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Uttarakhand Loksabha Election Results 2019: क्यों हारे कांग्रेस के दिग्गज, यहां जानिए पांच कारण

Uttarakhand Loksabha Election Results 2019: क्यों हारे कांग्रेस के दिग्गज, यहां जानिए पांच कारण

हरीश रावत, प्रीतम सिंह और प्रदीप टम्टा को करारी हार का सामना करना पड़ा है.

हरीश रावत, प्रीतम सिंह और प्रदीप टम्टा को करारी हार का सामना करना पड़ा है.

पार्टी के इन दिग्गजों की हार के क्या प्रमुख पांच-पांच कारण रहे एक नज़र इस पर...

पूरे देश की तरह उत्तराखंड में भी मोदी मैजिक चला है और इसमें विपक्षी साफ़ हो गए हैं. बीजेपी ने राज्य में क्लीन स्वीप किया है और उसके दिग्गज नेताओं को बुरी हार का सामना करना पड़ा है. टिहरी सीट पर कांग्रेस को लगातार तीसरी बार हार का सामना करना पड़ा है. इस बार कॉंग्रेस आलाकमान ने प्रीतम सिंह से उम्मीदें इतिहास बदलने की उम्मीद लगाई थी लेकिन यह उम्मीद टूट गई. इसी तरह पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने हरिद्वार सीट छोड़कर खुद नैनीताल सीट चुनी थी तो पार्टी को उम्मीद थी कि इसके पीछे कोई रणनीति होगी जो बीजेपी को धूल चटा देगी. लेकिन पहली बार आम चुनाव लड़ रहे भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट ने चार बार सांसद रहे हरीश रावत को 3 लाख से ज्यादा वोटों से हराया. अल्मोड़ा में भाजपा को पिछले चुनाव के मुकाबले सबसे ज़्यादा बढ़त मिली है. हालांकि यह कहा जाता रहा था कि अजय टम्टा के लिए अल्मोड़ा सीट के लोगों में काफी गुस्सा था. पार्टी को उम्मीद थी कि वह केंद्र में मंत्री और मौजूदा सांसद अजय टम्टा के ख़िलाफ़ एंटी इनकमबेंसी को कैश कर पाएंगे लेकिन वह भी इसमें नाकाम रहे.

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पार्टी के इन दिग्गजों की हार के क्या प्रमुख पांच-पांच कारण रहे एक नज़र इस पर...

प्रीतम सिंह 


प्रीतम सिंह


  1. नरेन्द्र मोदी: इस चुनाव में पार्टी कैण्डिडेट बिल्कुळ फीके नजर आए. खुद नरेन्द्र मोदी ने अपने नाम पर लोगों से वोट मांगा. केन्द्रीय मुद्दों पर हुए चुनाव में मौजूदा सांसद के प्रति नाराज़गी गायब हो गयी और भाजपा को बम्पर विजय मिली.

  2. विधानसभाओं का गणित: टिहरी लोकसभा क्षेत्र में देहरादून, उत्तरकाशी और टिहरी जिले की कुल 14 विधानसभाएं आती हैं. इनमें देहरादून की 7, उत्तरकाशी की 3 और टिहरी की 4 विधानसभाएं शामिल हैं. कुल 14 विधानसभाओं में से मौजूदा समय में भाजपा के 11 और कांग्रेस के मात्र 2 विधायक शामिल है. ऐसे में कांग्रेस के प्रीतम सिंह को वोट मिलता भी तो कहां से.

  3. संगठनात्मक ढांचाः कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा पूरी तरह चरमराया हुआ है. बड़े नेताओं की कमी तो कांग्रेस 2017 के पहले से ही झेल रही है. ऐसे में जिलों में न तो उसके कार्यकर्ताओं की संख्या ही ज्यादा है और न ही उनका प्रभाव. ऐसे में पब्लिक के बीच पार्टी की साख बनती भी तो कैसे.

  4. चुनाव मैनेजमेंटः भाजपा के चुनाव मैनेजमेंट के आगे कांग्रेस पार्टी कहीं नहीं टिकती. इस लोकसभा क्षेत्र में भाजपा विधायकों का दबदबा तो है ही उस पर पार्टी की केन्द्रीय टीम का बूथ मैनेजमेण्ट पूरी तरह कांग्रेस पर हावी रहा.

  5. प्रीतम सिंहः खुद कई बार के विधायक और मंत्री रहे प्रीतम सिंह मौजूदा कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं लेकिन, संगठन के टॉप पर रहते हुए वे कोई बड़ी छाप नहीं छोड़ सके. दो साल बाद भी वे अपनी टीम नहीं बना पाए हैं. उपर से पार्टी के भीतर गुटबाजी ने चुनाव में पार्टी की खाट खड़ी कर दी. 


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हरीश रावत 


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हरीश रावत


  1. पहले ही मान ली थी हारः हरीश रावत ने वोटों की गिनती से पहले ही ये मान लिया था कि उन्होंने गलत सीट का चुनाव कर लिया है. 2014 में बीजेपी ने नैनीताल सीट से सबसे बड़ी जीत दर्ज की थी. 2.94 लाख वोटों से भगत सिंह कोश्यारी ने कांग्रेस को हराया था. ऐसे में भाजपा के गढ़ में सेंध लगा पाने का कोई चांस ही नहीं था, वह भी तब जब पूरे चुनाव में मोदी लहर बाकी मुद्दों पर हावी दिखी.

