उत्‍तराखंड में कब लगेगी इस 'खूनी खेल' पर लगाम?

उत्तराखंड पुलिस ने भी बढ़ते हादसों में कमी लाने के लिए अभियान चलाया, जिसमें जनवरी से जुलाई के बीच 8 हजार 252 ओवरलोडिंग वाहनों के चालान किये गए.

Avnish Pal | News18 Uttarakhand
Updated: August 6, 2019, 11:45 PM IST
उत्‍तराखंड में कब लगेगी इस 'खूनी खेल' पर लगाम?
सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी खूनी खेल पर नहीं लग रही है लगाम.
Avnish Pal | News18 Uttarakhand
Updated: August 6, 2019, 11:45 PM IST
सड़कों पर दौड़ रहे तेज रफ्तार और ओवरलोडिंग डंपर लोगों के लिए मौत लेकर घूम रहे हैं. जबकि आये दिन होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में अब तक ओवरलोडिंग और तेज रफ्तार ही मुख्य वजह रही है. बावजूद इसके कोई सबक लेने को तैयार नहीं है. सड़कों पर बेलागम दौड़ने वाले ट्रक और डंपर की चपेट में आने से अब तक कई परिवारों के चिराग बुझ चुके हैं, तो कई बच्चें अनाथ हो गए हैं. ये दुर्घटनाएं उन सड़कों पर ज्यादा हो रही है, जहां से खनन से लदे डंपरों का आवागमन ज्यादा रहता है.

2019 में जुलाई तक हए सड़क हादसों के आंकड़े
प्रदेश भर में इस साल जनवरी से जुलाई तक कुल 832 सड़क दुर्घटनाएं हुई, जिसमें 903 लोग घायल हुए. जबकि 512 लोगों ने अपनी जान गंवाई है, वही सड़क हादसों में सबसे ऊपर उधमसिंह नगर है, जहां बीते 6 महीनों में 226 दुर्घटनाओं में 138 लोगों की मौत और 221 घायल हुए. दूसरे नंबर पर देहरादून है जहां 191 हादसे हुए और 99 लोगों को जान गंवानी पड़ी. इसी तरह तीसरे नंबर पर हरिद्वार और चौथे नंबर पर नैनीताल है.

पुलिस की कार्यवाही चालान तक सीमित

उत्तराखंड पुलिस ने भी बढ़ते हादसों में कमी लाने के लिए अभियान चलाया, जिसमें जनवरी से जुलाई के बीच 8 हजार 252 ओवरलोडिंग वाहनों के चालान किये गए. ये आंकड़े महज सात महीनों के ही हैं, जिसमे हजारों की संख्या में चालान काटे जा चुके हैं. इसके बाद भी चालक ओवरलोडिंग और तेज रफ्तार में गाड़ी चलाने से बाज नहीं आते. यही वजह है कि सड़क हादसों में कमी आने की बजाए दिन ब दिन जान गंवाने वालों के आंकड़ो में इजाफा हो रहा है और पुलिस सिर्फ चालाना कार्यवाही तक ही सीमित है.

परिवहन विभाग की भी लापरवाही
यूं तो सड़को पर नियमों का पालन करवाने का जिम्मा परिवहन और पुलिस विभाग का है, लेकिन आरटीओ भी जिम्मेदारी से बचता नजर आता है. यही वजह है की सालों से ओवरलोडिंग का जानलेवा खेल धड़ल्‍ले से चल रहा है और आरटीओ बेबस नजर आ रहा है. जबकि पुलिस भी एक्शन में तब नजर आती है, जब कोई दुर्घटना घट जाती है. कुछ दिनों तक अभियान चलाने के बाद फिर पुराना ढर्रा ही शुरू हो जाता है. ये सिलसिला लम्बे समय से चला आ रहा है और जिस ढर्रे से न ही चालक सुधर पा रहे है और न ही जिम्मेदार अधिकारी. इस गठजोड़ का खामियाजा सड़क पर चलने वाले मासूम और आम जनता को अपनी जान गंवा कर भुगतना पड़ रहा है.
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First published: August 6, 2019, 11:41 PM IST
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