मासूम से रेपः पुलिसकर्मियों पर भी दर्ज होगा पोक्सो का मामला? 15 दिन बाद चलेगा पता

बच्ची की मां ने उत्तराखंड के डीजीपी को तहरीर दी है मामले के आईओ ने सवर्ण होने की वजह से सही जांच नहीं की और आरोपी को फ़ायदा पहुंचाने की कोशिश की.

Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: June 4, 2019, 2:23 PM IST
मासूम से रेपः पुलिसकर्मियों पर भी दर्ज होगा पोक्सो का मामला? 15 दिन बाद चलेगा पता
महिला और बाल विकास मंत्री रेखा आर्य पीड़ित बच्ची का हालचाल पूछती हुईं. बीजेपी विधायक खजानदास और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह भी दून अस्पताल पहुंचे थे.
Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: June 4, 2019, 2:23 PM IST
उत्तराखंड को शर्मसार कर देने वाले और राज्य की उच्च जातियों के प्रभुत्व वाली सामाजिक सरंचना की पोल खोलने वाली जौनपुर बालिका रेप केस ने राज्य की मित्र पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. पुलिसकर्मी न सिर्फ़ 9 साल की मासूम को तीन दिन तक बेवजह धक्के खिलाते रहे बल्कि उसे बलात्कार करने के अभियुक्त के साथ कई घंटे तक गाड़ी में सफ़र भी करवाया जिससे पहले ही दहशतज़दा बच्ची की हालत ख़राब हो गई. अनजाने कारणों ने सिर्फ़ 9 साल की बच्ची को सरकारी डॉक्टर ने चार घंटे में स्वस्थ बताकर पुलिस के साथ रवाना कर दिया. अब भी न पुलिस, न स्वास्थ्य विभाग इस मामले में अपेक्षित संवेदनशीलता दिखा रहा है.

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सबसे पहले इस मामले में क्या हुआ, वह जान लेते हैं...

शर्मनाक घटनाक्रम


  • 30 मई को सुबह करीब 10 बजे जब बच्ची घर में अकेली थी पड़ोसी विपिन पंवार ने उसके साथ बलात्कार किया और फिर फ़रार हो गया. बच्ची की मां खेत से घर लौटी तो बेटी की हालत देखकर घबरा गई. उसके पहुंचने से पहले ही बच्ची की चीखें सुनकर उसके साथ हुई ज़्यादती के बारे में गांव वालों को पता चल गया था.

  • पहले गांव वाले पंचायत कर मामले को वहीं सुलझाने के लिए दबाव बनाते रहे. लेकिन बच्ची की मां ने यह कहकर उनकी बात सुनने से इनकार कर दिया कि पहले भी उनकी एक बच्ची को ऐसे ही मारा जा चुका है (इस मामले में लगातार पीड़ित परिवार के साथ बने रहे राष्ट्रीय सेवा दल के जबर सिंह के अनुसार चार साल पहले बच्ची की चचेरी बहन की गैंगरेप के बाद हत्या कर दी गई थी और मामले को गांव में ही दबा दिया गया था).

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  • इसके बाद बच्ची की मां अपनी बेढाल लहुलुहान बेटी को लेकर 8 किलोमीटर दूर कैंपटी चौकी के लिए निकली. ग्रामीणों ने एक बार फिर उसे रास्ते में रोकने की कोशिश की लेकिन मां नहीं मानी. फिर उनके एक रिश्तेदार मोटरसाइकिल लेकर पहुंचे और उन्होंने नैनबाग चौकी में जाकर एफ़आईआर की. पुलिस ने एससी एसटी एक्ट, धारा 376 आईपीसी के साथ ही पोक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया और फुरती दिखाते हुए आरोपी को गिरफ़्तार कर लिया.

  • उधर बच्ची की हालत देख उसे मसूरी सिविल अस्पताल से देहरादून दून अस्पताल रेफ़र कर दिया गया. पुलिस बच्ची को लेकर सुबह चार बजे, यानि वारदात के 18 घंटे बाद, दून महिला अस्पताल पहुंची. यहां से बदहाल मासूम को 11 बजे डिस्चार्ज कर दिया गया. बच्ची की मां का कहना है कि अस्पताल में उसे उचित इलाज नहीं मिला.

