BJP के लिए चुनौती बना कंडी मार्ग का निर्माण, SC की रोक के बाद पीएम के दरबार में पहुंचा मामला

नियमानुसार राजाजी टाइगर रिजर्व के बफर जोन के इस क्षेत्र में निर्माण कार्य के लिए पहले एनटीसीए की अनुमति ली जानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया.

Sunil Navprabhat | News18 Uttarakhand
Updated: July 30, 2019, 9:09 PM IST
BJP के लिए चुनौती बना कंडी मार्ग का निर्माण, SC की रोक के बाद पीएम के दरबार में पहुंचा मामला
उत्तराखंड के कंडी मार्ग का मामला पीएम मोदी के दरबार पहुंचा.
Sunil Navprabhat
Sunil Navprabhat | News18 Uttarakhand
Updated: July 30, 2019, 9:09 PM IST
उत्तराखंड में कंडी मार्ग एक बार फिर चर्चाओं में है. कुमांऊ और गढ़वाल के बीच पहाड़ की तलहटी से गुजरने वाले पहाड़ और मैदान को विभाजित करने वाली ये सड़क कभी सबमाउंटेन रोड के नाम से जानी जाती थी. सरकारी रिकॉर्ड में इस सबमाउंटेन रोड को आधार बनाकर ही सरकारी कार्मिकों को पर्वतीय भत्ता दिया जाता था.

उत्तराखंड में कंडी मार्ग गढ़वाल से कुमाऊं जाने के लिए सबसे सुगम मार्ग है. यूपी से होकर गुजरने वाला वर्तमान प्रचलित मार्ग नजीबाबाद-रामनगर की अपेक्षा कंडी मार्ग 85 किलोमीटर कम है, लेकिन पहले कार्बेट और फिर राजाजी नेशनल पार्क की स्थापना होने के बाद इसका बड़ा हिस्सा पार्क क्षेत्रों में आ गया और ये मार्ग आम आवाजाही के लिए बंद कर दिए गए. दशकों से इस मार्ग को पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए खोलने की मांग उठती रही है. कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक आंदोलन भी चले, लेकिन वाइल्ड लाइफ एक्ट और फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट के सख्त प्रावधान इसके आड़े आ गए. मार्ग को वाइल्ड लाइफ के लिए खतरा बताते हुए कई बार मामला सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गया.

उत्तराखंड के लिए इंट्रास्टेट मार्ग का काम करेगा कंडी मार्ग
उत्तराखंड बनने के बाद और भी शिददत से इस मार्ग की आवश्यकता महसूस की जाने लगी. कारण है कि गढ़वाल और कुमाऊं मंडल में बंटे उत्तराखंड में एक मंडल से दूसरे मंडल को जाने के लिए कोई इंट्रास्टेट मार्ग नहीं है. इसके लिए यूपी के नजीबाबाद-नगीना-धामपुर से होकर गुजरना पड़ता है. इसका बड़ा प्रभाव उधोगों के साथ ही व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ता है.

वन मंत्री के लिए कंडी मार्ग बना है प्रतिष्ठा का सवाल
वर्ष 2017 में राज्य में भाजपा सरकार बनते ही कंडी मार्ग की मांग ने एक बार फिर जोर पकड़ा. इसका कारण था कि भाजपा ने 2017 में जो मैनीफेस्टो जनता के बीच जारी किया था, उसमें कंडी मार्ग का निर्माण प्राथमिकता में बताया गया था. जबकि प्रदेश के वन मंत्री जिस कोटद्वार विधानसभा क्षेत्र से आते हैं वो इससे सबसे अधिक प्रभावित होने वाला क्षेत्र है. कोटद्वार में सिगडडी में ग्रोथ सेंटर है तो जशोधरपुर में दर्जनों स्टील फैक्टरियां हैं. इन फैक्टरियों के लिए कच्चा माल और फिर इनका उत्पाद दोनों के ही ट्रांसपोर्टेशन में कंपनियों को यूपी में भी टैक्स देना होता है. जबकि उधोगपति भी चाहते हैं कि हर हाल में कंडी मार्ग का निर्माण हो.

इसके लिए वन मंत्री ने कंडी मार्ग के शुरुआती हिस्से लालढांग-चिल्लरखाल के निर्माण की प्रक्रिया शुरू की. करीब 11 किलोमीटर लंबे इस मार्ग के शुरुआती तीन किलोमीटर और फिर अंत के करीब साढ़े तीन किलोमीटर हिस्से को पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट को ट्रांसफर कर दिया. ये मार्ग राजाजी टाइगर रिजर्व और कार्बेट टाइगर रिजर्व का कॉरीडोर है.
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सुप्रीम कोर्ट के सामने भी झूठ बोल गए सरकार के नुमाइंदे
मार्ग पर निर्माण शुरू हुआ तो मामला एनटीसीए और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया. नियमानुसार राजाजी टाइगर रिजर्व के बफर जोन के इस क्षेत्र में निर्माण कार्य के लिए पहले एनटीसीए की अनुमति ली जानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया. तर्क दिया गया कि इसके लिए एनटीसीए की अनुमति की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि पुराने तीन मीटर चौड़े फॉरेस्ट मार्ग को ही ब्लैक टॉप कर ठीक किया जा रहा है.

एक अन्य याचिकाकर्ता मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गए. सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच को सेंट्रल इम्पावर्ड कमेटी के मेंबर सेक्ट्ररी के नेतृत्व में दो सदस्यीय टीम लालढांग-चिल्लरखाल मोटर मार्ग के स्थलीय निरीक्षण को भेजी. इसी 23 जुलाई को निरीक्षण को पहुंची टीम ने पाया कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जो भी तर्क दिए सबके सब झूठ थे. तीन मीटर चौड़ाई की इस फॉरेस्ट रोड को चार मीटर तक चौड़ा कर ब्लैक टॉप का कार्य किया जा रहा था. यही नहीं, इस पर दो से तीन जगह सात मीटर चौड़े पुल बनाए जा रहे हैं, जो कि फॉरेस्ट एक्ट के साथ ही वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट का उल्‍लंघन है.

सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक
सीईसी की इस टीम ने कहा कि राज्य सरकार की मंशा सही नहीं है और वो फॉरेस्ट की इस सड़क को पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए विकसित करना चाहती है. यदि ऐसा हुआ तो इस कॉरीडोर में ट्रैफिक दबाव बढ़ने से वाइल्ड लाइफ प्रभावित होगी. सुप्रीम कोर्ट ने सीईसी के इन तर्कों पर अपनी मुहर लगाते हुए इस मार्ग निर्माण पर रोक लगा दी है.

अब प्रधानमंत्री के दर पर कंडी मार्ग मामला
इधर, वन मंत्री हरक सिंह रावत ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है. वन मंत्री ने प्रधानमंत्री को भेजे पुलिंदे में बताया है कि कंडी मार्ग कुमाऊं और गढ़वाल के लिए आवश्यक है. चूंकि ये मार्ग दशकों से यातायात के लिए प्रयोग होता रहा है और इसलिए इस मार्ग को बनने दिया जाए. वन मंत्री ने द इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया, द हिमालयन गजेटियर जैंसे दर्जनों साक्ष्य दिए हैं, जिससे ये सिद्व होता है कि ये मार्ग पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए प्रयोग होता रहा है.

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First published: July 30, 2019, 9:09 PM IST
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