उत्तराखंड में सरकारी घोषणाओं से गायब दिखा 'किसान', कैसे पूरा होगा ये वादा?

Deepankar Bhatt | News18 Uttarakhand
Updated: August 16, 2019, 10:46 PM IST
उत्तराखंड में सरकारी घोषणाओं से गायब दिखा 'किसान', कैसे पूरा होगा ये वादा?
उत्‍तराखंड सरकार की किसानों से दूरी हर किसी को खल रही है.

स्‍वतंत्रता दिवस (Independence Day) के मौके पर उत्‍तराखंड (Uttarakhand) की राजधानी देहरादून के परेड ग्राउंड में सीएम त्रिवेंद्र रावत (CM Trivendra Singh Rawat) की घोषणाओं से किसान गायब दिखा.

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मोदी सरकार (Modi Government)  को 2022 तक किसानों की इनकम डबल करनी है, लेकिन 15 अगस्त को उत्‍तराखंड ( Uttarakhand) की राजधानी देहरादून के परेड ग्राउंड में सीएम त्रिवेंद्र रावत (CM Trivendra Singh Rawat) की घोषणाओं से किसान गायब दिखा. सीएम ने मंच से 9 घोषणाएं की जिसमें स्टूडेंट्स, महिला, बुजुर्ग सब शामिल रहे, लेकिन खेती-किसानी को लेकर कोई बात नहीं हुई. हालांकि प्रदेश के अलग-अलग गांवों में चल रही छोटी-छोटी कॉपरेटिव सोसाइटीज को कंप्यूटराइज़ड करने की घोषणा सीएम ने ज़रूर की. बहरहाल, सवाल ये है कि 1 लाख का सस्ता लोन सिर्फ 2 फीसदी ब्याज पर देने वाली सरकार और शासन ने आज़ादी के मौके पर किसान के लिए कोई घोषणा प्लान क्यों नहीं की.

पहाड़ पर किसान का उत्थान चैलेंज?
केंद्र और राज्य सरकार भले ही इस प्लान पर काम कर रही हैं कि साल 2022 तक किसान का उत्थान करना है और कोई भी किसान हो, उसकी इनकम को डबल करना है. लेकिन पहाड़ के किसानों का इससे उत्थान कठिन है.

दरअसल, पहाड़ में ज्यादातर किसानों के खेत बेहद छोटी जोत हैं जिनमें सिर्फ परिवार की जरूरत का राशन हो पाता है. बाज़ार में बेचने की बात तो भूल जाइए. ऐसे में बगैर चकबंदी के लिए पहाड़ में खेती को बढ़ावा देने का प्लान कारगर साबित नहीं हो सकता. वहीं मछली, मुर्गी, बकरी, भेड़, मधुमक्खी पालन आदि का काम बड़े स्केल पर खड़ा करना चुनौती है.

प्राइवेट चीनी मिलों को किसानों को पेमेंट करना भारी पड़ रहा है.


गन्ना किसान की बड़ी परेशानी पेमेंट
उत्तराखंड के 4 जिले मैदानी हैं, जिनमें हरिद्वार और ऊधमसिंहनगर पूरी तरह तथा नैनीताल और देहरादून का बड़ा हिस्सा मैदानी है. हरिद्वार और ऊधमसिंहनगर के किसान का बड़ा ध्यान गन्ने की फसल पर होता है और यहां पर हर साल कई हजार एकड़ में गन्ने की खेती होती है, लेकिन पिराई के लिए चीनी मिल में गन्ना जाने से पहले ही सवाल खड़ा हो जाता है कि पेमेंट कब मिलेगी? बीते दो साल में जिस तरह से थोक बाज़ार में चीनी के दाम गिरे हैं, उससे प्राइवेट चीनी मिलों को किसानों को पेमेंट करना भारी पड़ रहा है. वहीं, चीनी की गिरते दामों से कॉपरेटिव मिलों को पेमेंट करना चुनौती बना हुआ है.
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नौकरी आज भी फर्स्ट च्वाइस, खेती नहीं
उत्तराखंड में हमेशा से नौकरी पब्लिक की फर्स्ट च्वाइस रही है. फिर बात चाहे छोटी उम्र में सेना में नौकरी पाने की हो या बीएड-बीटीसी करके टीचर बनने की. सरकारी ना मिले तो प्रदेश का युवा कंपनी से लेकर होटल तक में नौकरी करने को तैयार रहता है, लेकिन वो अपने कारोबार और किसानी से बचता है क्योंकि खुद के कारोबार में फंड रुकावट बनता है और खेती के लिए स्थितियां आसान नहीं हैं.

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First published: August 16, 2019, 10:43 PM IST
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