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उत्तराखंड: खतरे में क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व, सिर्फ इलेक्शन के समय आते हैं नजर!

उत्तराखंड में चुनाव करीब आ रहे हैं. सांकेतिक फोटो
उत्तराखंड में चुनाव करीब आ रहे हैं. सांकेतिक फोटो

Uttarakhand News: उत्तराखण्ड (Uttarakhand) में फिलहाल 50 से ज्यादा क्षेत्रीय दल रजिस्टर्ड हैं, लेकिन पिछले 4 साल में इनका कोई अता पता नहीं रहा. अब जब इलेक्शन का समय करीब है तो सभी वोट काटने वाली पार्टी के तौर पर उभर कर नज़र आने की तैयारी में हैं.

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देहरादून. उत्तराखण्ड (Uttarakhand) में फिलहाल 50 से ज्यादा क्षेत्रीय दल रजिस्टर्ड हैं, लेकिन पिछले 4 साल में इनका कोई अता पता नहीं रहा. अब जब इलेक्शन का समय करीब है तो सभी वोट काटने वाली पार्टी के तौर पर उभर कर नज़र आने की तैयारी में हैं. उत्तराखण्ड में 56 पार्टीज़ कागज़ों में रजिस्टर्ड है, जिसमें पहली रीजनल पार्टी रही उत्तराखण्ड क्रांति दल भी अब हाशिये पर है. वहीं पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में एक्टिव तौर पर काम कर रही सपा, बसपा ने भी उत्तराखंड में पैर जमाने की कोशिश की, लेकिन राज्य के मुद्दे उठाने में ये भी फेल ही हुई.

यूकेडी प्रवक्ता सुनील ध्यानी कहते हैं कि कुछ राजनीतिक गलतियां हमसे हुईं, जिसका खमियाज़ा सभी को भुगतना पड़ा. नई पार्टी के तौर आने वाली पार्टी यूकेडी को नुकसान पहुंचाती हैं. जबकि गरिमा दसौनी, कांग्रेस प्रवक्ता पार्टी की पीठ थपथपाते हुए नये राजनीतिक दलों को अस्तित्व की लड़ाई लड़ना मानती है. उन्हें लगता है कि शुतरर्मुग की तरह खुली पार्टी सिर्फ वोट कटवा पार्टी है. क्योंकि भले ही पार्टी बना ली जाये, लेकिन उसे जनता कि नज़रो में उतारने  के लिए जनता के मुद्दों को उठाना ही पड़ेगा.

चुनाव के बाद गायब हो जाती हैं पार्टियां
बीजेपी विधायक खजानदास कहते है की हर चुनाव में पार्टी जन्म लेती हैं और उसके बाद गायब.  पार्टियों के रजिस्ट्रेशन पर चुनाव आयोग को भी सोचना चाहिए. जबकि राजनीतिक के जानकार इसे पार्टीज़ की एक्टिवनेस की कमी मानते हैं. अब इलेक्शन करीब है तो सभी दल एक्टिव दिखेंगे, लेकिन सभी को समझना होगा कि जनता उसे ही हिट करेंगी जो नज़रों में फिट बैठेगा.
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