मिशन पानीः युद्ध स्तर पर ज़रूरत है वर्षा जल संरक्षण की, चाल-खाल का पुनर्जीवन ज़रूरी

आम आदमी अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकता. यह प्रवृत्ति ठीक नहीं है कि मैं गंदा करूंगा, सरकार साफ़ करेगी या मैं बर्बाद करूंगा, सरकार बचाएंगी.

Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: July 4, 2019, 11:20 AM IST
मिशन पानीः युद्ध स्तर पर ज़रूरत है वर्षा जल संरक्षण की, चाल-खाल का पुनर्जीवन ज़रूरी
एक गांव में तीन से चार चाल-खाल होते थे. इसके अलावा जंगलों में भी वर्षा जल संरक्षण के लिए चाल-खाल बनाए जाते थे जो न सिर्फ़ जानवरों की पीने के पानी की ज़रूरत पूरी करते थे बल्कि जंगल में नमी भी बनाए रखते थे.
Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: July 4, 2019, 11:20 AM IST
एक हज़ार से ज़्यादा छोटी-बड़ी नदियों वाले उत्तराखंड के लिए पानी वरदान तो है ही यह दो तरह से समस्याएं भी लाता है. गर्मियों में कई जगह पीने के पानी की कमी हो जाती है और बरसात में नदी-नाले उपनने, बादल फटने की वजह से आपदा आती है. पीने की पानी की कमी को सिर्फ़ थोड़ी सी कोशिशों से दूर किया जा सकता है. राज्य में होने वाली बारिश का मात्र साढ़े चार फ़ीसदी ही संरक्षण किया जाए तो पानी की सारी ज़रूरतें पूरी हो सकती हैं. और इसके लिए राज्य की कुल ज़मीन के सिर्फ़ साढ़े चार-पांच फ़ीसदी की ही ज़रूरत पड़ेगी.

उत्तराखंड को बारिश का वरदान 

राज्य योजना आयोग में सलाहकार एचपी उनियाल ने दो साल पहले उत्तराखंड में वर्षा जल संचयन और भूजल के रीचार्ज पर अध्ययन कर एक डॉक्यूमेंट तैयार किया था. वह कहते हैं कि वर्षा जल संचयन के लिए युद्ध स्तर पर काम करने की ज़रूरत है क्योंकि इसकी वजह से न सिर्फ़ बेशकीमती पानी बिना इस्तेमाल के बह जा रहा है बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को भी प्रभावित कर रहा है.

उनियाल बताते हैं कि उत्तराखंड के लिए बारिश का महत्व इसलिए भी ज़्यादा है क्योंकि यहां देश के औसत से अधिक बारिश होती है. देश में औसतन 1100 मिमी बारिश होती है और उत्तराखंड में 1400 मिमी. प्रदेश में अच्छी मात्रा होने वाली इस बारिश के पानी का 4.5 फ़ीसदी भी हम इकट्ठा कर लें तो इससे न सिर्फ़ निजी ज़रूरतों बल्कि सिंचाई और औद्योगिक उपयोग के लिए भी पानी की कमी नहीं पड़ने वाली.

chal-khal, पारंपरिक रूप से पहाड़ के गांवों में चाल-खाल होते थे.
पारंपरिक रूप से पहाड़ के गांवों में चाल-खाल होते थे.


