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ऐसे मिलेगी दिल्ली-NCR के जानलेवा प्रदूषण से निजात... पेट्रोल-डीज़ल कार बनेगी बैटरी से चलने वाली गाड़ी, यहां जानें कब और कितने में

Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: November 15, 2019, 4:30 PM IST
ऐसे मिलेगी दिल्ली-NCR के जानलेवा प्रदूषण से निजात... पेट्रोल-डीज़ल कार बनेगी बैटरी से चलने वाली गाड़ी, यहां जानें कब और कितने में
भारतीय पेट्रोलियम संस्थान में इंटरनल कंबशन इंजन को ईवी में कन्वर्ट करने का प्रोजेक्ट अपने आखिरी दोर में है.

आईआईपी के वैज्ञानिकों ने दो गाड़ियों को ट्रायल के आधार पर ईवी में परिवर्तित किया है. इनमें से एक मारुति 800 है और एक मारुति ज़ेन.

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देहरादून. जानलेवा वायु प्रदूषण से जूझते दिल्ली-एनसीआर और उसी दिशा में बढ़ते दूसरे शहरों के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण ख़बर है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 2030 तक देश में सभी सिर्फ़ इलेक्ट्रिक वाहन चलाने का लक्ष्य भले ही ऑटो सेक्टर में मंदी की वजह से थोड़ा धीमा चल रहा हो. लेकिन इस लक्ष्य को पाने के लिए देहरादून में एक ख़ामोश क्रांति की तैयारी चल रही है. देश को पीएनजी बर्नर देने वाला भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (आईआईपी) पुरानी पेट्रोल-डीज़ल गाड़ियों को इलेक्ट्रिक व्हीकल में परिवर्तित करने की दिशा में काफ़ी आगे बढ़ गया है. इसका अर्थ यह हुआ कि जल्द ही आप अपनी पेट्रोल-डीज़ल कार को ग्रीन व्हीकल यानी ईवी में कन्वर्ट करवा सकेंगे.

तीन साल से चल रही है रिसर्च
देहरादून में देहरादून-हरिद्वार राजमार्ग पर स्थित भारतीय पेट्रोलियम संस्थान के कैंपस में पिछले तीन साल से वैज्ञानिक, इंटरनल कंबशन इंजन वाली पुरानी गाड़ियों को इलेक्ट्रिक व्हीकल में बदलने के लिए काम कर रहे हैं. देश के ऑल इलेक्ट्रिक व्हीकल के सपने को पूरा करने की दिशा में यह एक बेहद महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट है. क्योंकि मान लें कि 2030 के बाद सिर्फ़ इलेक्ट्रिक गाड़ियां ही बिकने लगें तो भी करोड़ों की संख्या में सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों का क्या होगा? क्या ये धड़ल्ले से प्रदूषण फैलाती रहेंगी?

बता दें कि वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के तहत काम करने वाला भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (आईआईपी) देश के ईंधन आयात एवं कार्बन-डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करने के लिए अनुसंधान कर रहा है. आईआईपी के निदेशक डॉक्टर अंजन रे कहते हैं कि इस लक्ष्य को पाने के दो तरीके हैं. पहला कार्बन-मिश्रित ईंधन की खपत कम करें और बायो फ़्यूल अपनाएं. दूसरा ईवी वाहनों का प्रयोग. संस्थान का पुराने पेट्रोल-डीजल वाहनों को ईवी में बदलने का प्रयास भी इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए किया जा रहा काम है.

प्रोडक्शन रेडी
अभी आईआईपी के वैज्ञानिकों ने दो गाड़ियों को ट्रायल के आधार पर ईवी में परिवर्तित किया है. इनमें से एक मारुति 800 है और एक मारुति ज़ेन. इस परियोजना के प्रभारी लाइरेनलाक्पम रोबिंद्रो ने हमें बताया कि इन  गाड़ियों पर लगभग 80% काम हो चुका है अर्थात ये लगभग प्रोडक्शन रेडी हैं. लगभग इसलिए क्योंकि आखिरी 20% काम गाड़ी बनाने वाले की ज़रूरत के हिसाब से किया जाता है, जो अमूमन मार्केट सर्वे और कंज़्यूमर की ज़रूरतों के आधार पर बदलाव चाहता है.