  • कैंपटी थाना पुलिस ने संदिग्ध कारणों से बच्ची और उसकी मां को पिछले दरवाज़े से निकाला और आरोपी के साथ एक ही गाड़ी में बैठाकर मैजिस्ट्रेटे के बयान दर्ज करवाने के लिए निकल गई. पुलिसकर्मियों की हरकत इसलिए भी संदिग्ध है क्योंकि मुख्य दरवाज़े के बाहर बच्ची का मामा और दूसरे रिश्तेदार खड़े थे. मसूरी पहुंचकर पुलिसकर्मियों ने परिजनों को बताया कि वह कहां तक पहुंच गए हैं.

  • पुलिसकर्मियों में कैंपटी थाने के एक एसआई के साथ दो महिला पुलिसकर्मी थे. पुलिसकर्मी उन्हें सीधे मैजिस्ट्रेट के पास नहीं ले गए और दून से 150 किलोमीटर दूर उनके गांव ले गए. वहां से सुबह 5 बजे मैजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज करवाने के लिए टिहरी ले जाने के लिए कैंपटी थाने लाए. बच्ची के पिता और मामा ने साथ आने को कहा तो उन्हें यह कहकर साफ़ मना कर दिया कि उनकी ज़रूरत नहीं है.

  • कैंपटी थाने से पुलिस ने उसी गाड़ी में अभियुक्त को भी बैठा लिया. अभियुक्त लगातार बच्ची को घूरता रहा जिससे पहले ही डरी हुई बच्ची इतनी दहशत में आ गई. और उसे बहुत तेज़ बुखार भी हो गया.

  • फिर पुलिस इन दोनों को लेकर रुकते-रुकाते 3 बजे टिहरी में मैजिस्ट्रेट के पास पहुंची, जहां बच्ची मैजिस्ट्रेट के सामने बेहोश हो गई. इस पर मैजिस्ट्रेट ने बच्ची के बयान लेने से इनकार कर दिया. इसके बाद भी पुलिस बच्ची मां-बेटी को लेकर रात को 11 बजे तक घर नहीं पहुंची. ज़बर सिंह और अन्य लोगों ने कैंपटी थाने में जाकर हंगामा किया तो रात को एक बजे पुलिस बच्ची और उसकी मां को लेकर घर पहुंची.

  • सुबह चार बजे ज़बर सिंह को बच्ची के पिता का फ़ोन आया जिन्होंने बताया कि उसकी तबियत बहुत ख़राब है और वह न उठ पा रही है और न बोल पा रही है. फिर यह लोग बच्ची को लेकर पहले मसूरी और फिर वहां से दून अस्पताल के लिए रवाना हुए लेकिन मसूरी और कैंपटी के जाम में फंसते हुए शाम पांच बजे पहुंचे.


पुलिसकर्मियों पर मां के आरोप 

बच्ची की मां ने उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक को जो तहरीर दी है उसमें उन्होंने आरोप लगाए कि मामले की जांच कर रहे आईओ, (Investigating Officer) उत्तम सिंह जिमिवाल ने सवर्ण होने की वजह से सही जांच नहीं की और आरोपी को फ़ायदा पहुंचाने की कोशिश की. उन्होंने पीड़िता के खून लगे कपड़ों को कब्ज़े में नहीं लिया.

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बच्ची की मां ने यह भी आरोप लगाए कि दून महिला अस्पताल से आईओ ही बच्ची को जबरन डिस्चार्ज करवाकर ले गए थे. अस्पताल से गांव तक के ज़बरदस्ती के सफ़र की वजह से बच्ची की तबियत और ख़राब हो गई इसके बावजूद पुलिस ने फिर सुबह 5 बजे बच्ची को उठाया और उसके 164 के बयान दर्ज करवाने के लिए पहले कैंपटी थाने, फिर टिहरी ले गई. अभियुक्त को भी जान-बूझकर गाड़ी में साथ बैठाया गया ताकि वह भयभीत हो जाए. इसके अलावा कोर्ट में भी बच्ची को अभियुक्त के साथ ही रखा गया.