चाल-खाल को पुनर्जीवित करना ज़रूरी

उत्तराखंड में पारंपरिक रूप से पानी रोकने के लिए बनाए जाने वाले तालाबों को चाल-खाल कहते हैं. दो पहाड़ियों की ढलान जिस स्थान पर मिलती है वहां पारंपरिक रूप से तालाब बनाए जाते थे क्योंकि वहां पानी का बहाव सर्वाधिक होता है. आमतौर पर ये 10 से 15 मीटर लंबे-चौड़े और एक से दो मीटर गहरे होते थे. इनकी जल भंडारण क्षमता 40 से 50 हज़ा लीटर तक होती थी.
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उनियाल के अनुसार आम तौर पर एक गांव में तीन से चार चाल-खाल होते थे. इसके अलावा जंगलों में भी वर्षा जल संरक्षण के लिए चाल-खाल बनाए जाते थे जो न सिर्फ़ जानवरों की पीने के पानी की ज़रूरत पूरी करते थे बल्कि जंगल में नमी भी बनाए रखते थे. इससे वनस्पति, शाकाहारी जानवर और शिकारी जानवरों की ज़रूरतें वहीं पूरी हो जाती थीं. उनियाल कहते हैं कि जंगलों में आदमियों का प्रवेश रोके जाने और घर-घर नल से पानी आ जाने की वजह से ये चाल-खाल मिट्टी का भराव होने से बंद हो गए.

इस तरह करोड़ों लीटर संग्रहित पानी अचानक गायब हो गया. इसके बहुत सारे प्रभाव पड़े हैं. पहला और सबसे बड़ा प्रभाव तो यह है कि भूजल रीचार्ज होने के बड़े स्रोत बंद हो गए हैं. उनियाल कहते हैं कि चाल-खाल का प्राकृतिक जलस्रोतों से संबंध था और उनके बंद होने की वजह से बड़ी संख्या में धारा-नौले सूख रहे हैं या उनमें पानी कम हो गया है. ये प्राकृतिक जल स्रोत बचे रहें, भूजल रीचार्ज होता रहे इसके लिए उन चाल-खाल को वहीं रीचार्ज करने की ज़रूरत है क्योंकि पानी बनाए रखने के लिए वह बहुत स्ट्रेटिजिक लोकेशन्स पर थे.

नदियों पर असर

वर्षा जल संरक्षण न होने का असर ऐसी नदियों पर भी पड़ा है जो ग्लेशियर नहीं प्राकृतिक स्रोतों से निकलती हैं या बरसाती नदियां हैं, जैसे कि देहरादून की रिस्पना. चाल-खाल बंद होने के अलावा भी  प्राकृतिक जल स्रोतों का पानी घटा है और इसके कई कारण हैं. पहाड़ों में खेती की ज़मीन घटने की वजह से मिट्टी अब सीमेंट जैसी कठोर हो गई है और उसके पानी के जज़्ब होने की क्षमता घट गया है. बेतरतीब निर्माण से भी प्राकृतिक जल स्रोत के रीचार्ज पर असर पड़ा है.

इस सबकी वजह से ऐसी नदियां भी सूखने के कगार पर आ गई हैं. इन्हें रीचार्ज करने या इनमें पानी का बहाव बनाए रखने के लिए चेक डैम, नाला बंध, गधेरा बंध जैसे उपाय किए जाने चाहिएं ताकि इन नदियों में पानी बना रहे और इनके जलागम क्षेत्र में भी नमी बनी रहे.

rain water harvesting, रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम
रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम


सरकार और व्यक्ति की भूमिका

उनियाल कहते हैं कि वर्षा जल संचयन के लिए सिर्फ़ सरकार के भरोसे नहीं रहा जा सकता. सरकार अपने स्तर पर कई जगह वर्षा जल संचयन या नदियों के पानी को रोककर इस्तेमाल करने की योजनाओं पर काम कर रही है. पौड़ी की ल्वाली झील और टिहरी में सौंग नदी पर बनने वाले बांध इसी दिशा में की जा रही कोशिशें हैं.

लेकिन आम आदमी अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकता. यह प्रवृत्ति ठीक नहीं है कि मैं गंदा करूंगा, सरकार साफ़ करेगी या मैं बर्बाद करूंगा, सरकार बचाएंगी. रूफ़ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाकर पानी की ज़रूरत का 80 फ़ीसदी स्टोर कर इस्तेमाल किया जा सकता है. ज़रूरत आ गई है कि ‘Catch Water where it falls’. जिसे पानी चाहिए, उसे इसे बचाने के लिए काम करना होगा.

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First published: July 3, 2019, 6:40 PM IST
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