IIP Scientist L Robindro, इंटरनल कंबशन इंजन को ईवी में कन्वर्ट करने के प्रोजेक्ट इंचार्ज लाइरेनलाक्पम रोबिंद्रो कन्वर्टेड कारों के साथ.
इंटरनल कंबशन इंजन को ईवी में कन्वर्ट करने के प्रोजेक्ट इंचार्ज लाइरेनलाक्पम रोबिंद्रो कन्वर्टेड कारों के साथ.

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रोबिंद्रो कहते हैं कि भारत जैसे देश में जहां गाड़ियां ही नहीं लगभग हर सामान को रीयूज़ करना हमारी जीवनशैली का हिस्सा है, ऐसे में पुरानी गाड़ियों को कंडम कहकर फेंकना भी सही विकल्प नहीं है. 15 साल पुरानी ज़्यादातर गाड़ियों की कंडीशन ठीक होती है. कम से कम बॉडी तो काम की होती ही है. इसी विचार को ध्यान में रखकर आईआईपी में तीन साल पहले पुरानी पेट्रोल-डीज़ल गाड़ियों को ईवी में बदलने की परियोजना शुरू हुई थी.

ईवी अभियान
यहां यह बता देना भी ज़रूरी है कि केंद्र सरकार इलेक्ट्रिक व्हीकल्स यानी ईवी के लक्ष्य को पाने के लिए पिछले कई साल से काम कर रही है. 2011 में इलेक्ट्रिक वाहनों को मंज़ूरी मिली थी और 2013 में इसे लागू करने के लिए योजना बनी- नेशनल इलेक्ट्रिक मोबिलिटी  मिशन प्लान 2020. ईवी अभियान में गति आई 2015 में जब FAME को लांच किया गया. FAME यानी फ़ास्टर अडॉप्शन एंड मैन्यूफ़ैक्चरिंग ऑफ़ (हाइब्रिड एंड) इलेक्ट्रिक व्हीकल्स इन इंडिया.

FAME-1 को 895 करोड़ रुपये  के बजट के साथ लांच किया गया था. इसका उद्देश्य था कि ईवी की मांग पैदा की जाए और इनके लिए आधारभूत ढांचा, टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म तैयार किए जाएं ताकि उपभोक्ताओं और वाहन निर्माताओं में भी इनके प्रति रुचि जागृत हो. 2017 में ख़त्म होने वाले वाले इस प्रोजेक्ट को छह-छह महीने तक बढ़ाकर मार्च, 2019 तक जारी रखा गया.

देश में चल रहे ई-रिक्शा में इस्तेमाल होने वाली किट चीन और अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में बनी है.


ई-रिक्शा और आर्थिक गणित
इसी स्कीम के तहत देश भर में ई-रिक्शा लांच किए गए. सरकारी आंकड़ों के अनुसार आज देश में 15 लाख से ज़्यादा ई-रिक्शा हैं. इससे देश में इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या तो बढ़ी है, देश को ईवी की दिशा में ले जाने के राजनीतिक संकल्प को भी बल मिला लेकिन आर्थिक रूप से इसमें एक बड़ी दिक्कत रही.

दरअसल जो ई-रिक्शा भारत में बने और सड़कों पर आए उनकी बॉडी ही भारतीय है. इनमें इस्तेमाल होने वाली किट चीन और अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में बनी है. भारत में बने इन ई-रिक्शा की 50 से 60 फ़ीसदी लागत इनमें लगी किट की ही है. इसका अर्थ यह हुआ कि अगर ई-रिक्शा पर 850 करोड़ रुपये खर्च किए गए तो इसमें से 450-500 करोड़ रुपये देश से बाहर चले गए.

अब भारत सरकार द्वारा केंद्रीय मोटर वाहन नियम 1989 में इस संबंध में आवश्यक संशोधन किए गए हैं, जिसके अंतर्गत अब लोग अपनी पुरानी गाड़ियों को एक प्रमाणित इलेक्ट्रिक किट के द्वारा इलेक्ट्रिक वाहन में परिवर्तित कर पाएंगे. आईआईपी इसी दिशा में पुरानी गाड़ियों के कन्वर्ज़न पर काम कर रहा है अर्थात पुरानी पेट्रोल-डीज़ल गाड़ियों को ईवी में बदलना.

