पंचायती राज एक्ट: अनुभवी लोग हुए मायूस, नौकरी की तलाश में जुटे युवाओं के खिले चेहरे

Uttarakhand News-पंचायत राज एक्ट में संशोधन के बाद दो बच्चों से ज्यादा होने पर और 10वीं से कम पड़े लिखे लोग चुनाव लड़ने की रेस से बाहर हो गए हैं. हाल ये है कि गांवों में प्रधान पद के चुनावों के लिए प्रत्याशी नहीं मिल रहे हैं. जबकि यह युवाओं के लिए सुनहरा मौका है.

Robin Singh Chauhan | News18 Uttarakhand
Updated: August 12, 2019, 4:14 PM IST
पंचायती राज एक्ट: अनुभवी लोग हुए मायूस, नौकरी की तलाश में जुटे युवाओं के खिले चेहरे
पलायन कर रहे युवाओं के पास गांव लौटने का अच्‍छा अवसर.
Robin Singh Chauhan | News18 Uttarakhand
Updated: August 12, 2019, 4:14 PM IST
पंचायती राज एक्ट में हुए संशोधन के बाद वो युवा जो सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे थे. वह अब अपने गांव की ओर लौट रहे हैं और पंचायत चुनावों की तैयारी कर रहे हैं. वजह है एक्ट में संशोधन के बाद कैंडिडेट नहीं मिल रहे हैं. जी हां, यह सच है, क्‍योंकि पंचायत राज एक्ट में संशोधन के बाद दो बच्चों से ज्यादा होने पर और 10वीं से कम पड़े लिखे लोग चुनाव लड़ने की रेस से बाहर हो गए हैं. हाल ये है कि गांवों में प्रधान पद के चुनावों के लिए प्रत्याशी नहीं मिल रहे हैं. वैसे इस एक्ट ने जहां कई लोगों को मायूस किया है, तो वही कई नौजवानों के लिए नए विकल्प सामने आए हैं.

युवाओं के लिए बना रास्‍ता
सतपाल चौहान चकराता से देहरादून सिविल सर्विसेस की तैयारी करने आए थे और वो लगभग पांच सालों से कलैक्टर बनने की तैयारी कर रहे हैं. एक दिन अखबार में उन्होंने पंचायती राज एक्ट में हुए संशोधन के बारे में पढ़ा. यह खबर उनके लिए कई विकल्प लेकर आई और अब वो नौकरी की तैयारी के साथ साथ चुनावों की तैयारी कर रहे हैं. अब वो अपने क्षेत्र के लोगों से संपर्क साध रहे हैं यानि चुनावी तैयारियों में जुट गए हैं.

सतपाल का कहना है, 'पढ़ा-लिखा युवा बेहतर काम कर सकता है और मौका मिला है उसे वो आजमाएंगे जरूर.'

जबकि सीमांत जनपद के दूरस्थ ईलाके घाट से आए भूपेंद्र कण्डारी भी देहरादून में प्रतियोगी परिक्षाओं की तैयारी में जुटे हैं. हर शाम दून लाईब्रेरी में वो अपने साथियों के साथ सरकारी नौकरी में सुनहरे भविष्य के सपने संजो रहे थे, लेकिन रातों रात उनके सपने बदल गए हैं. अब वो सरकारी बाबू नहीं बल्कि प्रधान बनना चाहते हैं. अपने गांव वालों से वो सलाह मशवरा भी कर रहे हैं और चुनावों में कितना खर्चा होता है इसका लेखा जोखा भी जुटा रहे हैं.

उन्‍होंने कहा, ' नई क्वालीफिकेशन के बाद प्रधान पद पर उम्मीदवार नहीं मिल रहे हैं. ऐसे में भगवान ने चाहा तो वो निर्विरोध प्रधान बन सकते हैं.'

वहीं भूपेंद्र के साथी मोहित रतूड़ी ने तो चुनावी टिप्स लेना भी शुरू कर दिया है और इस बाबत वह अपने इलाके के सीनियर नेताओं से संपर्क कर रहे हैं और राजनीति का ककहरा सीख रहे हैं. साथ ही गांव और घरवालों को भी मना रहे हैं.
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राजनीति में करियर बनाने की तैयारी ने पकड़ा जोर
देहरादून में कोचिंग संस्थान चलाने वाले हरी भण्डारी भी मानते हैं कि पहाड़ के गांवो से आए युवाओं का झुकाव पंचायत चुनावों की तरफ हो गया है. वो कहते हैं कि अपने जो स्टूडेंट हाल जिन्होंने हाल ही में सरकारी नौकरी की तैयारी शुरू की है उन्हें राजनीति में जाने के लिए प्रोत्साहित भी कर रहे हैं, ताकि राजनीति में वो अपना करियर बना सकें.

बहरहाल, इन युवाओं का बड़ी संख्या में पंचायत चुनावों के प्रति रुझान बढ़ने का कारण ये है कि नए पंचायत चुनावों में संशोधन आने के बाद कैंडिडेट क्वालीफिकेशन पूरी नहीं कर पा रहे हैं. यकीनन दो बच्चों से अधिक और 10वीं से कम पढ़े-लिखे लोग चुनाव नहीं लड़ सकते हैं. जबकि इलाके में जहां पद रिर्जव है वहां तो प्रत्याशी मिलना और ज्यादा मुश्किल हो गया है. ऐसे में इस बार बड़ी संख्या में युवाओं को अपने लिए सुनहरा मौका दिख रहा है.

राजनैतिक दलों ने कही ये बात
वैसे अलग-अलग राजनैतिक दल भी इसे अपनी-अपनी नजरों से देख रहे हैं. कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष और पंचायत से जुडे आंदोलनों में सक्रीय रहने वाले जोत सिंह बिष्ट का कहना है कि इन संशोधनों के बाद अनुभवी लोग बाहर हो जाऐंगे और ऐसे लोग चुन कर आएंगे, जिनकी पंचायतों में कोई रूचि नहीं है. वो आगे कहते हैं कि वो युवा जो नौकरी ढूंढ रहे हैं वो आसानी से चुनाव तो जीत जाएंगे, लेकिन पांच साल बाद एक बार फिर से वो बेरोजगार होंगे.

जबकि भाजपा के मीडिया प्रभारी देवेंद्र भसीन इस बात को तो मानते है कि पंचायत चुनाव में अनुभव की कमी जरूर होगी. लेकिन वो मानते है कि संगठन की मदद से वो नए लोगों को मदद करने को तैयार हैं और युवा अच्‍छा काम कर सकते हैं.

खैर, पंचायत चुनावों में इस बार कई अनुभवी लोग बाहर हो रहे हैं और युवाओं के बड़ी संख्या में पंचायत चुनाव लड़ने की संभावनाएं बन रही हैं. इन संशोधनों ने एक तरफ जहां कुछ लोगों के चेहरे पर मायूसी छा गई तो कुछ इसे मौके की तरह देख रहे हैं.

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First published: August 12, 2019, 4:12 PM IST
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