दो बार बहने के बाद भी बचा वह बच्चा... कई बार MLA, CM और MP जो बनना था उसे

पहली बार लखनऊ विधानसभा में पहुंचे निशंक को देखने के लिए भीड़ जमा हो गई थी क्योंकि उन्होंने यूपी में दो बार कैबिनेट मंत्री रहे शिवानन्द नौटियाल को हराया था.

Manish Kumar | News18 Uttarakhand
Updated: May 17, 2019, 2:48 PM IST
दो बार बहने के बाद भी बचा वह बच्चा... कई बार MLA, CM और MP जो बनना था उसे
पूर्व मुख्यमंत्री और हरिद्वार सांसद रमेश पोखरियाल निशंक
Manish Kumar
Manish Kumar | News18 Uttarakhand
Updated: May 17, 2019, 2:48 PM IST
विधायक तो बहुत बने लेकिन, उनका नाम लोगों के ज़ेहन में हमेशा के लिए बस जाता है जो विधायक बनने के साथ ही फेमस भी हो जाते हैं. रमेश पोखरियाल निशंक जब 28 साल की उम्र में पहली बार विधायक बनकर लखनऊ की विधानसभा में पहुंचे तो उन्हें देखने के लिए भीड़ जमा हो गई थी. कारण यह था कि निशंक ने एक ऐसा नेता को हराया था जिसका उत्तराखंड से यूपी तक दबदबा था. शिवानन्द नौटियाल को हराना मामूली बात नहीं थी. वह तब के धाकड़ नेता थे और यूपी सरकार में दो बार कैबिनेट मंत्री रह चुके थे. निशंक ने अपने पहले ही चुनाव में नौटियाल को कर्णप्रयाग से हराया था.

1991 के उस विधानसभा चुनाव से शुरु हुआ उनका राजनीतिक सफर मंत्री, मुख्यमंत्री रहने के साथ सांसद तक पहुंच गया है. इस दौरान वे छह बार विधायक चुने गये, उत्तराखण्ड के सीएम रहे और अब हरिद्वार से सांसद हैं. 30 साल के अपने चुनावी सफर में वह सिर्फ 2002 का उत्तराखण्ड का पहला चुनाव थलीसैंण से हारे.



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रमेश पोखरियाल निशंक का जीवन सफर पहाड़ सा रहा है. उनका परिवार पौड़ी जिले के पाबो ब्लॉक के पिनानी गांव में रहता था. पिता भरसार के सेब बागान में सरकारी माली थे. वे अकसर निशंक को कंधे पर बैठाकर अपने गांव से भरसार लाया करते थे. निशंक के पुराने सहयोगी डॉक्टर बेचैन कण्डियाल बताते हैं कि बचपन की सारी बातें निशंक को याद थीं. जब वह यूपी में पर्वतीय विकास मंत्री बने तो उन्होंने कहा था कि अपने पिता की कर्मस्थली भरसार को आगे बढ़ाना है. उसी दौरान भरसार के सेब बागान को उद्यानिकी महाविद्यालय का दर्जा मिला. वहां सेब की खेती के साथ पढ़ाई का भी काम शुरु हो गई.

निशंक के पिता जी उद्यान विभाग के मामूली मुलाज़िम थे. परिवार में पैसे का बहुत अभाव था. गांव के स्कूल से पांचवीं पास करने के बाद उन्हें हाईस्कूल तक की पढ़ाई के लिए बहुत कसरत और रिस्क उठाना पड़ा था. पढ़ाई पूरी करने के लिए उन्हें रोज 16 किलोमीटर का पैदल रास्ता पार करना पड़ता था जो घने जंगल, नदी नाले और जंगली जानवरों के खतरों से भरा पड़ा था.

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रमेश पोखरियाल निशंक (फ़ाइल फ़ोटो)


निशंक बताते हैं कि दमदेवल के जनता उच्चतर माध्यमिक विद्यालय जाते समय वह दो बार बरसाती नाले में बह गए थे. काफी दूर बहने के बाद लोगों ने उन्हें निकाला. एक तरह से उन्हें दोनों बार जीवनदान मिला. हालांकि दसवीं पास करने के बाद उनके परिवार के पास इतने भी पैसे नहीं थे कि उन्हें उच्च शिक्षा के लिए श्रीनगर या फिर देहरादून भेज सके. इस हालत में निशंक पढ़ाई के लिए हरिद्वार के आननंद आश्रम आ गए. चेतन ज्योति स्कूल में उन्होंने संस्कृत की शिक्षा लेनी शुरू की. इसके बाद ऋषिकेश से बीकॉम की पढ़ाई शुरु की लेकिन इसे बीच में ही छोड़ना पड़ा.जीवन के संघर्षों से ऊब रहे निशंक का इसी दौरान झुकाव आध्यात्म की तरफ भी बढ़ा और वह गंगोत्री की यात्रा पर निकल पड़े. यहीं से उनके जीवन में जबरदस्त मोड़ आया. उत्तरकाशी में उनकी भेंट हुई हरेन्द्र गुसाईं से जो तब वहां के शिशु मन्दिर में काम करते थे. गुसाईं ने निशंक को शिशु मन्दिर में पढ़ाने की सलाह दी. निशंक ने मान लिया और उनकी पहली तनख्वाह तय हुई 242 रुपये. साहित्य में चुकि उनकी रूचि बचपन से थी लिहाजा शिशु मंदिर में पढ़ने, पढ़ाने, लिखने और कमाने का मौका मिल गया. उत्तरकाशी के बाद वे पुरोला फिर देहरादून और जोशीमठ में शिशु मंदिर में प्रिंसिपल रहे.

