Kedarnath 2013: 7 हजार लोगों को निगल गई थी आपदा, जहरीली घास खाने से भी हुई थी भूख से बिलखते लोगों की मौत

आपदाओं को रोकना मुश्किल है लेकिन आपदा प्रबंधन मजबूत हो तो लोगों की जान बचाई जा सकती है. (फाइल फोटो)

आपदाओं को रोकना मुश्किल है लेकिन आपदा प्रबंधन मजबूत हो तो लोगों की जान बचाई जा सकती है. (फाइल फोटो)

केदारनाथ (Kedarnath) में आई बाढ़ का मंजर इतना भयंकर था कि आपदा में 7000 से ज्यादा लोग या तो मारे गए या फिर लापता हो गए थे.

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चंडीगढ. उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं (Natural disasters in uttarakhand) का कहर आम बात हो गई है. जब भी इस पहाड़ी प्रदेश में कोई भी आपदा होती है तो उसे जून 2013 में केदारनाथ में आई भयंकर आपदा से जोड़ कर देखा जाता है. हर तबाही के बाद आपदा प्रबंधन में लापरवाही का ठिकरा राज्य सरकार के सिर पर फोड़ा जाता है. केदारनाथ (Kedarnath) में आई बाढ़ का मंजर इतना भयंकर था कि आपदा में 7000 से ज्यादा लोग या तो मारे गए या फिर लापता हो गए थे. जिनका आज तक पता नहीं चल पाया. उत्तराखंड सरकार के अधिकारी भी इस बात को मानते हैं. बीबीसी के पत्रकार नितिन श्रीवास्तव की एक रिपोर्ट के मुताबिक हादसे के बाद पूरे इलाके में भूखमरी के हालात पैदा गए थे. भूखे प्यासे लोगों ने पहाड़ों में जाकर घास खानी शुरू कर दी थी, जो जहरीली निकली और कई लोगों की जान इस तरह भी निकल गई.

हादसे के वक्त घटना स्थल पर थे 20 हजार लोग माजूद

श्रीवास्तव ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि केदारनाथ मंदिर के चबूतरे की सीढ़ियों से नीचे का पूरा बाज़ार और धर्मशालाएं सब कुछ बाढ़ के मलबे से पट गया था. मंदिर के ठीक सामने एक नई ज़मीन आ गई थी. जो पुरानी ज़मीन से दस से ग्यारह फीट ऊंची थी. लोगों का मानना है कि उस दिन यहां दस से बीस हजार लोग मौजूद थे. यहां की परिस्थिति को देखकर कल्पना करना भी मुश्किल था कि नई जमीन के मलबे के नीचे कितने लोग दब गए होंगे. केदारनाथ में उतरने के बाद चारों तरफ सिर्फ़ तबाही का मंज़र दिखाई दे रहा था. लोग भूख-प्यास से तड़प रहे थे.

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चेताने के बाद भी सोई रही सरकार

2015 में कैग (Comptroller and Auditor General of India) की रिपोर्ट में कहा गया है जून 2013 की आपदा के लिए उत्तराखंड सरकार को जिम्मेदार ठहराया गया था. रिपोर्ट में कहा गया था कि आपदा से पहले सरकार आपदा प्रबंधन को लागू करने में सक्षम नहीं थी. राज्य और जिला स्तर पर आपातकालीन परिचालन केंद्रों पर कर्मचारियों और आवश्यक उपकरणों की कमी थी. सरकार के पास चार धाम यात्रा के तीर्थयात्रियों के पंजीकरण का कोई तंत्र नहीं था.रिपोर्ट में सुझाव दिया गया था कि कि प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए राज्य सरकार को तत्काल आपदा प्रबंधन नीति बनानी चाहिए. लेकिन सरकार ने इसके प्रति गंभीरता नहीं दिखाई. यह भी सत्य है कि आपदाओं को रोकना मुश्किल है लेकिन आपदा प्रबंधन मजबूत हो तो लोगों की जान बचाई जा सकती है.
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