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आम जनता की गुहार, सड़कों पर बंद होनी चाहिए नेतागिरी

आम जनता की गुहार, सड़कों पर बंद होनी चाहिए नेतागिरी

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि सुशासन और अनुशासन की वकालत करने वाली भाजपा के कद्दावर नेता कभी आम आदमी के दर्द को समझने की कोशिश करेंगे? या यूं ही पार्टी के कार्यक्रमों के दौरान लोगों की यूं ही फजीहत होती रहेगी.

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि सुशासन और अनुशासन की वकालत करने वाली भाजपा के कद्दावर नेता कभी आम आदमी के दर्द को समझने की कोशिश करेंगे? या यूं ही पार्टी के कार्यक्रमों के दौरान लोगों की यूं ही फजीहत होती रहेगी.

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि सुशासन और अनुशासन की वकालत करने वाली भाजपा के कद्दावर नेता कभी आम आदमी के दर्द को समझने की कोशिश करेंगे? या यूं ही पार्टी के कार्यक्रमों के दौरान लोगों की यूं ही फजीहत होती रहेगी.

    सियासत कहीं भी हो आखिर अपना रंग तो दिखा ही देती है. भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों को लेकर भाजपा ने विधानसभा कूच किया.

    इससे भाजपा को सियासी तौर का क्या फायदा होगा ये अलग बात है, लेकिन आम लोगों को इस सियासत से कितनी मुसीबतें उठानी पड़ रही हैं ये तो उत्तराखंड की जनता की बता सकती है.

    इन मुसीबतों को देखते हुए आम जनता ने राजनीतिक दलों से एक गुहार लगाई है. लोगों का कहना है कि सड़कों पर नेतागिरी बंद होनी चाहिए. भाजपा के घेराव से दिन भर लोग भटकते रहे और परेशान होकर उन्होंने नेताओं के सामने अपनी गुहार लगाई.

    विधानसभा घेराव के चलते राजधानी की सड़कों पर कार्यकर्ताओं ने दिन में कब्जा कर लिया था, जिससे स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल, कार्यालय जाने के लिए वाहनों लोग इंतजार करते रह गए. साइकिल कंधों पर उठाकर बैरिकेडिंग को लोगों ने पार किया. सुबह से दोपहर तक राजधानी की सड़कों पर भाजपा कार्यकर्ताओं का कब्जा रहा.

    आम जनता दिनभर बैरीकेडिंग को फांद कर लोग दिनभर निकलने की जद्दोजहद करते रहे, लेकिन उनकी परेशानियों को किसी ने नहीं सुना. भाजपा जहां अपनी सियासत के सितारों को चमकाने के मकसद से सरकार को ललकारती रही तो दूसरी तरह आम आदमी इसी सियासत से कहरता रहा.

    पुलिस ने सुबह से रिस्पना पुल से शहर को जाने वाले मार्ग को बंद कर दिया था. 200 मीटर के रास्ते को तय करने के लिए लोगों को दो से तीन किलोमीटर की दूरी से जूझना पड़ा. जगह-जगह जाम रहा. वाहनों के ना मिलने से रोजमर्रा के कामों के लिए लोग भटकते रहे, लेकिन आम आदमी के दर्द को आखिर कौन सुनता.

    ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि सुशासन और अनुशासन की वकालत करने वाली भाजपा के कद्दावर नेता कभी आम आदमी के दर्द को समझने की कोशिश करेंगे? या यूं ही पार्टी के कार्यक्रमों के दौरान लोगों की यूं ही फजीहत होती रहेगी.

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