दारू नहीं ज़रूरी... सरकार चाहे तो उसके पास हैं पैसा जुटाने के ये विकल्प

पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी ने तो पैसे के लिए शराब पर निर्भरता को उत्तराखंड के लिए आत्महत्या तक बता दिया है.

Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: July 18, 2019, 6:37 PM IST
दारू नहीं ज़रूरी... सरकार चाहे तो उसके पास हैं पैसा जुटाने के ये विकल्प
ऋषिकेश के ढालवाला में शराब की दुकान खोले जाने का विरोध करती महिलाएं. (फ़ाइल फ़ोटो) प्रदेश भर में शराब की दुकानें खोले जाने का जमकर विरोध किया गया, विशेषकर महिलाओं द्वारा.
Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: July 18, 2019, 6:37 PM IST
देवप्रयाग में शराब फ़ैक्ट्री खोले जाने को लेकर बवाल मचा हुआ है. वह स्थान जहां अलकनंदा और भागीरथी मिलकर गंगा बनाती हैं, वहां शराब फ़ैक्ट्री खोले जाने के ख़िलाफ़ संत समाज और हिंदूवादी संगठन सड़कों पर उतर रहे हैं. ढाई साल में पहली बार बीजेपी सरकार के किसी मंत्री के खिलाफ़ किसी हिंदूवादी संगठन ने प्रदर्शन किया है तो बीजेपी के वरिष्ठ नेता भी इस फ़ैसले का समर्थन नहीं कर पा रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी ने तो पैसे के लिए शराब पर निर्भरता को उत्तराखंड के लिए आत्महत्या तक बता दिया है.

VIDEO : देवभूमि में शराब फैक्ट्री के विरोध में साधु-संतों का प्रदर्शन

ऐसे में सवाल उठता है कि बीजेपी सरकार शराब बेचने-बनाने के लिए इतनी बेचैन क्यों है? यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है कि बीते दो साल में शराब की नई-नई दुकानें खोली गई हैं जिनका स्थानीय लोगों ने जमकर विरोध किया है. शराब दुकानों के विरोध में कई महिलाओं पर केस दर्ज किए गए हैं.

‘शराब पिलवाकर ज़मीन बिकवाने की राह पर’

वरिष्ठ पत्रकार दिनेश जुयाल कहते हैं कि यह विडंबना ही है कि जिस उत्तराखंड में नशे के विरोध में नशा नहीं, रोज़गार दो जैसे आंदोलन हुए हैं वहां सरकार रोज़गार देने के नाम पर शराब की फ़ैक्ट्री खुलवा रही है. वह कहते हैं कि हाड़ के गांवों में, शहर के गांवों में बहुत अंतर है. पहाड़ में लोगों के पास पैसे नहीं हैं, पर्चेंज़िंग पावर नहीं है. ऐसे में अगर उसे दारू का चस्का लगा दिया जाएगा तो वह बर्बाद हो जाएगा. पहाड़ में वैसे भी रोज़गार नहीं है तो ऐसे में क्या होगा? पैसा है नहीं और शराब पीनी है तो आदमी ज़मीन बेचेगा. इस सरकार ने ज़मीन खरीद से रोक हटाकर पहले ही यह इंतज़ाम भी कर दिया है कि पहाड़ के आदमी के पास ज़मीन न रहे.

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जुयाल कहते हैं कि आपके पास टूरिज़्म कमाई का एक बड़ा ज़रिया है. आप वहां शराब बेचिए. अच्छी शराब बेचिए, महंगी शराब बेचिए. दुनिया के जितने भी देशों में टूरिज़्म इंडस्ट्री की तरह काम कर रहा है वहां देखिए, उनसे सीखिए. वह अपने लोगों को शराब बेचकर पैसा नहीं कमाते हैं जो पर्यटक मनोरंजन के लिए आ रहा है, उसके लिए इंतज़ाम किए जाते हैं.
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‘बस भाषण देना, मौज करना सरकार का काम नहीं’

नेहरु जी ने 1956 में कहा था कि पहाड़ के पास तो वाइट गोल्ड (बर्फ़) है. हमने इस वाइट गोल्ड को बेचने के लिए कुछ नहीं किया. इस टूरिस्ट सीज़न में भी हर जगह जाम-जाम हो गया और सरकार इतनी असहाय दिखी कि पर्यटन मंत्री और मुख्यमंत्री ने कहा कि हम क्या कर सकते हैं हमारे पास इतने ही संसाधन हैं. ऐसा लगता है कि सरकार का काम प्लान करना, मैनेज करना नहीं है बस भाषण देना और चुनाव जीतकर मौज करना है. जो टूरिस्ट प्लेस हैं उनमें बेहतर इतंज़ाम करने के बारे में काम करना चाहिए.

