बस बच गई रीना... पहाड़ों में ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर यात्रा, स्वास्थ्य केंद्रों के धक्कों से आ गया था जान पर खतरा

रीना तो इस मायने में ख़ुशकिस्मत कही जाएंगी कि तकलीफ़ उठाकर ही सही उन्हें समय पर इलाज तो मिल गया लेकिन पहाड़ों में सभी इतने ख़ुशकिस्मत नहीं होते.

Bharti Saklani | News18 Uttarakhand
Updated: July 24, 2019, 7:38 PM IST
बस बच गई रीना... पहाड़ों में ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर यात्रा, स्वास्थ्य केंद्रों के धक्कों से आ गया था जान पर खतरा
आप भी चकराता की रीना की सुनेंगे तो आपको पहाड़ों से पलायन के कारण समझ आने लगेंगे.
Bharti Saklani
Bharti Saklani | News18 Uttarakhand
Updated: July 24, 2019, 7:38 PM IST
उत्तराखण्ड में स्वास्थ्य सेवाएं पलायन की बड़ी वजहों में से एक है. राज्य सरकार के तमाम दावों, कोशिशों के बावजूद राज्य में स्वास्थ्य सेवाएं पटरी पर आना मुश्किल लग रहा है. डॉक्टरों को पहाड़ पर चढ़ाने की सरकार की कोई कोशिश सफल होती नहीं दिख रही. रही-सही कसर सरकारी विभागों की खींचतान पूरी कर रही है जिसकी वजह से सालों से स्वीकृत सड़कें ही नहीं बन पा रही, उन पर चलकर एंबुलेंस कैसे पहुंचेगी. आप भी चकराता की रीना की कहानी सुनेंगे तो आपको पहाड़ों से पलायन के कारण समझ आने लगेंगे.

कंधों पर लादकर लाया गया 10 किलोमीटर 

रीना ने दस दिन पहले ही विकासनगर में एक बेटी को जन्म दिया था. तबियत सुधरी तो परिजन उन्हें गांव ले गए, जहां पहुंचने के लिए 10-12 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है. मंगलवार को रीना की तबियत ख़राब हो गई और उन्हें अस्पताल लाने की नौबत आ पड़ी.

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उनके गांव बुरायला से किसी भी बीमार को अस्पताल तक लाना एक बड़ी मशक्कत का काम होता है. डिलिवरी के बाद बेहद कमज़ोर हो चुकी रीना के लिए बांस बांधकर एक पालकी सी बनाई गई और उसमें बांधकर ग्रामीणों ने 10-12 किलोमीटर का सफ़र तय किया और सड़क पर पहुंचकर एंबुलेंस के ज़रिए चकराता पहुंचे.

chakrata woman in hospital, देहरादून के अस्पताल में अपने पति, बच्चे और रिश्तेदार के साथ रीना चौहान.
देहरादून के अस्पताल में अपने पति, बच्चे और रिश्तेदार के साथ रीना चौहान.


मौजूद स्टाफ़ ने हाथ खड़े कर दिए तो रीना के परिजन रीना को लेकर तहसील मुख्यालय विकासनगर पहुंचे लेकिन वहां भी रीना को ट्रीटमेंट नहीं मिला. हां यह ज़रूर बता दिया गया कि उसका बहुत ज़्यादा खून बह गया है और उसे तुरंत इलाज की ज़रूरत है. इस पर परिजन रीना को लेकर देहरादून स्थित महंत इंद्रेश अस्पताल पहुंच गए.
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जान बची लेकिन इलाज करवाना पड़ रहा भारी 

यहां ट्रीटमेंट के बाद रीना की हालत में कुछ सुधार तो हुआ लेकिन उनके पति रमेश चौहान के सामने दूसरी समस्या आ खड़ी हुई. रमेश बताते हैं कि चकराता, विकासनगर में जब इलाज नहीं मिला और डॉक्टरों ने रीना की हालत गंभीर बताई तो वह इस उम्मीद में सीधा इंद्रेश अस्पताल आ गए कि उनकी पत्नी की जान बच सकेगी और आयुष्मान कार्ड से उसका इलाज भी हो जाएगा. लेकिन अस्पताल ने आयुष्मान कार्ड को स्वीकार करने से इनकार कर दिया.

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मंहत इंद्रेश अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेट एसके राय कहते हैं कि आयुष्मान कार्ड में प्री-अप्रूवल लेना होता है और सरकारी अस्पताल से रेफ़र करवाना भी ज़रूरी होता है. हालांकि वह आश्वासन देते हैं कि रीना को आयुष्मान कार्ड का लाभ दिलाने की पूरी कोशिश की जाएगी.

भगवान भरोसे सिस्टम 

रमेश चौहान के बड़े भाई संजय चौहान बताते हैं कि उनके गांव तक पीएमजेएसवाई के तहत 2016 से सड़क स्वीकृत है लेकिन अभी तक उस पर काम शुरु नहीं हुआ है. पीएमजीएसवाई के पास जाओ तो वह पीडब्ल्यूडी, फॉरेस्ट में भेज देते हैं और वहां से वह पीएमजीएसवाई.

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इस खींचतान की वजह से अब भी इमरजेंसी पड़ने पर लोगों की जान रीना की तरह ही खतरे में पड़ जाती है. रीना तो इस मायने में ख़ुशकिस्मत कही जाएंगी कि तकलीफ़ उठाकर ही सही उन्हें समय पर इलाज तो मिल गया लेकिन पहाड़ों में सभी इतने ख़ुशकिस्मत नहीं होते. देवभूमि की यह वह त्रासदी है जो यहां के लोगों की नियति बन गई है... और त्रासदी यह है कि यहां का सिस्टम भगवान भरोसे ही चल रहा है.

 

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First published: July 24, 2019, 7:23 PM IST
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