उत्तराखंड कैसे बनेगा ऊर्जा प्रदेश? त्रिवेंद्र सरकार के सामने हैं ये चुनौतियां

साल भर में सरकार ने बिजली उत्पादन के क्षेत्र में कोई कार्य नहीं किया है जबकि कई परियोजनाएं केंद्र में लंबित पड़ी हैं क्योंकि राज्य सरकार परियोजनाओं को लेकर केंद्र से बात नहीं करती.

satendra bartwal | ETV UP/Uttarakhand
Updated: March 14, 2018, 8:25 PM IST
उत्तराखंड कैसे बनेगा ऊर्जा प्रदेश? त्रिवेंद्र सरकार के सामने हैं ये चुनौतियां
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satendra bartwal | ETV UP/Uttarakhand
Updated: March 14, 2018, 8:25 PM IST
त्रिवेंद्र सरकार का एक साल 18 मार्च को पूरा हो रहा है. ताजपोशी के बाद मुख्यमंत्री ने ‘हर घर बिजली, घर-घर बिजली’ का नारा दिया था. प्रदेश में नई जलविद्युत परियोजनाओं से प्रदेश को ऊर्जा प्रदेश बनाने और अर्थव्यवस्था समृद्ध करने की भी बात कही थी, लेकिन क्या ऐसा हुआ है?

राज्य गठन के समय उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश के रूप में बदलने का सपना देखा गया था. वादा किया था कि यहां हर घर को बिजली मिलेगी और नदियों से इतना बिजली उत्पादन किया जाएगा कि प्रदेश ही नहीं देश के अन्य राज्यों को भी बिजली बेची जाएगी. यह भी कहा गया था कि राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का ये बड़ा ज़रिया बनेगा.

लेकिन यह सपना सपना ही रह गया और आज आलम यह है कि दूसरों राज्यों में बिजली देने की बात तो दूर खुद ही आज प्रदेश के करीब साढ़े तीन लाख परिवार बिजली से वंचित हैं. हालांकि सरकार के पास ऊर्जा क्षेत्र में गिनाने के लिए बहुत कुछ है.

ऊर्जा क्षेत्र में सरकार के किए काम-

1- केंद्र सरकार की सौभाग्य योजना, उज्वला योजना और दीन दयाल ग्राम ज्योति योजना के तहत राज्य में 2019 तक सभी घरों को बिजली देने का काम शुरू हो गया है.

2- उत्तराखंड में हरिद्वार और केदारनाथ में तारें झूलती नहीं दिखेंगी. दोनों जगह भूमिगत लाइन बिछने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. साल भर में प्रदेश में 96 गांव में से 51 गांव में बिजली पहुंची.

3- उजाला योजना के तहत करीब 40 लाख एलईडी बल्व प्रदेश में सस्ते दामों पर बेचे गए. 31 शहरों में बिजली उच्चीकरण किया गया. लाइन लोस 21 फ़ीसदी से घटकर 16 फीसदी तक आया.

4- प्रदेश में 1500 किलोमीटर बंच केबल बिछाई गई. हरिद्वार देहरादून के सरकारी विभागों की छतों पर सोलर प्लांट लगाने का काम शुरू हो गया है. 15 मेगावाट दुनाव जल विद्युत परियोजना का लोकार्पण हुआ.

5- प्रदेश में उजाला मित्र योजना में स्वयं सहायता महिला समूह के लिए एलईडी बल्ब का वितरण में छूट दी गई.

जानकार और विपक्ष डबल इंजन की सरकार पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि साल भर में सरकार ने बिजली उत्पादन के क्षेत्र में कोई कार्य नहीं किया है. जबकि कई परियोजनाएं केंद्र में लंबित पड़ी हैं क्योंकि राज्य सरकार परियोजनाओं को लेकर केंद्र से बात नहीं करती.

राज्य गठन के समय प्रदेश में केवल नौ मिलियन यूनिट बिजली खर्च होती थी. लेकिन आज करीब 40 मिलियन यूनिट बिजली की ज़रूरत पड़ती है. लेकिन अभीतक एक भी नई परियोजना ने काम करना शुरू नहीं किया है. कांग्रेस प्रवक्ता मथुरादत्त जोशी पूछते हैं कि जब यूपीएएल हर साल करोड़ों की बिजली खरीदता है और घाटे की ओर बढ़ता जा रहा है तो यह कैसा ऊर्जा प्रदेश है?

एक नज़र सरकार के समक्ष मौजूद चुनौतियों पर-
सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है प्रदेश में 24 घंटे बिजली देना. प्रदेश का यूपीसीएल को हर साल करोड़ों की बिजली खरीदनी पड़ती है.

ऊर्जा के तीनों महकमों में हो रहे घोटालों का पर्दाफाश करना. प्रदेश के दूरस्थ गांवों तक बिजली पहुंचाने के लिए वन विभाग से सहमति बनाना. प्रदेश में छोटी-बड़ी करीब 474 जल विद्युत परियोजना बननी थीं, जिनमें से मात्र 80 परियोजना ही बिजली उत्पादन कर रही हैं.

प्रदेश की 39 जल विद्युत निर्माणाधीन परियोजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट की रोक लगी है. करीब 40 जल विद्युत परियोजनाओं की डीपीआर तैयार है लेकिन इन पर काम कब शुरू होगा पता नहीं. 23 परियोजनाओं की डीपीआर तक नहीं बनी है. करीब 292 परियोजनाओं का अभी धरातलीय सर्वे भी होना है.

साफ़ है कि सरकार की चुनौतियों का ग्राफ किए गए कार्यों से अधिक हैं. त्रिवेंद्र सरकार को प्रदेश को अगर ऊर्जा प्रदेश के नाम को सार्थक करना है तो बंद पड़ी परियोजनाओं को शुरू करवाना होगा और यह ध्यान रखना होगा कि ऊर्जा विभागों के घोटाले इस सपने को तोड़ सकते हैं.
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