदल रही हैं स्थितियां 

ख़ास बात यह है कि उत्तराखंड में 55 फीसदी मतदाता पंचायतों के निर्वाचन क्षेत्र से हैं इसलिए इन चुनावों को 2022 का लिटमस टेस्ट भी माना जा रहा था. पार्टियों ने प्रत्याशियों को भले ही सिंबल न बांटे हों लेकिन भाजपा हो या कांग्रेस दोनों ने ग्राम प्रधान से लेकर जिला पंचायत अध्यक्ष तक जी जान ज़रूर लगा दी थी.

परिणाम बता रहे हैं कि कांग्रेस मैदान में और बीजेपी पहाड़ में ठीक ढंग से परफॉर्म नहीं कर पाई है. कांग्रेस ने चमोली, अल्मोड़ा, उत्तरकाशी में शानदार प्रदर्शन किया तो मैदानी जिलों में भाजपा ने उसका सूपड़ा साफ कर दिया.

कांग्रेस नेता मनीष खंडूड़ी इसे स्वीकार करते हुए कहते हैं कि स्थितियां आदर्श तो नहीं हैं लेकिन यह कहना ठीक होगा कि बदल रही हैं. वह कहते हैं कि कांग्रेस में संगठन के स्तर पर सुधार करने के लिए बहुत सारे नेता लगे हुए हैं और आने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी सरकार के प्रति लोगों के गुस्से को कांग्रेस जीत में बदलेगी.

पहाड़ में खिसक रहा बीजेपी का आधार 

बीजेपी ने मैदान में जीत हासिल की तो पहाड़ में कांग्रेस ने उसको नाकों चने चबवा दिए. पहाड़ में पार्टी की परफॉर्मेंस गिरती जा रही है. ज़िला पंचायत अध्यक्ष की तीन सीट जो हाथ से निकली वह भी पहाड़ से ही थी. सबसे चिंताजनक बात श्रीनगर पालिका का चुनाव हारना रहा क्योंकि मुख्यमंत्री समेत चार मंत्री पौड़ी के ही हैं.सवाल उठता है कि क्या पंचायत चुनावों को 2022 का लिटमेस टेस्ट माना जाना चाहिए. यदि हां तो दोनों ही पार्टियों के लिए ये परिणाम एलार्मिंग सिचुएशन से कम नहीं.

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First published: November 11, 2019, 5:44 PM IST
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