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आयुर्वेदिक वैज्ञानिकों ने संजीवनी बूटी को खोजने का किया दावा

आयुर्वेदिक वैज्ञानिकों ने संजीवनी बूटी को खोजने का किया दावा

मायाराम उनियाल, वरिष्ठ शोधकर्ता का कहना है कि अभी चार तरह की संजीवनी की खोज की गई है. हिमशिखरों में पाई जाने वाली संजीवनी को लेकर फिलहाल शोधकर्ताओं में आम राय नहीं है और शास्त्रों में जिस संजीवनी का उल्लेख किया गया है.

मायाराम उनियाल, वरिष्ठ शोधकर्ता का कहना है कि अभी चार तरह की संजीवनी की खोज की गई है. हिमशिखरों में पाई जाने वाली संजीवनी को लेकर फिलहाल शोधकर्ताओं में आम राय नहीं है और शास्त्रों में जिस संजीवनी का उल्लेख किया गया है.

मायाराम उनियाल, वरिष्ठ शोधकर्ता का कहना है कि अभी चार तरह की संजीवनी की खोज की गई है. हिमशिखरों में पाई जाने वाली संजीवनी को लेकर फिलहाल शोधकर्ताओं में आम राय नहीं है और शास्त्रों में जिस संजीवनी का उल्लेख किया गया है.

    उत्तराखंड के दून विश्वविद्यालय में एक दिवसीय वैज्ञानिक आयुर्वेदिक सेमीनार का आयोजन किया गया, जिसमें कई आयुर्वेदिक वैज्ञानिक और भारी संख्या में छात्र छात्राओं ने हिस्सा लिया.

    इस सेमीनार में हिमालय क्षेत्रों की जड़ी बूटियों के बारे में चर्चा गई. जड़ी बूटी संजीवनी के बारे में भी चर्चा की.

    फिलहाल अभी संजीवनी की पहचान को लेकर आयुर्वेदिक खोजकर्ता किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे है. उनका कहना है कि अभी आयुर्वेद विज्ञान में बहुत कुछ रिसर्च करने की जरुरत है.

    मायाराम उनियाल, वरिष्ठ शोधकर्ता का कहना है कि अभी चार तरह की संजीवनी की खोज की गई है. हिमशिखरों में पाई जाने वाली संजीवनी को लेकर फिलहाल शोधकर्ताओं में आम राय नहीं है और शास्त्रों में जिस संजीवनी का उल्लेख किया गया है उसका अभी कोई वैज्ञानिक आधार नहीं मिल पाया है कि जिस संजीवनी के बारे में रामायण में जिक्र किया गया है क्या वाकई वही संजीवनी आज भी हिमशिखरों में पाई जाती है.

    अगर हां तो उसका क्या आधार है. क्या वाकई उसकी पहचान हो पाई है. दरअसल, पिछले 35 सालों से संजीवनी के साथ कई दूसरी दुर्लभ जड़ी बूटियों के बारे में उन्होंने रिसर्च की है. साथ ही कई आयुर्वेदिक एवं दुर्लभ जड़ी बूटियों का रिसर्च किया है.

    उनका कहना है कि औषधीनां पराभूमि हिमवान शैलसत्तम: (चरक) यानी आयुर्वेदिक औषधियों के लिए हिम क्षेत्र सबसे उपयुक्त स्थान है. फिलहाल जिस तरह से आज समाज में तरह तरह की गंभीर बीमारियां जन्म ले रही हैं ऐसे में एलोपैथिक दवाओं के साइड इफेक्ट से बचने के लिए लोग आयुर्वेद दवाओं को लेना बेहतर समझ रहे हैं.

    ऐसे में आयुर्वेदिक रिसर्च को और बेहतर बनाने की जरुरत है, जिससे आम लोगों को कारगर और बिना साइट इफेक्ट के आयुर्वेदिक दवाओं मिल सके.

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