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पुलिस महानिदेशक को की शिकायत में बच्ची की मां ने आईओ उत्तम सिंह जिमिवाल पर जानबूझकर पर बच्ची को शारीरिक और मानसिक रूप से क्षति पहुंचाकर अभियुक्त को फ़ायदा पहुंचाने का आरोप लगाया है. उन्होंने इसे अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध बताते हुए जिमिवाल के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग भी की है.

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इस पूरे केस में स्थानीय पुलिसकर्मियों की भूमिका को ग़लत मानते हुए नरेंद्र नगर के सीओ और इस केस के आईओ उत्तम सिंह जिमिवाल का ट्रांस्फ़र पीएसी में कर दिया गया है. डीजी (कानून-व्यवस्था) अशोक कुमार के अनुसार मामले की जांच एडिशनल एसपी स्वप्न किशोर को सौंप दी गई है. वही यह जांच भी करेंगे के इस मामले में पुलिस की भूमिका क्या रही?

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वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्रशेखर तिवारी कहते हैं कि पुलिस का पीड़ित बच्ची के 164 के बयान दर्ज करवाने के नाम पर टिहरी लेकर जाना पोक्सो एक्ट का उल्लंघन है. एक्ट में साफ़ लिखा है कि जहां पीड़िता रहती है या जहां वह चाहे उसके बयान सब-इंस्पेक्टर रैंक से ऊपर की महिला पुलिस अधिकारी को रिकॉर्ड करने चाहिए थे. इसके साथ ही 164 के तहत बयान वारदात के न्याय क्षेत्र में पड़ने वाले मैजिस्ट्रेट ही लें यह ज़रूरी नहीं है, कोई भी मैजिस्ट्रेट पीड़िता के बयान दर्ज कर सकता है और उसे मामले की सुनवाई करने वाले मैजिस्ट्रेट को दिया जा सकता है.
वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्रशेखर तिवारी के अनुसार ऐसी आपराधिक ग़लती या जानबूझकर एक्ट का उल्लंघन करने वालों के अधिकारी के ख़िलाफ़ भी केस दर्ज होना चाहिए. ऐसे अधिकारी को छह महीने से एक साल तक की जेल हो सकती है.

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इस सवाल के जवाब में डीजी (कानून-व्यवस्था) अशोक कुमार कहते हैं कि पुलिस की आंतरिक जांच रिपोर्ट के बाद ही कार्रवाई की जाएगी. वह इस संभावना से इनकार नहीं करते कि दोषी पाए जाने पर पुलिसकर्मियों पर पोक्सो एक्ट के तहत मुक़दमा दर्ज हो सकता है. अशोक कुमार के अनुसार जांच रिपोर्ट 15 दिन में मिल जाएगी.

मासूम के अपराधी… 

इस मामले ने उत्तराखंड की कानून-व्यवस्था, सामाजिक ढांचे, स्वास्थ्य व्यवस्था सबको कटघरे में खड़ा कर दिया है. सवाल यह है कि उस मासूम के अपराधी कौन-कौन हैं? वह पुलिसकर्मी जो नौ साल की बलात्कार पीड़ित बच्ची को जानबूझकर दिन भर पहाड़ी रास्तों में घुमाते रहे? वह डॉक्टर जिन्होंने मासूम की हालत देखकर भी पुलिस के साथ जाने दिया? वह समाज जो इस घिनौने अपराध को करने वाले को बचाने की कोशिश में लगा रहा? और वह सिस्टम जो ऐसे मामलों को दबाए जाने के लिए आधार देता है.

दून अस्पताल में पीड़िता की हालत में अब कुछ सुधार तो हो रहा है लेकिन सवाल यह है कि उसे जो मानसिक आघात लगा है क्या वह कभी उससे उबर पाएगी?

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First published: June 4, 2019, 12:01 PM IST
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