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गढ़वाल विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के विभागाध्यक्ष एमसी सती कहते हैं कि रेवेन्यू के लिए शराब पर निर्भर रहने की ज़रूरत नहीं है. सरकार चाहे तो शराब से आने वाला रेवेन्यू आसानी से दूसरे संसाधनों का इस्तेमाल कर जुटा सकती है लेकिन इसके लिए इच्छाशक्ति और दूरदृष्टि चाहिए होगी. उत्तराखंड में संसाधनों का समुचित प्रयोग नहीं किया जा रहा है.

‘प्राकृतिक संसाधनों से धनी प्रदेश’

प्राकृतिक संसाधनों से उत्तराखंड धनी है. किसी प्रदेश में ऐसे वन और जल संसाधन नहीं हैं जैसे उत्तराखंड के पास हैं लेकिन सरकार इनका ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पा रही है. शराब से रेवेन्यू सरकार के लिए कमाई का सबसे आसान रास्ता है. दूरदृष्टि और सही योजना के अभाव में सरकार की निर्भरता इस पर इतनी बढ़ गई है कि बजट में यह राजस्व जुटाने का सबसे बड़ा हिस्सा बन गया है.

ये हैं शराब के विकल्प....

प्रोफ़ेसर सती के अनुसार शराब से मिलने वाले राजस्व को पर्यटन, खनन और पर्यावरण सरंक्षण के लिए केंद्रीय सहायता से पूरा किया जा सकता है.

पर्यटनः 71 फ़ीसदी वन क्षेत्र वाले उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों की ख़ूबसूरती हमेशा से पर्यटकों को आकर्षित करती रही है लेकिन इस साल पर्यटन सीज़न में सभी पर्यटक स्थलों से जाम की ख़बरें आ रही थीं और पर्यटन मंत्री, मुख्यमंत्री तक ने संसाधनों की कमी की बात स्वीकार की.

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प्रोफ़ेसर सती कहते हैं कि पर्यटक तो यहां चार-पांच दिन रुकना चाहते हैं लेकिन आधारभूत सरंचना की कमी है. अगर राज्य में अच्छी सड़कें हों, जीएमवीएन-केएमवीएन के अच्छे गेस्ट हाउस हों, हैलिकॉप्टर सेवा सुलभ हो, गौरीकुंड से केदारनाथ तक रोप-वे हो तो पर्यटन आय का बहुत अच्छा संसाधन बन सकता है. और ऐसा नहीं है कि इसके लिए पैसा नहीं मिलेगा. सरकार चाहे तो विश्व बैंक, एडीबी, पीपीपी जैसे कई ज़रिए उसके पास हैं जहां से वह आधारभूत सरंचना के विकास के लिए संसाधन जुटा सकती है.

खननः उत्तराखंड में छोटी-बड़ी 1000 नदियां बहती हैं. इनमें खनन से ही इतनी कमाई हो सकती है कि आपके बहुत से खर्च पूरे हो जाएं. लेकिन खनन को लेकर कोई पारदर्शी नीति है नहीं इसलिए जहां खनन हो रहा है वहां खनन माफ़िया है. एक ट्रक दिखाकर 100 ट्रक निकाल दिए जाते हैं. हमारी नदियों में खनन का इतना संसाधन है कि पूरे देश की ज़रूरत पूरी की जा सकती है लेकिन इसके लिए पारदर्शी नीति बनानी होगी.

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माउंटेन इकोनॉमीः पहाड़ी क्षेत्रों का अर्थशास्त्र ही अलग होता है. अगर हमारे पास इतने विशाल वनक्षेत्र हैं तो उनका, उनसे मिलने वाली ऑक्सीजन का फ़ायदा तो पूरे देश को हो रहा है. जो नदियां यहां से निकल रही हैं उनका पानी तो पूरे देश को मिल रहा है. लेकिन इनके एवज में उत्तराखंड को क्या मिल रहा है. तो यह जो हिडन इकोनॉमी या छुपा हुआ अर्थशास्त्र है इसे सामने लाना होगा. बताना होगा कि हमारे राज्य में 71 फ़ीसदी वन क्षेत्र है जिसमें कुछ नहीं किया जा सकता. इतने क्षेत्र में नदियां बहती हैं जिनका फ़ायदा पूरे देश को मिल रहा है. राज्य सरकार को इस दिशा में कोशिश करनी होगी कि इसके एवज में केंद्र से कुछ पैसा आवंटित करवाए. जिस ज़िले में जितना ज़्यादा प्राकृतिक संसाधन है उसे उतना आवंटन किए जाने की बात हो सकती है. इसे लेकर आपको एक नीति बनानी होगी.

प्रोफ़ेसर सती कहते हैं कि ज़रूरत है कि राज्य सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रहीं और ईज़ी मनी यानि ऐसे उपाय, जिनसे आसानी से उगाही की जा सकती है, उन्हें छोड़े.

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First published: July 18, 2019, 6:02 PM IST
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