  2. कार्यकर्ताओं की कमीः दो साल पहले विधानसभा के हुए चुनाव में इस क्षेत्र में भाजपा को बंपर विजय मिली थी. इसका कारण एक यह भी था कि इस इलाके के कांग्रेसी नेता यशपाल आर्य भाजपा में शामिल हो गए थे. इंदिरा हृदयेश के अलावा वह इस इलाके में ऐसे दूसरे नेता थे जो कांग्रेस का नाम जिन्दा रखे हुए थे. नैनीताल उधम सिंह नगर ज़िला मिलाकर जो 14 विधानसभाएं इस संसदीय क्षेत्र में आती हैं उनमें सिर्फ़ हलद्वानी से इंदिरा हृदयेश ही कांग्रेस विधायक हैं. लिहाजा कार्यकर्ताओं की भारी कमी है.

  3. गुटबाज़ीः ताकत चाहे जितनी हो लेकिन, घर में भेदी बैठा हो तो जीत संभव नहीं. कांग्रेस की भी यही कहानी है. ऐसा कहा जाता है कि नैनीताल सीट पर कांग्रेस नहीं बल्कि हरीश रावत चुनाव लड़ रहे थे. कुमाऊं की बड़ी नेता इंदिरा हृदयेश का उनको शाय़द ही साथ मिला होगा.

  4. अल्मोड़ा बेस नहीं: पिछला चुनाव हरीश रावत गढ़वाल से लड़े थे. 2009 में वह हरिद्वार से सांसद चुने गए थे. हरीश रावत पहली बार नैनीताल सीट से चुनाव लड़ रहे थे. इसमें पहाड़ के साथ-साथ ऊधम सिंह नगर की सभी विधानसभाएं आती हैं. इसी ज़िले की विधानसभा किच्छा से हरीश रावत 2017 का चुनाव हार गए थे. मतलब ये है कि इतना पुराना लीडर होने के बावजूद कुमाऊं में उनका कोई बेस नहीं बचा था. भले ही वे अल्मोड़ा से तीन बार सांसद रहे लेकिन नैनीताल की सीट उनके लिए बिल्कुल नई थी.

  5. छवि का फ़र्कः दोनों पार्टियों के उम्मीद्वारों में छवि का भी भारी अंतर रहा है. भाजपा से चुनाव जीते अजय भट्ट का अभी तक का पूरा जीवन बेदाग रहा है. वह भी अविभाजित यूपी के समय से विधायक रहे हैं लेकिन राजनीति में लम्बी पारी के बावजूद अजय भट्ट ने अपनी शुचिता बरकरार रखी है. दूसरी तरफ हरीश रावत की छवि को उनके सीएम रहते बड़ा धक्का लगा था. एक स्टिंग ऑपरेशन ने उनकी पूरी राजनीति को बड़ा डेंट लगाया था. इसके अलावा दोनों उम्मीद्वारों में उम्र का बड़ा अंतर भी वोटरों के लिए कम अहम नहीं रहा होगा.


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प्रदीप टम्टा 


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  1. कांग्रेस का बेस ही नहीं: कांग्रेसी प्रदीप टम्टा जीतते भी तो कैसे. अल्मोड़ा लोकसभा सीट में चार जिलों पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा और चम्पावत की कुल 14 विधानसभायें आती हैं. इनमें से 11 पर भाजपा का कब्जा है. दो साल पहले ही बनी राज्य की भाजपा सरकार के खिलाफ न तो कोई सत्ता विरोधी लहर थी और न केन्द्र की सरकार के ख़िलाफ़ ही. लिहाजा लोकसभा क्षेत्र के बड़े भू-भाग में भाजपा की साख बरकरार रही और लोगों ने जमकर वोट किया. यह स्थिति तब रही जब खुद राहुल गांधी अल्मोड़ा प्रचार करने आए थे.

  2. अकेले पड़ गएः ऐसा कहा जाता है कि प्रदीप टम्टा अल्मोड़ा सीट पर बिल्कुल अकेले पड़ गए थे. बगल की नैनीताल सीट से हरीश रावत के चुनाव लड़ने से ज्यादातर कार्यकर्ता नैनीताल क्षेत्र में जम गए थे. अल्मोड़ा में प्रचार करने के लिए भी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को खोजना पड़ता था.

  3. खोने को कुछ नहीं: अल्मोड़ा से प्रदीप टम्टा के लिए चुनाव जीने मरने वाला नहीं था. वह राज्यसभा में सांसद हैं ही. लिहाजा उनके पास खोने को कुछ नहीं था. ऐसे हालात में उन्होंने चुनाव के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया होता तो शायद भाजपा की इतनी बड़ी बढ़त सामने नहीं आती.

  4. देर से सक्रिय हुएः प्रदीप टम्टा ने शायद ये उम्मीद नहीं की होगी कि उनके राज्यसभा के सांसद रहते हुए कांग्रेस पार्टी उनको लोकसभा का टिकट दे देगी. लिहाजा वह देर से चुनाव में सक्रिय हुए. इसके साथ ही पहले यहां से लोकसभा के सांसद रहते और मौजूदा समय में राज्यसभा के सांसद रहते हुए उनके खाते में कोई ऐसा काम नहीं है जिसकी चर्चा हो. ऐसे में पहले से आज़माए कैण्डिडेट पर बार-बार दांव क्यों जनता लगाए.

  5. गुटबाज़ी: आपसी गुटबाजी प्रदीप टम्टा पर बहुत भारी पड़ी. लोकसभा चुनाव घोषित होने से ऐन पहले अल्मोड़ा जिले के कांग्रेसियों में जबरदस्त जंग चल रही थी. ये जंग स्थानीय निकाय चुनाव में टिकटों को लेकर लड़ी गई. लिहाजा संगठन पहले से बिखरा हुआ था.


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