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उत्तरकाशी में शिशु मंदिर ज्वाइन करने के साथ ही वे संघ का दामन थाम चुके थे. कई सालों तक पढ़ाने के बाद आखिरकार उन्होंने शिशु मंदिर से इस्तीफा दे दिया और पौड़ी चले आए. यहां उन्होंने अपनी प्रेस खोल ली. बैंक से लोन और अपने एक परिचित के घर से उन्होंने पहली शोध पत्रिका निकाली ‘नई चेतना’. इसके बाद 1984-85 में ‘सीमान्त वार्ता’ अखबार भी निकालना शुरु किया. यह अख़बार आज भी जिन्दा है.

उसी दौरान निशंक की पहचान एक उग्र और आंदोलनकारी पत्रकार के रूप में राज्य में सामने आई. तब पौड़ी के एक पत्रकार उमेश डोभाल की शराब माफियाओं ने हत्या कर दी. उनकी लाश तक नहीं मिली थी. डोभाल के लिए न्याय की मांग को लेकर निशंक ने ज़मीन पर और अपने अखबार के माध्यम से जबरदस्त संघर्ष किया. उन्हें राज्य स्तर पर पहली बार पहचान मिली.

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रमेश पोखरियाल निशंक (फ़ाइल फ़ोटो)


निशंक का सफर आगे बढ़ता रहा. इसी दौरान अटल बिहारी वाजपेयी पौड़ी के प्रवास पर आए और निशंक से उनकी मुलाकात हुई. वाजपेयी कवि थे और निशंक भी कविताएं लिखा करते थे. लिहाज़ा दोनों के मन मिलते देर नहीं लगी. निशंक भाजपा से जुड़ गए. इसी बीच अलग उत्तराखण्ड राज्य की मांग को लेकर बनाई गई उत्तरांचल प्रदेश संघर्ष समिति से वह जुड़े और उन्हें केन्द्रीय प्रवक्ता बनाया गया. यह भाजपा का ही एक विंग था.

निशंक के जीवन में अचानक बदलाव आया 1991 में, जब अटल बिहारी वाजपेयी ने बुलाकर यूपी विधानसभा का चुनाव कर्णप्रयाग से लड़ने को कहा. निशंक ने झिझकते हुए मना कर दिया. निशंक ने कहा कि वह तो प्रधानी का चुनाव भी लड़ने के लिए तैयार नहीं है लेकिन, वाजपेयी माने नहीं. आखिरकार निशंक ने अनमने ढ़ंग से चुनाव लड़ा और इसी चुनाव ने उन्हें एकाएक जमीन से उठाकर आसमान पर बैठा दिया.

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देश की सबसे बड़ी विधानसभा से वह 25 साल पुराने और दिग्गज नेता शिवानन्द नौटियाल को हराकर 28 साल की उम्र में विधायक बन गए. यूपी में कल्याण सिंह की सरकार बनी तो उन्हें सीधे पर्वतीय विकास मंत्रालय में कैबिनेट मंत्री बना दिया गया. विधानसभा के चुनाव दो साल बाद 1993 में फिर हो गए और निशंक फिर जीत गये. तीन साल बाद फिर 1996 में चुनाव हुए और निशंक फिर जीते.

इस बार राम प्रकाश गुप्ता की सरकार में वे संस्कृति और धर्मस्व में कैबिनेट मंत्री बनाए गए. निशंक इस कार्यकाल को याद करते हुए कहते हैं कि इस दौरान वह वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर के दो अन्य गुंबदों पर भी सोने की परत चढ़ाने के लिए प्रयासरत रहे. हालांकि यह काम अधूरा रह गया क्योंकि 2002 में अलग उत्तराखण्ड राज्य बन गया और वह यहां की राजनीति में आ गए.

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रमेश पोखरियाल निशंक (फ़ाइल फ़ोटो)


अलग राज्य बना तो तीन बार के विधायक और कैबिनेट मंत्री रहे निशंक को बड़ा ओहदा दिया गया. अंतरिम सरकार में कुल 12 विभाग उनके पास थे जिसमें वित्त, राजस्व और प्लानिंग जैसे अहम विभाग शामिल थे.

लेकिन, दस सालों से राजनीति में चमकते आ रहे निशंक का इंतज़ार एक बड़ी हार कर रही थी. दुर्भाग्य देखिए कि अविभाजित उत्तराखण्ड से तीन बार विधायक रहे निशंक को अलग उत्तराखण्ड की पहली विधानसभा में जगह नहीं मिल पाई. 2002 में उत्तराखण्ड विधानसभा का पहला चुनाव हुआ लेकिन, निशंक को मुंह की खानी पड़ी. वह थलीसैंण से कांग्रेस के गणेश गोदियाल से चुनाव हार गये और वह भी महज 997 वोटों के अंतर से.

