उत्तराखंड: पर्यावरण की दुर्गति पर रस्किन बॉंड की ​कविता 'देहरादून का मर्सिया' चर्चा में

रस्किन बॉंड ने सोशल मीडिया पर हाल में इस तस्वीर के साथ अपनी कविता साझा की.

रस्किन बॉंड ने सोशल मीडिया पर हाल में इस तस्वीर के साथ अपनी कविता साझा की.

Uttarakhand : अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक पुराने चर्चित बुकस्टोर में कॉफी पीते हुए अपनी तस्वीर के साथ मशहूर लेखक ने अपनी एक ​कविता भी पर्यावरण दिवस के मौके पर पोस्ट की थी. न्यूज़18 पर हिंदी में पढ़िए बॉंड की अंग्रेज़ी कविता.

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देहरादून. उत्तराखंड के पहाड़ी इलाके मसूरी की पहचान रहे अंग्रेज़ी भाषा के मशहूर और सम्मानित लेखक रस्किन बॉंड इन दिनों अपनी ताज़ा कविता को लेकर चर्चा में हैं. भारत में कहानी और बाल साहित्य के लेखकों में बेहद इज्जत के साथ कोट किए जाने वाले बॉंड कभी कभी कविता भी रचते हैं और इन दिनों जिस कविता (Dirge of Dehradun) की चर्चा है, वह उन्होंने उत्तराखंड के पर्यावरण को होते नुकसान को लेकर लिखी है. खास तौर से देहरादून और मसूरी के प्राकृतिक सौंदर्य को निर्माण और विकास के नाम पर की गई दुर्गति को इस कविता में बॉंड ने उकेरा है.

देहरादून और मसूरी को उत्तराखंड में एक ज़माने में 'खुशी के जुड़वां शहर' कहा जाता था. खबरों की मानें तो यहां लगातार आबादी का बढ़ना, पर्यावरण की कीमत पर इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास और बड़े बड़े भवनों का खड़ा होना साफ कारण रहा है कि यहां वेस्ट मैनेजमेंट बदतर हुआ है और जलस्रोतों को भारी नुकसान पहुंचा है. पिछले कुछ ही समय में ग्लेशियर से लेकर बादलों के फटने तक से भारी आपदाएं भी उत्तराखंड के प्राकृतिक असंतुलन की कहानी कहती हैं.

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ट्विटर समेत सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही है रस्किन बॉंड की कविता.

अपने सोशल मीडिया पेज पर 87 वर्षीय लेखक बॉंड ने अपने दोस्त उपेंद्र के साथ एक तस्वीर साझा करते हुए बताया कि वो हाल में, विश्व पर्यावरण दिवस पर देहरादून में स्थित भारत के सबसे पुराने बुक स्टोर्स में से एक में बैठे हुए थे और ताज़ा कविता पर चर्चा कर रहे थे. इस पोस्ट के बाद बॉंड की इस कविता को सोशल मीडिया पर काफी शेयर किया जा रहा है. बॉंड की अंग्रेज़ी कविता का हिन्दी अनुवाद यहां सिर्फ न्यूज़18 पर पढ़िए.

देहरादून का मर्सिया

मुझे ताज्जुब है वो हरी घास कहां खो गई!



नये ज़माने के सीमेंट में पूरी दफ़्न हो गई.

मुझे ताज्जुब है वो पंछी कहां उड़ गए!

नये घोंसलों की खोज में कहीं मुड़ गए.

मुझे ताज्जुब है वो पैदल रास्ते कहां चले गए!

बरख़ुरदार! ठीक तुम्हारी कार के तले गए.

मुझे ताज्जुब है वो पुराने साथी कहां हैं!

अस्पताल वाले जानते हों, वो जहां हैं.

मेरी आंखों के सामने इतनी जल्दी ये क्या बदल गया?

लाखों मक्खियां, ये कूड़ा कचरा पल गया.

क्या यही वो मुक़ाम है, जिसका है गुणगान?

गपशप में तुमने किया इसका बड़ा बखान!

लेकिन... जब तक मैं यह सब जान पाया,

यही हो चुका था नसीब का सामान.

इस कविता को अपने अकाउंट से पोस्ट करने के बाद बॉंड ने अपने प्रशंसकों और पाठकों को शुभकामनाएं देकर उन्हें प्रकृति के साथ जुड़े रहने को भी कहा.

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