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तो सिर्फ़ मॉल और रेहड़ियों का शहर रह जाएगा देहरादून... पलायन को मजबूर होंगे छोटे दुकानदार!
Dehradun News in Hindi

Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: January 27, 2020, 4:44 PM IST
तो सिर्फ़ मॉल और रेहड़ियों का शहर रह जाएगा देहरादून... पलायन को मजबूर होंगे छोटे दुकानदार!
अपने घरों में छोटी-छोटी दुकानें चला रहे लोगों का कहना है कि टैक्स लगाकर सरकार उत्तराखंड के गरीब लोगों को मार ही देगी.

अपने घरों में या बाज़ार में किराए पर जगह लेकर दुकान चलाने वाले ये दुकानदार हज़ारों की संख्या में तो हैं लेकिन असंगठित हैं और इसलिए कमज़ोर हैं.

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देहरादून को कभी रिटायर्ड अधिकारियों का शहर कहा जाता था. दून घाटी सेना और प्रशासनिक सेवाओं से रिटायर होने वाले अधिकारियों की पसंदीदा जगह हुआ करती थी. दून के बाज़ार भी इसी तर्ज पर विकसित हुए थे. राज्य बनने के बाद जब तेज़ी से शहर का विस्तार शुरु हुआ तो आमदनी के ज़्यादा ज़रिए न होने पर लोगों ने अपने घरों में ही छोटी-मोटी दुकानें खोलनी शुरु कर दीं लेकिन अब देहरादून नगर-निगम सालों से विकसित हुए इस सिस्टम को झटके से बदलने की कोशिश कर रहा है. निगम की चली तो देहरादून सिर्फ़ मॉल्स और रेहड़ियों का शहर रह जाएगा.

घर में दुकान 

मसूरी बाइपास पर नेहरु ग्राम की गढ़वाली कॉलोनी में रहने वाले सुरेंद्र बिष्ट अपने घर के बाहर निकाली गई एक दुकान में किराना स्टोर चलाते हैं. आस-पास के लोग अपनी ज़रूरत की चीज़ें यहां से ले लेते हैं और सुरेंद्र का परिवार इससे पल रहा है.

नगर निगम के सभी छोटे-बड़े व्यापारियों पर लाइसेंस शुल्क लगाने के प्रस्ताव से सुरेंद्र चिंतित हैं. बता दें कि निगम ने सब्ज़ी, फल, दूध, जनरल स्टोर, रिटेल, होल सेल, होटल, चाय की दुकान सहित सभी प्रकार के व्यापार पर लाइसेंस शुल्क लेना तय किया है जो 5000 से 80000 रुपये तक होगा.

सुरेंद्र महीने में 10-12 हज़ार रुपये तक कमा पाते हैं. घर अपना है तो इससे उनका काम चल जाता है लेकिन जब भारी-भरकम टैक्स देना पड़ेगा तो?

सुरेंद्र कहते हैं, “अगर नहीं चल पाएगा तो बाहर जाना पड़ेगा, नौकरी के लिए. क्या करेगा आदमी, परिवार को तो पालना ही है न”.

पलायन बढ़ेगा...इस टैक्स का प्रस्ताव देते समय नगर निगम को शायद ही यह अंदाज़ा होगा कि वह पलायन की समस्या को बढ़ाने जा रहा है. पलायन को दूर करने की बातें शायद हर सार्वजनिक सभा में होती है, प्रदेश की नीति बनाते वक्त इसका ध्यान रखने का दावा किया जाता है. नगर निगम के इस कदम से सुरेंद्र जैसे न जाने कितने छोटे दुकानदारों के सामने अपना छोटा सा व्यवसाय छोड़कर पलायन करने का ख़तरा पैदा हो सकता है.

सुरेंद्र की दुकान से थोड़ी ही दूर बबलू की भी अपने घर में किराने और सब्ज़ी की दुकान है. बबलू ई-रिक्शा चलाते हैं और उनकी पत्नी दुकान में बैठती हैं. वह कहती हैं, “छह नंबर पुलिया पर सारे बाहर के लोगों को दुकानें दे दीं जिसकी वजह से पहले ही काम मुश्किल से चल रहा था अब टैक्स लगाकर तो यह सरकार मार ही देगी उत्तराखंड के गरीब लोगों को.”

असंगठित और कमज़ोर

सुरेंद्र बिष्ट कहते, “हमारा तो काम अब तक चल ही रहा है क्योंकि दुकान अपनी है लेकिन डोभाल चौक (बाज़ार) वाले पहले से ही रो रहे हैं. दुकान का 8-10 हज़ार किराया निकालना मुश्किल हो रखा है. एक तो मंदी ऊपर से ऑनलाइन शॉपिंग और फिर नए-नए खुलते मॉल. सरकार को गरीब आदमी की सोचनी चाहिए थी यह टैक्स पर टैक्स लगाए जा रहे हैं. उत्तराखंड का आदमी पलायन नहीं करेगा तो क्या करेगा?”

व्यापारी संगठन तो नगर निगम में धरना-प्रदर्शन कर अपना विरोध जता रहे हैं लेकिन छोटे दुकानदारों की समस्या बड़ी है. अपने घरों में या बाज़ार में किराए पर जगह लेकर दुकान चलाने वाले ये दुकानदार हज़ारों की संख्या में तो हैं लेकिन असंगठित हैं और इसलिए कमज़ोर हैं.

वकीलों को छूट 

नगर निगम बेहद चालाकी से पिक एंड चूज़ भी खेल रहा है. जहां उसे लगता है कि मुश्किल हो सकती है वह अपने कदम पीछे खींच रहा है. जैसे कि वकीलों के विरोध करने पर तुरंत मेयर सुनील उनियाल गामा ने कह दिया कि वकीलों को टैक्स के दायरे में नहीं लाया जाएगा, भविष्य में भी नहीं.

शायद गामा इस बात पर यकीन करते हैं कि वोटर की याददाश्त कमज़ोर होती है और सहशीलता अपार. चार साल बाद जब नगर निगम के चुनाव होंगे तब तक लोगों को ऐसी मनमानियां सहने की आदत पड़ जाएगी और वोट तो वैसे भी मोदी या बीजेपी के नाम पर ही पड़े थे और पड़ने हैं.

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देहरादून नगर निगम के लिए OUTSIDER हैं उत्तराखंड के मूल निवासी 

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First published: January 27, 2020, 3:05 PM IST
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