Electric Bus, Dehradun, उत्तराखंड सरकार ने देहरादून से मसूरी तक कार इलेक्ट्रिक बस का ट्रायल किया है.
उत्तराखंड सरकार ने देहरादून से मसूरी तक इलेक्ट्रिक बस का ट्रायल किया है.


रोबिंद्रो कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार आप प्रदूषण फैलाने वाली लाखों पुरानी गाड़ियों को हटा तो दोगे लेकिन इन्हें ले कहां जाओगे, फेंकोगे कहां? भारत जैसा देश यह अफ़ोर्ड नहीं कर सकता. फिर ज़्यादातर गाड़ियों की बॉडी अच्छी स्थिति में होती है, ज़रूरत उनके पॉल्यूशन फैलाने वाले इंजन को ही बदलने की है.

इंफ़्रास्ट्रक्चर का चैलेंज
आईआईपी में प्रभाग प्रमुख पूनम गुप्ता कहती हैं कि हम सार्वजनिक परिवहन के वाहनों जैसे कि विक्रम को भी ईवी में बदलना चाहते थे, क्योंकि ये प्रदूषण की बड़ी वजह हैं. लेकिन फिर इंफ़्रास्ट्रक्चर का सवाल आ गया.

दरअसल देश में ईवी के लक्ष्य को प्राप्त करने में शायद सबसे बड़ी चुनौती इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने की ही है. इलेक्ट्रिक व्हीकल अस्तित्व में आ भी जाते हैं तो उन्हें चार्ज करने के लिए इंफ़्रास्ट्रक्चर अभी कहीं नहीं है. हालांकि FAME-2 में इस दिशा में काम किया जा रहा है.

electric car Uttarakhand, उत्तराखंड सचिवालय में ट्रायल बेसिस पर इलेक्ट्रिक कार लाई गई थी लेकिन चार्जिंग स्टेशन के अभाव में वह ट्रायल सफल नहीं हो पाया.
उत्तराखंड सचिवालय में ट्रायल बेसिस पर इलेक्ट्रिक कार लाई गई थी लेकिन चार्जिंग स्टेशन के अभाव में वह ट्रायल सफल नहीं हो पाया.


नहीं रहेगी चार्जिंग की चिंता
FAME-2 में तीन साल के दौरान 10,000 करोड़ रुपये के बजट से मुख्यतः इंफ़्रास्ट्रक्चर डेवलप किए जाने पर ही ज़ोर है. रोबिंद्रो कहते हैं कि FAME-2 के पूरा होते-होते देश भर में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का जाल बिछ जाने की उम्मीद है. इसके बाद इलेक्ट्रिक गाड़ियों को लेकर कहीं आने-जाने के दौरान चार्जिंग की चिंता नहीं रहेगी.

हालांकि दुनिया भर में इलेक्ट्रिक वाहनों के सामने चुनौती गाड़ियों की चार्जिंग में लगने वाला समय है. पेट्रोल-डीज़ल जैसे पारंपरिक वाहन जहां चंद मिनटों में टैंक फ़ुल कर अगली यात्रा के लिए तैयार हो जाते हैं, इलेक्ट्रिक वाहनों में चार्जिंग में लगने वाला समय अब भी बहुत ज़्यादा है. और यह इन वाहनों की राह में बड़ा रोड़ा है.

स्वैपेबल बैटरी
आईआईपी के वैज्ञानिक इस चुनौती को समझते हैं और इसके लिए स्वैपेबल बैटरी के विकल्प पर काम कर रहे हैं. रोबिंद्रो ने बताया कि आईआईपी ईवी कन्वर्ज़न प्रोजेक्ट में इंफ़्रास्ट्रक्चर को ध्यान में रखते हुए स्वैपेबल बैटरी पर भी काम किया जा रहा है. यह स्मार्ट बैटरी होंगी जो स्मार्ट फ़ोन से भी कनेक्ट होंगी. कार के कंट्रोल पैनल पर तो बैटरी की चार्जिंग के बारे में जानकारी मिलेगी ही आपके स्मार्ट फ़ोन पर भी इसे चेक किया जा सकता है.

आईआईपी वैज्ञानिक स्वैपेबल बैटरी को भी विकसित कर रहे हैं जिसका साइज़ एक लीटर की पानी की बोतल से थोड़ा बड़ा होगा.
आईआईपी वैज्ञानिक स्वैपेबल स्मार्ट बैटरी को भी विकसित कर रहे हैं जिसका साइज़ एक लीटर की पानी की बोतल से थोड़ा बड़ा होगा.


