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भारी बारिश, पाक में बम धमाका या नेपाल में भूकंप; हर बात पर वकीलों की हड़ताल से सुप्रीम कोर्ट हुआ नाराज
Dehradun News in Hindi

भाषा
Updated: February 22, 2020, 8:59 AM IST
भारी बारिश, पाक में बम धमाका या नेपाल में भूकंप; हर बात पर वकीलों की हड़ताल से सुप्रीम कोर्ट हुआ नाराज
उत्तराखंड में शनिवार को होने वाली वकीलों की हड़ताल पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी.

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बात-बात पर होने वाली वकीलों की हड़ताल को बताया गैरकानूनी तो सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला. अदालत के कार्यदिवसों के नुकसान और लंबित मुकदमों की संख्या बढ़ने की वजहों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने भी मामले पर जताई नाराजगी.

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नई दिल्ली. पाकिस्तान के स्कूल में बम विस्फोट और नेपाल में भूकंप जैसी कई ‘सारहीन वजहों’ से उत्तराखंड के तीन जिलों में पिछले 35 साल से कार्यदिवस वाले प्रत्येक शनिवार को वकीलों की हड़ताल पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कड़ा रुख अपनाया है. कोर्ट ने इस बात पर सख्त नाराजगी जताई है. वकीलों की हड़ताल का मुद्दा उत्तराखंड हाईकोर्ट (Uttarakhand High Court) के एक फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत में दायर अपील पर सुनवाई के दौरान सामने आया. हाईकोर्ट ने देहरादून और हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर के अधिकांश हिस्सों में प्रत्येक शनिवार को वकीलों की हड़ताल या अदालत के बहिष्कार को ‘गैरकानूनी’ करार दिया था.

4 साल में 455 दिन हड़ताल
उच्च न्यायालय ने 25 सितंबर 2019 को अपने फैसले में विधि आयोग की 266वीं रिपोर्ट का भी हवाला दिया था. इस रिपोर्ट में आयोग ने वकीलों की हड़ताल की वजह से कार्यदिवसों के नुकसान के आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद कहा था कि इससे अदालतों का कामकाज प्रभावित होता है और लंबित मुकदमों की संख्या बढ़ाने में यह योगदान करते हैं. उत्तराखंड के बारे में हाईकोर्ट द्वारा विधि आयोग को भेजी गई सूचना के अनुसार 2012-2016 के दौरान देहरादून जिले में वकील 455 दिन हड़ताल पर रहे, जबकि हरिद्वार में 515 दिन वकीलों की हड़ताल रही.

रिश्तेदार के निधन पर भी हड़ताल



विधि आयोग की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि स्थानीय मुद्दे से लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के ऐसे मुद्दों पर वकील अदालतों से अनुपस्थित रहते हैं, जिनका अदालत के कामकाज से कोई संबंध ही नहीं होता है. हाईकोर्ट ने कहा था कि उदाहरण के लिए पाकिस्तान के स्कूल में बम विस्फोट, श्रीलंका के संविधान में संशोधन, अंतरराज्यीय जल विवाद, किसी वकील पर हमला या उसकी हत्या, नेपाल में भूकंप, अधिवक्ताओं के नजदीकी रिश्तेदार के निधन पर शोक व्यक्त करने और यहां तक कि भारी बारिश और कवि सम्मेलनों जैसे मुद्दे भी अदालत की कार्यवाही के बहिष्कार की वजह बनती रही हैं.

हाईकोर्ट का फैसला सही
न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और न्यायमूर्ति एमआर शाह की पीठ के समक्ष यह अपील बीते गुरुवार को सुनवाई के लिए आई थी. पीठ ने इस स्थिति पर चिंता व्यक्त की और कहा, ‘‘देश में हर जगह यह हो रहा है. यह स्वत: ही अवमानना की कार्यवाही के लिए सर्वथा उचित मामला है. बार एसोसिएशन कैसे कह सकती है कि वे हड़ताल जारी रखेगी?’’पीठ ने कहा, ‘‘चीजें ध्वस्त हो गई हैं. हाईकोर्ट का आदेश पूरी तरह न्यायोचित है.’’ पीठ ने कहा, ‘‘हम इस तरह की चीजों की अनुमति नहीं दे सकते. हर व्यक्ति हड़ताल पर जा रहा है. आज, देश के हर हिस्से में हड़ताल हो रही है. हमें अब सख्त होना पड़ेगा. आप यह कैसे कह सकते हैं कि प्रत्येक शनिवार को बार हड़ताल पर रहेगी?’’

पश्चिमी यूपी में है समस्या
पीठ ने कहा, ‘‘आप मजाक कर रहे हैं. वकील के परिवार के सदस्य का निधन हो गया और पूरी बार हड़ताल पर जाएगी? यह सब क्या है.’’ पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ देहरादून के वकीलों के संगठन की अपील पर सुनवाई पूरी करते हुए कहा कि इस पर बाद में निर्णय सुनाया जाएगा. उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में इस तथ्य का जिक्र किया कि यह समस्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पिछले 35 साल से शनिवार को अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार करके विरोध करने का यह सिलसिला चल रहा है. उप्र के पुनर्गठन के बाद नौ नवंबर, 2000 को उत्तराखंड प्रदेश के सृजन से पहले ये तीनों जिले उत्तर प्रदेश का हिस्सा थे. अदालत ने इस तथ्य का भी जिक्र किया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की एक पीठ स्थापित करने की मांग को लेकर पिछले 35 साल से प्रत्येक शनिवार को वकील हड़ताल कर रहे हैं.

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First published: February 22, 2020, 8:59 AM IST
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