यहां सीता ने ली थी भू-समाधि, अब ‘सीता माता सर्किट’ के रूप में जानेगी दुनिया

Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: July 1, 2019, 8:57 PM IST
यहां सीता ने ली थी भू-समाधि, अब ‘सीता माता सर्किट’ के रूप में जानेगी दुनिया
पौड़ी में स्थित सीता माता मंदिर में पूजा करते मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत.

यूसेक ने सीता माता सर्किट को उत्तराखंड के पर्यटन के नक्शे पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

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महाभारत के पात्रों के प्रमाण उत्तराखंड में कई जगह मिलते हैं लेकिन कम ही लोगों को पता होगा कि रामायण की प्रमुख पात्र सीता का भी उत्तराखंड से गहरा नाता है. माना जाता है कि पौड़ी के सितोलस्यूं में ही सीता ने भू-समाधि ली थी. यहां 11वीं शताब्दी के सीता मंदिर, लक्ष्मण मंदिर और वाल्मीकि आश्रम मौजूद हैं. मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने बताया कि पौड़ी में ‘सीता माता सर्किट’ विकसित करने का ऐलान करते हुए कहा कि इन धार्मिक स्थलों की स्थानीय लोगों में बड़ी मान्यता है परंतु अन्य प्रदेशों के लोगों के इनके बारे कम जानकारी है. इसलिए देश भर के श्रद्धालुओं को यहां के धार्मिक महत्व के बारे बताने के लिए प्रचार प्रसार किया जाएगा.

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बदरी-केदार-गंगोत्री-यमुनोत्री के दर्शन के लिए हर साल लाखों की संख्या में लोग उत्तराखंड आते हैं. लेकिन कम ही लोगों को मालूम है कि इसे देवभूमि सिर्फ़ इन चार धामों के लिए ही नहीं कहा जाता. यहां बहुत से देवी-देवताओं के प्राचीन मंदिर हैं जिनका उल्लेख पुराणों में है लेकिन ज़्यादा लोगों को उनके बारे में पता नहीं है. देवप्रयाग स्थित पौराणिक महत्व के रघुनाथ मंदिर, देवाल स्थित लक्ष्मण मंदिर और  सितोलस्यूं में फलस्वाड़ी गांव में माता सीता मंदिर भी इन्हीं में से एक हैं. अब सरकार ने इन्हीं को ‘सीता माता सर्किट’ के तौर पर विकसित करने का ऐलान किया है.

यह है कहानी

पुरातत्वविद् डॉक्टर यशवंत सिंह कठोच के अनुसार माना जाता है कि फलस्वाड़ी गांव में ही सीता माता ने भू-समाधि ली थी. जनश्रुतियों के अनुसार यहां पर सीता माता का मंदिर भी था और बाद में वह भी धरती में समा गया था. इससे जुड़ी कथा के अनुसार यहां नवंबर महीने मनसार का मेला लगता है. फलस्वाड़ी और कोट गांव, जहां लक्ष्मण मंदिर है, मिलकर इस मेले का आयोजन करते हैं. हर साल बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल होने आते हैं.

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डॉक्टर कठोच बताते हैं कि दो दिन के इस मेले में पुजारी मंदिर के आठ-दस फ़ीट व्यास के अनुमानित क्षेत्र में हाथों से खुदाई करते हैं. जैसे ही उनके हाथ में मंदिर के शिखर जैसा पत्थर छूता है, वैसे ही खुदाई बंद कर दी जाती है. उसके बाद पूजा शुरु होती है. पूजा के दौरान स्थानीय तौर पर उगने वाल घास, सीता जटा, से बुने गए एक रस्से का एक सिरा पूजा स्थल पर रहता है. पूजा के बाद इस जटा रस्से के रेशों को लोग प्रसाद के रूप में ले जाते हैं. माना जाता है कि यह सीता माता के केश हैं. पौराणिक कथा के अनुसार जब सीता भूमि में समाने लगीं थीं तो राम उन्हें पकड़ने भागे लेकिन उनके हाथ उनके केश ही आए थे. इसी को याद करते हुए यह परंपरा शुरु हुई.
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Sita Mandir in Uttarakhand Tourism Map, यूसेक ने सीता माता सर्किट को उत्तराखंड के पर्यटन के नक्शे पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
यूसेक ने सीता माता सर्किट को उत्तराखंड के पर्यटन के नक्शे पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.


पर्यटन नक्शे पर सीता माता सर्किट  

उत्तराखंड अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (यूसेक) के निदेशक एमपीएस बिष्ट कहते हैं कि उत्तराखंड बल्कि पौड़ी के ही बहुत से लोगों को इस स्थान के महत्व का पता नहीं है. वह कहते हैं कि हममें ‘सेलेबल क्वालिटी’ न होने की वजह से हमारे यहां के बेहद महत्वपूर्ण स्थान उपेक्षित रह गए हैं. वह मुख्यमंत्री को श्रेय देते हैं कि उन्होंने सीता सर्किट बनाने और इसके प्रचार के लिए कदम बढ़ाया है. यूसेक ने सीता माता सर्किट को उत्तराखंड के पर्यटन के नक्शे पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

बिष्ट कहते हैं कि उम्मीद की जानी चाहिए कि सीता माता सर्किट की तरह की देवभूमि उत्तराखंड के और भी धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान पर्यटन नक्शे पर आएंगे और यहां बिखरे पौराणिक महत्व के स्थानों के बारे में लोग जानेंगे.

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First published: July 1, 2019, 7:36 PM IST
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