लगातार चेतावनियों से भी चेता नहीं उत्तराखंड, चाइल्ड सेक्स रेशो में सबसे फिसड्डी राज्य

उत्तराखंड में सबसे कम रहा शिशु जन्म लिंग अनुपात.

उत्तराखंड में सबसे कम रहा शिशु जन्म लिंग अनुपात.

स्टडीज़ में अंदेशे सामने आने के बावजूद बच्चों के लिंग अनुपात के मामले में उत्तराखंड 2011 के मुकाबले और 50 पॉइंट नीचे चला गया. खतरे की घंटियां कैसे सुनाई दी थीं? यह भी जानिए कि कौन से राज्य इस इंडेक्स में अव्व्ल रहे.

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नई​ दिल्ली/देहरादून. उत्तराखंड समय पर नहीं चेता और उसने उचित कदम नहीं उठाए, नीति आयोग के ताज़ा जारी किए गए आंकड़ों से यह साबित हुआ. आयोग ने हाल में, सस्टेनेबेल डेवलपमेंट गोल्स (SDG) को लेकर जो डेटा जारी किया, उसके मुताबिक शिशु जन्म में लिंग अनुपात के मामले में सबसे पिछड़े राज्य के तौर पर उत्तराखंड ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई. एसडीजी के आंकड़ों के हिसाब से बालक बालिका लिंग अनुपात के मामले में उत्तराखंड में केवल 840 का औसत है, यानी राज्य में प्रति 1000 बालकों पर सिर्फ़ 840 बालिकाएं जन्मती हैं. हैरत और दुख की बात यह है कि 2021 में ऐसे आंकड़े होंगे, यह अनुमान विशेषज्ञों ने पांच साल पहले ही लगा लिया था!

एसडीजी ने जो आंकड़े जारी किए, उनके मुताबिक शिशु जन्म के समय बाल लिंगानुपात के सबसे बेहतर आंकड़े छत्तीसगढ़ में दिखाई दिए, जहां यह अनुपात 1000:958 रहा. साफ तौर पर यह राष्ट्रीय औसत से कहीं ज़्यादा है. 957 के अनुपात के साथ केरल इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर रहा. यही नहीं, पंजाब में 890 और हरियाणा में 843 का औसत चिंताजनक ज़रूर है, लेकिन पहले कम सेक्स रेशो के शिकार इन राज्यों के आंकड़े इस बार बेहतर दिखे. लेकिन उत्तराखंड में यह सूरत नहीं दिखाई दी.

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सेक्स रेशो के मामले छत्तीसगढ़ और केरल अव्वल राज्य रहे.

पांच साल पहले मिली थी चेतावनी

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