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 तबादला कानून तो बन जाएगा लेकिन क्या ठीक से लागू भी हो पाएगा?

Manish Kumar | ETV UP/Uttarakhand
Updated: December 8, 2017, 1:08 PM IST
 तबादला कानून तो बन जाएगा लेकिन क्या ठीक से लागू भी हो पाएगा?
गैरसैंण में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत
Manish Kumar | ETV UP/Uttarakhand
Updated: December 8, 2017, 1:08 PM IST
उत्तराखण्ड के लाखों कर्मचारियों के तबादले के लिए विधेयक पारित हो गया है और जल्द ही ये कानून भी बन जाएगा लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या इसे सही तरीके से लागू भी किया जा सकेगा? यह सवाल इसलिए उठा है क्योंकि उत्तराखण्ड में एक बार पहले भी तबादले के लिए कानून बनाया गया था लेकिन, एक साल के भीतर ही उसे रद्द कर दिया गया था. फिर उसकी जगह एक ऐसी नीति बनाई गई जिसे आसानी से तोड़ा मरोड़ा जा सकता था.

साल 2000 में जब उत्तराखण्ड यूपी से अलग होकर बना, उस समय से लेकर साल 2011 तक लाखों कर्मचारियों के तबादले के लिए उत्तराखण्ड में कोई कानून नहीं था. साल 2000 से लेकर 2011 तक कार्मिकों के तबादले शासनादेश के ज़रिए होते रहे जिसे तबादले जैसे गम्भीर मसले के लिए बेहद लचर व्यवस्था माना जाता है.

लेकिन, राज्य में बीसी खण्डूरी के सीएम बनने के साथ ही तबादला कानून बनाए जाने की पहल की गई. बीसी खण्डूरी ने 11 सितम्बर 2011 को शपथ ली और 29 सितम्बर को विधानसभा से तबादला विधेयक पास करा लिया. राज्यपाल की मंजूरी के साथ ही प्रदेश में तबादला कानून लागू हो गया.

राज्य बनने के ग्यारह साल बाद पहली बार तबादले का कानून अस्तित्व में आया था. दुर्गम इलाकों में तैनात और पैरवी विहीन कार्मिकों को उम्मीद जगी कि अब उनके साथ न्याय होगा लेकिन नए तबादला कानून के तहत एक भी तबादले हो पाते इससे पहले ही राज्य में फरवरी 2012 में चुनाव हो गए और भाजपा की सरकार जाती रही.

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file photo: पूर्व सीएम बीसी खंडूरी


राज्य में बेहद कमजोर बहुमत की कांग्रेस सरकार बनी और सीएम बने विजय बहुगुणा. मार्च में सरकार के बनने के बाद तबादले की सिफारिशें होनी शुरु हुईं. बेहद कमज़ोर बहुमत की सरकार के सामने ताकतवर कार्मिकों की बातों को अनदेखा करना सम्भव नहीं लग रहा था लिहाजा इस बात की चर्चा शुरु हो गई कि खण्डूरी सरकार का तबादला कानून दोषपूर्ण है.

राजनीतिक पकड़ वाले कार्मिकों के मनमाने तबादले का दबाव झेल रही बहुगुणा सरकार ने इस नए कानून से मुक्ति पाने में ही भलाई समझी. लिहाजा विजय बहुगुणा की सरकार ने सितम्बर 2011 में अस्तित्व में आए नए तबादला कानून को लगभग एक साल बाद ही जनवरी 2013 में विधानसभा के ज़रिए रद्द कर दिया.

अब मनमाने तबादले करने का रास्ता साफ हो गया था क्योंकि कानून की जगह फिर से नीति ने ले ली थी. तबादला कानून की जगह उत्तराखण्ड में फिर से तबादला नीति लागू हो गई.

नीति और एक्ट में बड़ा फर्क ये है कि नीति को शासनादेश के ज़रिए बदला जा सकता है जबकि एक्ट में बदलाव करने के लिए विधानसभा की मंजूरी लेनी होती है. यही वजह रही कि बीसी खण्डूरी के तबादला कानून को रद्द कर दिया गय़ा और उसकी जगह नीति लायी गई.

कमज़ोर बहुमत वाली बनी पहले विजय बहुगुणा की और बाद में हरीश रावत की सरकार ने इसी लचर नीति के ज़रिए कार्मिकों के मनमाने तबादले किए.

अब प्रदेश में प्रचण्ड बहुमत की सरकार बनी है और दोबारा प्रदेश को नया तबादला कानून मिलने वाला है. लिहाज़ा उम्मीद की जा रही है कि तबादला कानून को सख्ती से लागू किया जाएगा. हालांकि जानकारों का कहना है कि यदि तबादले का पहला सत्र सही तरीके से लागू हो गया तो फिर दिक्कतें कम आएंगी. ऐसा इसलिए क्योंकि सुगम इलाके से दुर्गम इलाके में कोई भी तैनाती नहीं लेना चाहता. नए तबादला अधिनियम में इस बात की बंदिश है कि यदि कोई कार्मिक एक ही जगह पर चार सालों से तैनात है या सुगम क्षेत्रों में दस सालों से उसकी तैनाती चली आ रही है तो ऐसे कार्मिकों का दुर्गम क्षेत्र में अवश्य तबादला किया जाएगा.

सरकार यदि एक बार भी इसे सही तरीके से लागू करा पाई तो अगले तबादला सत्र में उसे कोई दिक्कत नहीं आएगी. सरकार को सबसे ज्यादा दुआएं तो ऐसे कर्मचारी देंगे जो सालों से पैरवी के अभाव में दुर्गम क्षेत्रों में नौकरी करने को मजबूर हैं.

 
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