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चुनावी राजनीति में निशंक को यह पहला बड़ा झटका था. कहते हैं न कि इतिहास खुद को दोहराता है. निशंक की हार भी वैसी ही थी जैसी उन्होंने तीन बार के विधायक शिवानन्द नौटियाल को अपने पहले चुनाव में दी थी. गणेश गोदियाल जैसे नए व्यक्ति ने निशंक जैसे तीन बार के विधायक को अचानक हरा दिया था.  मुम्बई से लौटे और थलीसैंण में बड़ी डेयरी चलाने वाली गणेश गोदियाल के निशंक के खिलाफ चुनाव लड़ने की भी अनोखी कहानी उत्तराखण्ड में प्रचलित है. लोग कहते हैं कि गोदियाल ने डेयरी तो खोली लेकिन उन्होंने उद्घाटन उन्होंने निशंक से नहीं करवाया. स्थानीय विधायक होने के नाते निशंक इसका बुरा मान गए और गोदियाल के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए डेयरी संचालन की सारी सुविधाएं बन्द करवा दीं. गोदियाल की डेयरी बंद हो गई तो उन्होंने भी निशंक के खिलाफ ताल ठोक दी और किस्मत देखिए कि निशंक हार गए.

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खैर उस चुनाव में तब कांग्रेस की सरकार बनी. पांच साल तक निशंक संघर्ष करते रहे और जल्द ही सत्ता से दूर रहने का उनका दौर खत्म हुआ. 2007 में वह फिर थलीसैंण से विधायक बन गए. इसी चुनाव ने उन्हें राजनीति का अब तक का सबसे बड़ा पद दिया. प्रदेश में भाजपा बहुमत में आई और सीएम बने बीसी खण्डूरी लेकिन, पांच साल कार्यकाल पूरा करने से पहले ही उन्हें हटाकर निशंक को सीएम बना दिया गया. हालांकि विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने तक निशंक भी सीएम नहीं रह सके और चुनाव से कुछ समय पहले फिर से बीसी खण्डूरी को सीएम बना दिया गया.

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हरिद्वार में चुनाव प्रचार के दौरान रमेश पोखरियाल निशंक (फ़ाइल फ़ोटो)


2012 के इस चुनाव में भाजपा हार गई लेकिन निशंक जीत गए. इस बार उन्होंने अपनी सीट बदल दी थी और वह देहरादून की डोईवाला विधानसभा से विधायक चुने गए थे. इसी सीट से मौजूदा सीएम त्रिवेन्द्र सिंह रावत विधायक हैं. दो साल तक निशंक ने डोईवाला का प्रतिनिधित्व किया लेकिन, 2014 में पार्टी ने उन्हें केन्द्र की राजनीति में शिफ्ट कर दिया. उन्हें 2014 का चुनाव हरिद्वार से लड़ने के लिए भेजा गया. मौका था निशंक के लिए सांसद बनने का और वह बने भी. हरिद्वार के अपने चुनाव को याद करते हुए निशंक बताते हैं कि मुस्लिम, दलित, जाट और गुर्जर बहुल इलाके से जीत दर्ज करना कोई आसान बात नहीं थी. इस बार फिर से वह हरिद्वार से मैदान में हैं.

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लेकिन, राजनीति के अलावा निशंक के बारे में जानने लायक और भी कई बातें हैं. राजनीति के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में भी खासे सक्रिय हैं. उनकी 60 से ज्यादा उनकी साहित्यिक रचनायें प्रकाशित हो चुकी हैं. इसमें उपन्यास, कविता और गीत संग्रह शामिल हैं. उनकी बेस्ट सेलर बुक ‘कृतघ्न’ रही है. निशंक बताते हैं कि 10-12 देशों में न सिर्फ़ उनकी लिखी किताबें पढ़ाई जा रही हैं बल्कि उन पर दस से ज्यादा पीएचडी भी की जा चुकी हैं. उन्हें उनकी रचनाओं के लिए मॉरीशस, युगांडा, भूटान, नेपाल, थाईलैंड और यूक्रेन में सम्मानित भी किया जा चुका है. वह गर्व करते हैं कि शायद ही देश का कोई ऐसा नेता हो जिसने राजनीति के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में ऐसी ऊंचाई पाई हो.

राजनीति में इतनी ऊंचाई छूने के बावजूद उनके परिवार में कोई भी राजनीतिक व्यक्ति अभी तक तो नहीं है. उनके भाई शशिधर पोखरियाल ऋषिकेश में रहते हैं और मंडी परिषद से रिटायर हैं. कुछ साल पहले कैंसर से उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई थई. तीन बेटियों में बड़ी आरुषि कथक नृत्यांगना हैं, श्रेयसी सेना में हैं और सबसे छोटी विदुषी लॉ की पढ़ाई करने के बाद इंटर्नशिप कर रही हैं.

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