'हलाला नहीं ज़रूरी, तीन तलाक़ के बाद शमा को बीवी बनाने के लिए असलम को...'

शमा ने पुलिस में केस दर्ज करवा दिया है. लेकिन वह यह भी चाहती है कि उनका घर न उजड़े, असलम उन्हें फिर स्वीकार करें और प्यार-इज़्ज़त रखें.

Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: August 4, 2019, 1:51 PM IST
'हलाला नहीं ज़रूरी, तीन तलाक़ के बाद शमा को बीवी बनाने के लिए असलम को...'
18 साल की शादी के बाद शमा को उनके पति असलम ने 31 जुलाई को तीन तलाक़ बोलकर घर से निकाल दिया था.
Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: August 4, 2019, 1:51 PM IST
तीन तलाक़ पर कानून बनने के बाद देश के सबसे पहले मामलों में से एक देहरादून में सामने आया है. सहसपुर के रहने वाले असलम ने अपनी पत्नी शमा को तीन तलाक़ दे दिया और नए क़ानून से मिले अधिकार का इस्तेमाल करते हुए शमा ने पुलिस में केस दर्ज करवा दिया है. लेकिन शमा यह भी चाहती है कि उनका घर न उजड़े, असलम उन्हें फिर स्वीकार करें और प्यार-इज़्ज़त रखें. अब इसके साथ ही एक नई बहस खड़ी हो गई है. कानून अगर असलम और शमा को समझौते के बाद साथ रहने की इजाज़त दे भी देता है तो क्या शरियत के अनुसार वह यह कर पाएंगे? न्यूज़ 18 ने इस्लामिक जानकारों से बात कर इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश की.

इसलिए है हलाला 

इस मामले की स्थिति यह है कि देहरादून के सहसपुर थाने में पुलिस ने शमा की तहरीर पर आईपीसी की धारा 323, 504 के साथ ही मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) कानून की धारा ¾ के तहत केस दर्ज कर लिया है. असलम अभी फ़रार हैं, पुलिस उनकी तलाश कर रही है. वह पकड़े जाते हैं तो उनके ख़िलाफ़ कानून के अनुसार कार्रवाई होगी.

देहरादून में रहने वाले मोहम्मद शाह नज़र मौलवी और पत्रकार हैं. शाह नज़र कहते हैं कि सबसे पहले तो यह तय करना होगा कि क्या जो तलाक़ दिया गया है वह वैध है भी या नहीं? गुस्से में और नशे में दिया गया तलाक़ सही नहीं माना जाता लेकिन अगर दे दिया है तो वह वैध माना जाएगा. शाह नज़र कहते हैं कि इस्लाम में हलाला इसीलिए रखा गया था ताकि तलाक़ देने से पहले 100 बार सोचे और गुस्से में तलाक़ न दे.

कब नहीं माना जाता तलाक़ 

ऐसे में जब शरियत के हिसाब से तलाक़ हो गया है तो असलम और शमा के पास हलाला के अलावा फिर पति-पत्नी के रूप में रहने का कोई विकल्प भी है क्या?

शाह नज़र कहते हैं कि हर मामले पर इस्लामिक विद्वान सोच-समझकर बात करते हैं. हर केस अलग होता है और उसे शरियत की नज़र से परखने का काम दारुल क़ज़ा करता है. देहरादून में स्थित दारुल कज़ा में में इस्लामिक विद्वान ऐसे मामलों पर विचार करते हैं.
Loading...

 

वह कहते हैं कि तीन तलाक़ के बाद अगर शौहर हनफ़ उठाकर यह कहता है कि उसने तीन तलाक़ अपने होशो-हवास में नहीं दिया है तो तलाक़ नहीं माना जाता. लेकिन अगर वह यह मानता है कि उसने होशोहवास में तलाक़ दिया है तो तलाक़ माना जाएगा.

यह है हलाला का विकल्प 

असलम और शमा के पास हलाला के अलावा कोई विकल्प होने के सवाल पर मुफ़्ती सलीम अहमद क़ासमी कहते हैं कि विकल्प है. वह कहते हैं कुछ इस्लामिक विद्वानों के अनुसार इद्दत की मोहलत में अगर शौहर यह माने कि उससे ग़लती हो गई है और वह फिर अपनी बीवी के साथ रहना चाहे तो कुछ मस्लक इसकी इजाज़त देते हैं.

दरअसल इस्लाम में तीन-चार मस्लक हैं. हनफ़ी हैं, शाफ़ई हैं, अहले हदीस हैं. इनमें से हनफ़ियों में तो तीन तलाक़ को तीन तलाक़ माना गया है लेकिन दूसरे मस्लकों में इनहें एक तलाक़ माना गया है. अगर आदमी को लगता है कि उससे ग़लती हो गई तो वह अपना मस्लक सुधार कर इस ग़लती को सुधार सकता है. शाफ़ई व अहले हदीस वालो के यहां इसकी इजाजत हैं.

यह भी देखें 

कानून बनने के 24 घंटे के अंदर शौहर ने बीवी को दिया तीन तलाक, घर से निकाला 

तीन तलाक़ बिलः मुस्लिम महिलाओं ने सीएम से मिलकर किया पीएम का शुक्रिया अदा 

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए देहरादून से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: August 2, 2019, 4:56 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...