रोबिंद्रो कहते हैं कि पेट्रोल पंप की तरह चार्जिंग और बैटरी स्वैपिंग स्टेशन बनाए जा सकते हैं.  इन स्टेशन पर जाकर आप अपनी डिस्चार्ज हो चुकी या हो रही बैटरी को फ़ुल चार्ज्ड बैटरी से बदल सकते हैं. स्मार्ट बैटरी से यह पता चल जाएगा कि उसे कितनी चार्जिंग की ज़रूरत है और इससे स्वैपिंग के समय दिए जाने वाले पैसे भी तय होंगे.

स्वैपेबल बैटरी के साथ आपकी गाड़ी उतने ही समय में रीचार्ज हो जाएगी जितनी देर में आप पेट्रोल, डीज़ल डलवाते हैं. यह इलेक्ट्रिक व्हीकल को आम लोगों के बीच लोकप्रिय बनाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

कितने में ईवी बन जाएगी पुरानी गाड़ी?
रोबिंद्रो कहते हैं कि हालांकि यह तो कार को कन्वर्ट करने वाली कंपनी पर ही निर्भर करेगा क्योंकि आईआईपी प्रौद्योगिकी को विकसित करने के बाद उसे बनाने वाले को हस्तांतरित कर देता है. पीएनजी बर्नर के मामलों की तरह ईवी किट के मामले में भी ऐसा ही किया जाएगा.

आईआईपी के वैज्ञानिकों ने दो गाड़ियों को ट्रायल के आधार पर ईवी में परिवर्तित किया है. एक यह मारुति ज़ेन है और एक मारुति 800.


शुरुआती अनुमान के अनुसार स्माल हैचबैक कार, मारुति 800/ज़ेन, के ईवी में परिवर्तन में डेढ़ लाख रुपये से कम ख़र्च आना चाहिए. इसका अर्थ यह है कि न सिर्फ़ आपकी 15 साल पुरानी कार की जिंदगी नई हो जाएगी, बल्कि एक निजी कार की इस कन्वर्ज़न की यह कीमत भी एक से दो साल के अंदर वसूल हो जाएगी.

ऐसे चलती है ये ईवी?
बाकी सारा गणित तो ठीक है, ईवी को लेकर पहला सवाल यह उठता है कि यह चलती कैसी है? न्यूज़ 18 संवाददाता को आईआईपी कैंपस में यह कार चलाने का मौका भी मिला. हमने मारुति ज़ेन चलाकर देखी. कैंपस की सुनसान सड़क पर चुपचाप यह कार 60 किलोमीटर/प्रतिघंटा की स्पीड आराम से पकड़ लेती है.

हालांकि आप एक्सेलेरेशन अपनी पेट्रोल-डीज़ल कार की तरह महसूस नहीं कर पाते लेकिन सिटी ड्राइव के लिए यह एक शानदार व्हीकल है. एक बात और इस पुरानी कार को चलाते हुए आपको यह भी महसूस होता रहता है कि.... यू आर ड्राइविंग अ फ़्यूचर कार.

dr harshwardhan driving EV in IIP, आईआईपी कैंपस में विज्ञान और प्रोद्योगिकी मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन कन्वर्टेड ईवी को चलाते हुए.
आईआईपी कैंपस में विज्ञान और प्रोद्योगिकी मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन कन्वर्टेड ईवी को चलाते हुए.


 मास कन्वर्ज़न जल्द
रोबिंद्रो कहते हैं कि यदि सब ठीक रहा तो अगले साल-डेढ़ साल में पुरानी पेट्रोल-डीज़ल कार को ईवी में बदलने की इस प्रौद्योगिकी का विभिन्न कंपनियों को लाइसेंस प्रदान किया जा सकता है जैसा कि पीएनजी बर्नल के मामले में किया गया है.

इसके बाद यह काम व्यापक स्तर पर शुरू हो सकता है और आम जन के लिए यह प्रौद्योगिकी उपल्ब्ध हो सकेगी. इससे लाखों गाड़ियां कंडम होने से बच जाएंगी और किफायती इलेक्ट्रिक वाहन उपलब्ध होंगे. भारत जैसे देश के लिए यह एक बड़ी बचत होगी.

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First published: November 15, 2019, 1:39 PM IST
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